चीन से कितना हासिल कर पाए मोदी?

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चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग के भारत दौरे से माहौल में एक क़िस्म की सकारात्मकता आई है, यह महत्वपूर्ण बात है.

पांच साल पहले से माहौल में बहुत तनाव और नकारात्मकता थी, जिससे सरकारी अधिकारियों को बातचीत आगे बढ़ाने में काफ़ी दिक्कत होती थी.

लेकिन आजकल लद्दाख में भारत और चीन सीमा पर तनाव है और इसलिए सीमा विवाद पर दोनों देशों के बीच कोई ख़ास प्रगति नहीं हुई है.

दोनों देश अपने रुख़ पर अड़े हैं. भारत ने कहा है कि उसे वास्तविक नियंत्रण रेखा (एलएसी) को लेकर अंतिम समाधान चाहिए.

वहीं चीन का कहना है कि यह एक ऐतिहासिक मुद्दा है और इसे जल्द से जल्द हल करना चाहिए.

सीमा मुद्दा

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चीनी राष्ट्रपति के इस दौरे में भी इस बारे में ना प्रगति हुई है, न ही इस बात की कोई घोषणा कि इस मुद्दे पर बातचीत के लिए विशेष दूतों की तैनाती होगी.

जब शी जिनपिंग भारत के दौरे पर हैं, तो सीमा पर तनाव का होना नई बात नहीं है. ऐसा चीन पहले भी कर चुका है.

एक बार जब राष्ट्रपति वेंकटरमण चीन के दौरे पर थे तो चीन ने उसी दौरान एक मिसाइल का परीक्षण किया था.

यही काम वे अमरीका के साथ भी करते हैं कि जब वरिष्ठ नेताओं के बीच कोई मुलाक़ात होती है तो वे सैन्य अभ्यास चलाते और हथियारों का परीक्षण करते हैं.

चीन का यह पुराना तरीक़ा रहा है. इसलिए ताज़ा घुसपैठ को लेकर भारत को बहुत कड़ा रुख़ नहीं अपनाना चाहिए.

निवेश

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आर्थिक मोर्चे पर भारत में 100 अरब डॉलर के चीनी निवेश की बात हो रही थी लेकिन जो समझौता हुआ है उसमें 20 अरब डॉलर के निवेश की बात सामने आई है.

मुंबई में चीनी राजनयिक ने आधिकारिक रूप से 100 अरब डॉलर के निवेश की बात कही थी.

सवाल यह है कि ऐसा क्यों हुआ?

मुझे लगता है कि कुछ निवेश और अन्य चीजें, जो चीन चाहता था, भारत ने उनकी अनुमति नहीं दी.

कितना कामयाब?

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यदि एक सीमित आधारभूत संरचना में उनका निवेश है तो यह अच्छी बात है, क्योंकि सड़क और पुलों में भारत को निवेश की ख़ासी ज़रूरत है.

लेकिन यदि नागरिक परमाणु संधि या हाई स्पीड रेल जैसे विवादित मुद्दों, जहां पर भारत की अर्थव्यवस्था उन पर निर्भर हो सकती है- तो इन क्षेत्रों पर यदि धीमी प्रगति हो तो अच्छी बात है.

कुल मिलाकर जितना उत्साह और उम्मीदें थीं, इस दौरे को उतना कामयाब नहीं कहा जा सकता.

(बीबीसी संवाददाता विनीत खरे से बातचीत पर आधारित)

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