बच्चों को मिलने वाले अंडों पर किनकी नजर?

झारखंड में दोपहर का भोजन कार्यक्रम में अंडा देने की योजना इमेज कॉपीरइट NIRAJ SINHA

झारखंड में राज्य मंत्रिमंडल में लिए गए एक अहम फैसले के बाद भी सरकारी स्कूलों के बच्चों को हफ्ते में तीन दिन अंडे नहीं परोसे जा सके हैं.

इस बीच अंडों की खरीद को लेकर सवाल भी उठने लगे हैं.

भोजन के अधिकार अभियान से जुड़े लोगों की आशंका है कि मिड-डे मील के कथित ठेकेदार अंडा आपूर्ति करने का काम हथियाना चाहते हैं.

हालांकि अंडों की उपलब्धता को लेकर सरकार ने अभी तक स्पष्ट निर्णय नहीं लिया है.

25 अगस्त को सरकार ने इस प्रस्ताव को मंजूरी दी थी कि अब मिड-डे मील के तहत हफ्ते में तीन दिन अंडे दिए जाएंगे.

इस पौष्टिक आहार के लिए 155 करोड़ का पूरा खर्च राज्य सरकार वहन करेगी.

रिपोर्ट पढ़िए विस्तार से

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प्रसिद्ध अर्थशास्त्री ज्यां द्रेज का कहना है कि फैसला बढ़िया है, लेकिन 60 लाख बच्चों की निगाहें सरकार की ओर हैं. उन्हें लगभग दो करोड़ अंडों से वंचित किया जा रहा है.

द्रेज बताते हैं कि यह काम विशुद्ध तौर पर 'सरस्वती वाहिनी' को दिया जाना चाहिए.

झारखंड में स्कूली बच्चों के लिए भोजन पकाने और साग, सब्जी-अंडे का इंतजाम करने का काम गांवों की स्थानीय महिलाएं करती हैं. इन्हें सरस्वती वाहिनी के नाम से जाना जाता है.

राज्य में मानव संसाधन विकास विभाग के अधिकारी भी यही चाहते हैं.

जबकि कथित तौर पर कुछ ठेकेदार और कंपनियां केंद्रीयकृत तरीके से अंडों की आपूर्ति का काम लेना चाहते हैं. इससे ये योजना प्रभावित हो सकती है.

'गाइडलाइन से उलट'

खाद्य सुरक्षा अभियान से जुड़े लोगों को जानकारी है कि मानव संसाधन विकास मंत्री ने पिछले दिनों मुख्यमंत्री को सेंट्रलाइज़्ड तौर पर अंडे उपलब्ध कराने का सुझाव दिया है.

जबकि मिड-डे मील की गाइडलाइन और सुप्रीम कोर्ट के एक फैसले के विपरीत कोई फैसला नहीं लिया जाना चाहिए.

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हाल ही में सर्व शिक्षा अभियान की एक रिपोर्ट में सरस्वती वाहिनी के काम को सराहा गया है.

खाद्य सुरक्षा अभियान से जुड़ी अंकिता अग्रवाल कहती हैं कि सरस्वती वाहिनी को ये काम मिलने से स्थानीय महिलाओं को रोजगार के अवसर भी मिलेंगे.

इस बारे में भोजन के अधिकार मुकदमे में सर्वोच्च न्यायालय के कमिश्नर डॉक्टर एनसी सक्सेना और हर्ष मंदर ने झारखंड के मुख्य सचिव को एक चिट्ठी लिखी है.

मिड-डे मील

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उन्होंने सरकार की योजना को सराहा है. इसके साथ ही चिंता जताई है कि कथित निजी ठेकेदारों की वजह से कई राज्यों में 'आइसीडीएस' कार्यक्रम बुरी तरह से प्रभावित हुए हैं.

इस पूरे मामले में मानव संसाधन विकास विभाग की सचिव आराधना पटनायक बताती हैं कि एमडीएम की गाइडलाइन और सुप्रीम कोर्ट के फैसले को ध्यान में रखते हुए सरस्वती वाहिनी को ही ये काम देने का प्रस्ताव तैयार किया गया है. अब फैसला सरकार को लेना है.

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