रिश्ते और 'घुसपैठ', कैसे चलेंगे साथ साथ

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चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग के भारत दौरे के दौरान भी चीनी सैनिक लद्दाख की सीमा में घुस आए.

यह जिनपिंग की बेहद महत्वपूर्ण यात्रा, या कहें ऐतिहासिक यात्रा के अंत में दाग जैसा साबित हुआ.

ऐसा क्यों हुआ कि एक ओर तो भारत और चीन आपसी रिश्तों को मज़बूत करने की बात कर रहे हैं और दूसरी ओर सीमा पर सेना एक दूसरे के सामने खड़ी नज़र आती है.

क्या भारत और चीन के बीच सीमा विवाद का कोई हल है? सीमा पर शांति स्थापित करने के लिए दोनों देशों को क्या कोशिश करनी चाहिए.

विस्तार से पढ़िए, सिद्धार्थ वरदराजन का विश्लेषण

इस पूरे मामले को हम चार नजरिए से देख सकते हैं.

कुछ सामरिक विश्लेषकों की राय में ये घुसपैठ शी की ख़ुद की सोची समझी रणनीति का नतीजा है, ताकि वे भारत को उसकी हैसियत बता सकें और ये याद दिला सकें कि भारत और चीन का सीमा विवाद बना हुआ है.

ये वही विश्लेषक हैं जिन्हें एशियाई देशों के साथ चीन के बढ़ते कारोबारी रिश्ते और समुद्री सिल्क रूट की बात भारत को घेरने की कोशिश लगती है.

हो सकता है कि शी ख़ुद ही इस ओर प्रगति की कोशिश कर रहे हों और पीपुल्स लिबरेशन आर्मी इससे नाराज़ हो. तब चुमार में घुसपैठ, राजनेताओं पर नियंत्रण करने का पीएलए हाई कमान का एक तरीक़ा हो सकता है..

चीन की मुश्किल

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लेकिन इन दोनों सिद्धांतों की मुश्किल ये है कि ये चीन के मूलभूत सामरिक उद्देश्य से मेल नहीं खाते. चीन अभी भारत को ऐसी स्थिति में नहीं छोड़ सकता, जहां से वह अमरीका और जापान के साथ मिलकर एक चीन विरोधी रणनीतिक गठबंध बना ले.

शी जिनपिंग और पीपल्स लिबरेशन आर्मी के उन जनरलों को ये मालूम है कि सीमा पर बार-बार विवाद से भारत चीन के विरोधियों से हाथ मिला लेगा.

तीसरी संभावना इस बात की है, जिसकी ओर मीडिया से बातचीत के दौरान ख़ुद शी जिनपिंग ने संकेत दिया है. उन्होंने कहा, "सीमा पर किसी तरह का निर्धारण नहीं होने से ऐसी घटनाएं होती हैं. लेकिन दोनों देशों के पास ऐसी स्थिति को संभालने की व्यवस्था मौजूद है."

शी जिनपिंग जिस वजह की ओर इशारा कर रहे हैं, उसे भारतीय अधिकारियों की ओर से भी मैं कई बार सुन चुका हूं. ऐसे में सवाल ये है कि चीन सीमा निर्धारण के लिए पहल क्यों नहीं कर रहा है, जबकि यह सीमा विवाद के वास्तविक हल से अलग मसला है.

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपने बयान में कहा है, "वास्तविक नियंत्रण रेखा (एलएसी) के निर्धारण से शांति स्थापित करने की हमारी कोशिशों को बड़ी मदद मिलेगी."

सीमा पर तनाव

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चीन के राष्ट्रपति ने एलएसी के निर्धारण की प्रक्रिया को शुरू करने पर सहमति जताई है. इससे इतना तो तय है कि भारत और चीन दोनों सीमा को लेकर सहमत नहीं हैं.

एलएसी कहां है, इस पर भी दोनों में कोई सहमति नहीं है. ऐसे में जब कोई देश अपनी एलएसी के मुताबिक़ गश्त करता है तो दूसरे देश को ये घुसपैठ लगता है.

वर्ष 1996 में, दोनों देशों ने एक समझौते पर हस्ताक्षर किए थे, जिसमें दोनों देशों ने सैन्य क्षेत्र में भरोसा बहाल करने के लिए एलएसी निर्धारण की प्रक्रिया को गति देने पर सहमति जताई थी.

इस समझौते में कहा गया था, "भारत और चीन को एलएसी निर्धारण के पहले चरण में उन हिस्सों पर काम करना है, जिसमें दोनों की भिन्न राय है. दोनों देश एक दूसरे को अपना-अपना नक्शा देने पर भी सहमत हुए थे."

लेकिन ऐसा हुआ नहीं. 2003 में बातचीत करने और फ़ैसला लेने का जिम्मा विशेष प्रतिनिधियों के हवाले किया गया. 11 साल और 17 राउंड की बातचीत के बात कोई नतीजा नहीं निकल पाया.

अब एक बार फिर भारत और चीन इस बात पर सहमत हैं कि एलएसी का निर्धारण बिना किसी पूर्वाग्रह के होना चाहिए, लेकिन ऐसा लगता है कि चीन को इस बात की आशंका है कि नक्शे आदान-प्रदान से बातचीत में उसकी स्थिति कमजोर होगी.

कब निर्धारित होगी सीमा?

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Image caption सीमा निर्धारण पर दोनों सहमत हैं लेकिन इसे अमल में लाना एक बड़ी चुनौती है.

इसी पहलू से चीनी सैनिकों की घुसपैठ को समझने के लिए चौथा नजरिया सामने आता है- स्थानीय स्तर पर एलएसी का निर्धारण नहीं होने से एक तरह की असहमति के भाव से बिना किसी फायदे की सोच के साथ चीन सीमावर्ती इलाकों पर अपना हक जताना चाहता है.

हालांकि इस सोच पर भी सवाल उठाए जा सकते हैं. जैसा कि राजनयिक सी दासगुप्ता कहते हैं कि यह रवैया चीन को अरुणाचल प्रदेश के इलाके में दिखाना चाहिए जहां चीन अपनी ताक़त दिखाना चाहता है, जबकि चीन लद्दाख के पश्चिमी क्षेत्र में बार बार घुसपैठ कर रहा है.

चीन के उद्देश्यों को लेकर भारत निश्चिंत न भी हों, तो भी एक बात तो साफ है, भारतीय सेना इन घुसपैठों का जवाब देने के लिए पूरी तरह से सक्षम है. हालांकि इससे दोनों देशों के बीच तनाव बढ़ेगा और रिश्तों में अनिश्चितता का माहौल देखने को मिलेगा.

मीडिया को दिए अपने बयान में मोदी ने कहा, "हमने सीमा पर बार बार हो रही घुसपैठ के मुद्दे को गंभीरता से उठाया. हम इस बात पर सहमत थे कि दोनों देशों के आपसी रिश्तों को बेहतर करने के लिए सीमा पर शांति की जरूरत है. आपसी समझदारी के लिए ये अहम बात है, गंभीरता से हमें इसकी निगरानी करनी होगी."

सावधानी से चुने गए मोदी के शब्द प्रभावी ढंग से चीन को यह संदेश नहीं दे पाए कि घुसपैठ की घटनाओं से द्विपक्षीय संबंध समाप्त हो सकते हैं, हालांकि मोदी के संदेश ने ये ज़रूर साफ कर दिया है कि सीमा पर तनाव का दोनों देशों के आपसी रिश्ते प्रभावित होते हैं.

मज़बूत नेतृत्व

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अगर सीमा विवाद को छोड़ दें तो शी जिनपिंग की भारत यात्रा कई मायने में ख़ास रही. चीन ने भारत में 20 अरब डॉलर निवेश की घोषणा की हालांकि यह जापान के 35 अरब डॉलर के निवेश के वादे से कम है.

इसके अलावा अंतरिक्ष में दोनों देश आपसी सहयोग बढ़ाने पर राजी हुए हैं. समुद्री सिल्क रूट को लेकर भी सहमति बनी है. शी जिनपिंग ने भारत और चीन के आपसी सहयोग बढ़ने की बात की है ताकि एशियाई प्रशांत क्षेत्र में दोनों देश पार्टनर की भांति काम कर सकें.

बीते तीस साल में चीन के सबसे मज़बूत नेता के तौर पर उभरे हैं शी जिनपिंग और भारत के सबसे मज़बूत नेता के तौर पर सामने आए हैं नरेंद्र मोदी. इन दोनों के पास दोनों देशों के आपसी संबंध को बेहतर बनाने के लिए पांच साल का समय भी है.

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