राजस्थान: स्कूली बच्चों की बढ़ी मुश्किलें

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राजस्थान के बहुत से स्कूलों में इन दिनों 'स्कूल चलें हम' का नारा फीका पड़ गया है.

प्रदेश के करीब 17,129 प्राथमिक और माध्यमिक विद्यालयों को मिलाने के राज्य सरकार के फैसले का विद्यार्थी, शिक्षक और अभिभावक विरोध कर रहे हैं.

माना जा रहा है कि इससे वर्तमान स्कूल पिछड़े और गरीब तबके के बच्चों की पहुँच से दूर चले गए हैं.

आभा शर्मा की विशेष रिपोर्ट

इससे अल्पसंख्यक और उर्दू, सिन्धी, पंजाबी जैसे भाषाई माध्यम वाले स्कूल भी प्रभावित हुए हें.

समायोजित स्कूलों की अधिक दूरी, दुर्गम रास्ते या भाषा अथवा जातिगत समस्याओं के चलते बच्चे इन नए स्कूलों में नहीं जा रहे हैं.

एडमिशन पर असर

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भारत ज्ञान विज्ञान समिति राजस्थान की अध्यक्ष कोमल श्रीवास्तव के मुताबिक, "सरकार के इस निर्णय से लगभग 10 लाख बच्चे और लाखों शिक्षक प्रभावित हुए हैं."

वो कहती हैं, "राजस्थान में कुल सरकारी स्कूल 80,000 से अधिक हैं और अगस्त में किए गए समायोजन से प्रदेश के 22 फीसदी स्कूल बंद हो जाएंगे. अकेले राजधानी जयपुर में ही कुल 71 स्कूलों में 9,399 नामांकन थे, जिसमें से 840 बच्चों ने अब मज़बूरी में स्कूल आना बंद कर दिया है जो लगभग 10 प्रतिशत है."

उन्हें आशंका है, "समावेशित स्कूलों में नहीं जाने वाले बच्चों का प्रतिशत 70 से 100 प्रतिशत के बीच है."

ऐसा अनुमान है कि एकीकरण की इस मुहिम से बड़ी संख्या में ड्रॉप आउट होंगे और बालिका शिक्षा को भी झटका लगेगा क्योंकि कई जगहों पर बालिका विद्यालयों को सह शिक्षा विद्यालयों में समायोजित किया जाने से बालिकाएं स्कूल नहीं जा रही हैं.

शिक्षकों को भी वेदना

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जयपुर से लेकर आदिवासी बहुल बारां और बूंदी जिलों और रेगिस्तानी जिले जैसलमेर तक सरकार के इस निर्णय से उहापोह है.

सरकार को शिक्षकों और अभिभावकों ने आग्रह भेजे हैं. और जगह जगह हो रहे विरोध के चलते सरकार ने जिला कलेक्टरों और विधायकों को इन आपत्तियों की जांच करने को कहा है ताकि समस्या का हल निकाला जा सके.

प्राथमिक विद्यालयों के कुछ शिक्षकों ने अदालत की शरण लेकर समायोजित स्कूल में उनके तबादले पर 'स्टे' लिया है.

राजस्थान हाई कोर्ट ने उनकी प्रार्थना पर सुनवाई के बाद सरकार से भी इस निर्णय की प्रासंगिकता पूछी है और एक शपथ पत्र के माध्यम से बताने को कहा है कि क्या सरकार ने इस सम्बन्ध में कोई सर्वे किया था.

अभी तक प्राथमिक विद्यालय पंचायती राज के तहत आते हैं पर समावेशन के बाद शिक्षा विभाग के तहत आ जाएंगें. शिक्षक संघ इसे संवैधानिक भावना का उल्लंघन मान रहे हैं.

निजीकरण को बढ़ावा

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Image caption राज्य में कई स्थानों पर स्कूलों में आधारभूत सुविधाओं की कमी है.

राजस्थान राज्य बाल अधिकार संरक्षण आयोग के सदस्य विशम्भर कहते हैं कि 'चलाने योग्य नहीं' और आर्थिक कारणों से स्कूलों को बंद करने के बहाने सरकार निजीकरण को बढ़ावा दे रही है. यह शिक्षा के कानून का उल्लंघन है और सरकार को इस पर पुनर्विचार करना चाहिए.

समावेशित स्कूलों को जिन स्कूलों के साथ जोड़ा गया है उन्हें 'आदर्श विद्यालय' कहा जा रहा है.

लेकिन कई जगहों पर आधारभूत सुविधाओं जैसे स्वच्छ जल, शौचालयों अथवा क्लासरूम्स की भी कमी है.

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