महाराष्ट्रः गठबंधन टूटने से किसे फ़ायदा?

नरेंद्र मोदी और उद्धव ठाकरे

भारतीय जनता पार्टी और शिवसेना का महागठबंधन टूटने के कारण महाराष्ट्र में नए समीकरण बनेंगे.

भाजपा मोदी लहर के सहारे रहेगी तो दूसरी तरफ़ शिवसेना भाजपा को गुजराती बर्चस्व की पार्टी बताएगी और वो भाजपा और राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी के बीच गुप्त रिश्तों पर भी जोर देगी.

भाजपा-शिवसेना में चुनावी मुद्दों में हिंदुत्व के लिए भी होड़ मचेगी. दोनों दल हिंदुत्व और शिवाजी को अपना आदर्श मानेंगे.

शिवसेना अब उद्धव ठाकरे को मुख्यमंत्री का भी उम्मीदवार घोषित कर सकती है जबकि भाजपा के पास कोई ऐसा प्रभावी चेहरा नहीं है.

भाजपा, जो विदर्भ इलाके में संगठन के बल पर लोकप्रिय है, अब पृथक विदर्भ की मांग को जोर-शोर से उठाएगी.

हिंदुत्व और मराठी मानुस

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भाजपा राष्ट्रीय पार्टी है और वह क्षेत्रीय दलों को दरकिनार कर ताक़तवर केंद्र बनाना चाहती है. शिव सेना क्षेत्रीय दल है और महाराष्ट्र से बाहर उसका कोई प्रभाव नहीं है.

शिव सेना बाल ठाकरे की मृत्यु के बाद पहली बार विधानसभा का चुनाव लड़ रही है. बाल ठाकरे हिंदुत्व और मराठी मानुस को सत्ता में लाना चाहते थे.

महाराष्ट्र में शिवसेना-भाजपा गठबंधन करवाने वाले सभी नेता राजनीतिक पटल से हट गए हैं. बाल ठाकरे, प्रमोद महाजन और गोपीनाथ मुंडे की मृत्यु हो चुकी है.

शिव सेना में उद्धव और आदित्य ठाकरे का नेतृत्व है, जबकि भाजपा में नरेंद्र मोदी और अमित शाह का नेतृत्व है.

शिव सेना के मुद्दे

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Image caption उद्धव ठाकरे भी फ़िलहाल झुकने को तैयार नहीं दिखते

शिव सेना अपने स्वाभिमान को महत्वपूर्ण मानती है. वह मानती है कि मोदी की लोकप्रियता के कारण भाजपा में यह विश्वास बढ़ गया है कि वो अकेले महाराष्ट्र में सत्ता पा सकती है.

शिव सेना मुंबई को वर्षों से अपना गढ़ मानती है और मुंबई को महाराष्ट्र में रखने के लिए उसने संयुक्त महाराष्ट्र आंदोलन चलाया था.

शिव सेना मराठी भाषी बनाम गुजराती भाषी के द्वेष को चुनावी मुद्दा बनाएगी.

शिव सेना को यह भी लग रहा है कि उसे महाराष्ट्र में सहानुभूति की लहर का भी फ़ायदा मिलेगा. शिव सेना कोशिश करेगी कि वह भाजपा को गठबंधन तोड़ने के लिए ज़िम्मेदार ठहराए.

भाजपा शिव सेना के ख़िलाफ़ वाद-विवाद नहीं करने वाली है और वह चुनाव के बाद होने वाले नतीजों पर भी निगाह रखने वाली है.

राज ठाकरे की भूमिका

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शिव सेना-भाजपा गठबंधन टूटने का फायदा राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी को हो सकता है, क्योंकि वह भी राष्ट्रीय दल बनाम क्षेत्रीय दल के मुद्दे को उठा सकती है.

महाराष्ट्र नव निर्माण सेना के नेता राज ठाकरे पिछले लोकसभा चुनाव में इतनी बुरी तरह हार गए थे कि उनकी राजनीतिक प्रासंगिकता ही समाप्त होने लगी थी.

उनकी पार्टी के विधायक दलबदल कर भाजपा में जाने लगे थे और राज ठाकरे उनका विरोध भी नहीं कर रहे थे. ऐसे में भाजपा और राज ठाकरे की नजदीकियां भी बढ़ सकती हैं.

गठबंधन टूटने से महाराष्ट्र में धर्मनिरपेक्षता बनाम साम्प्रदायिकता की बहस भी कमजोर पड़ जाएगी.

भ्रष्टाचार के मुद्दे पर भाजपा और शिव सेना दोनों के ही निशाने पर कांग्रेस नहीं आ पाएगी, क्योंकि ज़्यादातर भ्रष्टाचार राष्ट्रवादी पार्टी के खाते में गया.

कांग्रेस को पृथ्वीराज चह्वाण की ईमानदारी का थोड़ा सा फ़ायदा हो सकता है. असल मुक़ाबला अब शिव सेना और एनसीपी के बीच होता लग रहा है. वैसे पंचकोणीय चुनाव अब लगभग तय है.

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