आख़िर नरेंद्र मोदी ने क्यों की 'मन की बात'

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यह महज संयोग नहीं है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपने की बात कहने के लिये विजयादशमी का दिन और आकाशवाणी का माध्यम चुना.

नरेंद्र मोदी संयोगों पर शायद यकीन ही नहीं करते या कहें कि वे संयोगों की प्रतीक्षा नहीं करते. उनकी सारी पहल सुनियोजित व सुविचारित होती है.

लेकिन आखिर नरेंद्र मोदी ने क्यों चुना आज का दिन 'मन की बात' कहने के लिए और वो इस तरह के प्रयोगों के ज़रिए क्या हासिल करना चाहते हैं.

मोदी के मन में क्या था?

1. संवाद करने के लिये नये नये माध्यमों का प्रयोग.

2. संवाद की शैली किस्से कहानियों के साथ नितांत अनौपचारिक एवं आत्मीय प्रतीकों व संकेतों का बेहतर उपयोग.

3. गांधी व खादी के ज़रिए उदार छवि बनाने की कोशिश.

4. सवा सौ करोड़ भारतीयों का बार बार जिक्र करना.

5. अपना वोट शेयर और जनाधार बढ़ाने की कोशिश.

6. शहरी मध्यम वर्ग से निकलकर सुदूर गांवों तक पहुंचना.

7. नए-नए समर्थक वर्ग तैयार करना.

8. निजी न्यूज चैनलों से दूरी बनाते हुए भी उनका भरपूर दोहन.

9. सरकारी प्रचार तंत्र का बेहतर उपयोग.

वरिष्ठ पत्रकार गिरिजा शंकर का विश्लेषण विस्तार से.

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विजयादशमी राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का स्थापना दिवस है. इस दिन संघ के सर संघचालक देश-विदेश में फैले स्वयंसेवकों के साथ ही संघ से जुड़े संगठनों को जिसमें भाजपा भी शामिल है जो आज केंद्र में सत्ता में है, दिशा-निर्देश प्रदान करते हुए अपना भाषण देते हैं.

यही दिन मोदी ने अपने ‘मन की बात’ कहने की शुरुआत करने के लिए चुना. अपने 'मन की बात' कहने के लिए उन्होंने आकाशवाणी को माध्यम बनाया.

सोशल मीडिया के दौर में सरकारी आकाशवाणी लगभग हाशिए पर है लेकिन इसकी पहुंच सुदूर गांवों तक है जहां आदिवासी, किसान, खेत मजदूर, गरीब, वंचित लोग रहते हैं.

मोदी का अब तक का संवाद शहरी मध्यम वर्ग तक सीमित रहा. खूब-खूब बोलने यानी लंबा लंबा भाषण देने की ख्याति अर्जित कर चुके नरेंद्र मोदी ने आज अपना सबसे संक्षिप्त उद्बोधन दिया.

रेडियो जॉकी जैसा स्टाइल

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उनकी बातों से ऐसा लग रहा था मानो कोई प्रधानमंत्री नहीं बल्कि रेडियो जॉकी बात कर रहा हो और अपने श्रोताओं से सवाल-जवाब कर रहा हो.

शिक्षक दिवस पर भी बच्चों से रूबरू होते हुए उन्होंने अपने बचपन की शरारतों के किस्से सुना कर लोगों को सम्मोहित करने की शैली अपनाई थी.

मोदी अपनी बात लोगों तक पहुंचाने में मीडिया का बेहतरीन उपयोग करना तो जानते ही हैं, वे यह भी बखूबी जानते हैं कि समाज के किस वर्ग से संवाद करने के लिए उनकी शैली क्या हो.

उनकी शैली का यह अंतर (वेरियेशन) मेडिसन स्क्वायर गार्डन, मेक इन इंडिया, शिक्षक दिवस, स्वच्छ भारत व मन की बात प्रसंगों में देखा जा सकता है.

मोदी को यह भी पता है कि लोग उनसे क्या सुनना चाहते हैं और वे लोगों को निराश भी नहीं करते.

प्रधानमंत्री के रूप में उनके भाषणों में लोकसभा चुनाव के दौरान के उनके चुनाव अभियान की छाप भी देखने को मिलती है.

वास्तव में यह उनके संवाद अभियान की निरंतरता है. जो टेंपो उन्होंने चुनाव के दौरान अपने पक्ष में बनाया था, उसे वे कायम रखने की कोशिश करते हैं जिससे उनके प्रति लोगों में आकर्षण कम होने के बजाय बढ़ता ही रहे.

दूर दराज़ तक पहुंचना

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प्रधानमंत्री बन जाने के बाद आमतौर पर संवाद की दृष्टि से राजनेताओं की भूमिका बदल जाती है लेकिन मोदी के साथ ऐसा नहीं हुआ.

वे जानते हैं कि उन्हें सीटों के रूप में स्पष्ट बहुमत जरूर मिला है लेकिन वोट शेयर महज 31 फीसदी है.

वे प्रधानमंत्री के रूप में अपने वोट-शेयर या जनाधार को विस्तार देने में लगे हुए हैं इसलिए वो देश की जनता तक अपनी बात पहुंचाने का कोई अवसर नहीं छोड़ते, बल्कि नए-नए अवसर बनाते रहते हैं और इसके माध्यम से अपने समर्थकों के नए-नए वर्ग को संबोधित करते हैं.

शिक्षक दिवस पर खुद शिक्षक बनकर उन्होंने उन विद्यार्थियों से संवाद किया जो अगले चुनाव में मतदाता बनने वाले हैं तो आज विजयादशमी पर दूरदराज के गांव वालों को अपने रडार में लिया.

वे अपने सभी भाषणों व संवादों में सवा सौ करोड़ भारतीयों के गौरव और पुरूषार्थ की बात करते हैं.

आज अपने मन की बात में भी उन्होंने सवा सौ करोड़ भारतीयों को अपनी ताकत व विश्वास बताया.

दरअसल वे अपने आपको सवा सौ करोड़ भारतीयों का प्रतिनिधि बताते हुए उन तक पहुंचने की कोशिश करते हैं जो उनके अपने वोट-शेयर या जनाधार को विस्तार देने की योजना का हिस्सा है.

सफलता को दीर्घजीवी बनाने की कोशिश

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प्रतीकों व संकेतों का अपने पक्ष में उपयोग करने की महारत उन्होंने अपने चुनाव अभियान में दिखाई ही, अब उसे वे आगे बढ़ा रहे हैं.

संघ की स्थापना दिवस विजयादशमी के दिन अपने मन की बात कहने की शुरूआत कर उन्होंने संघ से अपने जुड़ाव को तो कायम रखा लेकिन बात वे गांधी की करते हैं, खादी के उपयोग की भी करते हैं.

वैसे भी वो अपने आपको दीनदयाल उपाध्याय, श्यामा प्रसाद मुखर्जी, सावरकर या हेडगेवार से जोड़ने के बजाय सरदार पटेल व गांधी से जोड़कर अपनी एक उदार छवि बनाने का प्रयास करते नजर आते हैं.

नरेंद्र मोदी इस बात से भली-भांति वाकिफ हैं कि एक मध्यम स्तर के राज्य गुजरात के मुख्यमंत्री से देश के प्रधानमंत्री तक बनने की यात्रा उन्होंने महज चंद महीनों में पूरी कर ली.

उनकी इस सफलता में यूपीए सरकार के खिलाफ आक्रामक व चुटीले भाषण शैली का महत्वपूर्ण योगदान रहा लेकिन वे अपने आपको देश के बड़े वर्ग से परिचित नहीं करा सके हैं.

ऐसी सफलता को दीर्घजीवी बनाने की कोशिश में नरेंद्र मोदी अलग अलग स्तर पर संवाद करने तथा संवाद के लिए नए नए माध्यमों का प्रयोग करने की रणनीति पर काम कर रहे हैं.

उन्होंने इसके लिए न्यूज चैनलों जिसे मुख्यधारा का मीडिया भी कहा जाता है, का सहारा न लेकर अन्य मंचों का ऐसा उपयोग करते हैं कि समूची मीडिया उनके प्रचार को विवश हो जाए.

‘मन की बात’ के लिए ऑल इंडिया रेडियो का उपयोग उनका ऐसा ही प्रयोग है.

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आने वाले समय में सूचना प्रसारण मंत्रालय के अन्य ऐसे प्रभागों का उपयोग भी वे अपने संवाद के लिए कर सकते हैं जो फाइलों में कैद हो चुके हैं.

हालांकि उनकी यह रणनीति सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय को समाप्त करने के उनके ही मंत्री के प्रस्ताव को निरर्थक साबित करती है.

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