'मोदी का झाड़ू उठाना पब्लिसिटी स्टंट नहीं'

नरेंद्र मोदी

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने झाड़ू उठाया है, तो यह पब्लिसिटी स्टंट नहीं बल्कि एक अहम क़दम है.

1901 में महात्मा गांधी ने भी कोलकाता में झाड़ू उठाया था. और अगर इस अभियान को सही तरीक़े से लागू किया जाए तो कोई कारण नहीं है कि जनता इस अभियान से नहीं जुड़ेगी.

ग़ैर सरकारी संस्था सुलभ इंटरनेशनल ने प्रधानमंत्री को रोडमैप बनाकर दे दिया है.

इस अभियान में पचास हज़ार युवकों को शामिल करना पड़ेगा. देश में लगभग छह लाख 40 हज़ार गांव हैं. यानी हर एक युवक के ज़िम्मे क़रीब 13 गांव आएंगे.

पांच साल में एक युवक पर तीन हज़ार शौचालय बनाने की ज़िम्मेदारी होगी, जो कि बिल्कुल भी मुश्किल काम नहीं है.

प्रशिक्षण ज़रूरी

सरकार को 50 हज़ार युवकों, एक-डेढ़ लाख मिस्त्रियों को प्रशिक्षित करना होगा.

Image caption भारत में 50 प्रतिशत से अधिक आबादी के पास शौचालय की सुविधा नहीं है.

जहां तक रक़म की बात है तो लाभान्वित होने वाले तो पैसा देंगे ही, सरकार भी कुछ अनुदान देगी, बैंक भी क़र्ज़ देंगें.

कहा तो यह भी जा रहा है कि स्वच्छ भारत अभियान के लिए अमरीका ने भी सहायता का भरोसा दिलाया है.

जहाँ तक यूपीए सरकार के निर्मल भारत निर्माण की बात है तो उसके डिज़ाइन में ही गड़बड़ी थी. काम कौन करेगा, यही तय नहीं हो पाया था.

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अभियान के पहले चरण में लोगों को प्रशिक्षण दिया जाएगा. घर-घर जाकर लोगों को सफ़ाई के प्रति जागरूक करना होगा.

अभियान में भागीदारी

देशभर के कई ग़ैर सरकारी संगठन इस अभियान से जुड़े हुए हैं. ओएनजीसी, एनटीपीसी, कोल इंडिया जैसी सरकारी कंपनियां और टाटा कंसल्टेंसी, मित्तल ग्रुप भी इसके साथ जुड़ गए हैं.

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स्वच्छ अभियान को मिशनरी के रूप में लेना होगा. संस्कृति बदलनी होगी.

पांच हज़ार साल पुरानी संस्कृति को बदलने में थोड़ा समय तो लगेगा. अच्छी बात यह है कि इस मुद्दे पर महिलाएं काफ़ी संख्या में आगे आ रही हैं.

(बीबीसी संवाददाता सुशीला सिंह से बातचीत पर आधारित)

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