गुजराती बनाम मराठी में फ़ायदा किसको?

नरेंद्र मोदी, महाराष्ट्र चुनाव, पोस्टर

महाराष्ट्र में शिव सेना और भारतीय जनता पार्टी के 25 साल पुराने गठबंधन के टूटने के बाद राज्य विधानसभा चुनाव में मराठी बनाम गुजराती का मुद्दा ज़ोर पकड़ता जा रहा है.

शिव सेना प्रमुख उद्धव ठाकरे ने एक रैली में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की तुलना शिवाजी के विरोधी औरंगजेब के सेनापति अफ़ज़ल ख़ान से की.

वहीं भाजपा इसे मुद्दा ही नहीं मानती. पार्टी के नेता कहते हैं उनकी पार्टी उतनी ही गुजरातियों की है जितनी मराठियों की.

लेकिन शिव सेना में गुजराती विरोधी भाव बढ़ता जा रहा है.

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि मराठी बनाम गुजराती के मुद्दे का फ़ायदा भाजपा हो सकता है. आम जनता भी कमोबेश ऐसी ही राय रखती है.

ज़ुबैर अहमद का आकलन

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Image caption शिव सेना नेता उद्धव ठाकरे ने एक भाषण में नरेंद्र मोदी की तुलना औरंगजेब के सेनापति अफजल ख़ान से की.

अतुल शाह मुम्बा देवी सीट से भारतीय जनता पार्टी के उम्मीदवार हैं.

वो ख़ुद को मराठी मानते हैं लेकिन उनके पूर्वज गुजराती थे. अतुल शाह की तरह मुंबई में लाखों की संख्या में गुजराती पृष्ठभूमि के लोग आबाद हैं लेकिन वो ख़ुद को मराठी मानते हैं.

सभी पार्टियों में अतुल शाह जैसे लोग मौजूद हैं. शिव सेना अकेली ऐसी पार्टी है जिसे गुजरातियों ने अपनाया नहीं.

तो इस गुजराती बनाम मराठी मुद्दे में फ़ायदा किसका होगा और नुकसान किसका?

भाजपा के महाराष्ट्र इकाई के प्रवक्ता माधव भंडारी कहते हैं, "यहाँ के सभी मराठी मतदाता शिव सेना की संपत्ति तो हैं नहीं. वो सभी पार्टियों में बटे हैं. इसी तरह से गुजराती भी सभी पार्टियों में बटे हैं."

लेकिन परम्परागत रूप से गुजराती भाजपा को वोट देते आए हैं और शिव सेना से दूर रहे हैं.

वैसे भी ये मुद्दा मुंबई और इसके आसपास के चुनावी क्षेत्रों के अलावा कहीं और मायने नहीं रखता.

भंडारी कहते हैं कि ये मुद्दा इस क्षेत्र की केवल 70 सीटों तक सीमित है.

गुजराती

मुंबई और इसके आसपास के इलाक़ों में मराठी लोगों की आबादी 17 प्रतिशत है जबकि गुजरातियों की 23 प्रतिशत.

भाजपा के नेता कहते हैं कि ये गुजराती उनकी जेब में हैं. माधव भंडारी कहते हैं, "इसके अलावा मराठी वोटर भी उन्हें भारी संख्या में वोट देंगे. तो नुकसान किसका होगा?

राजनीतिक जानकार धीरेन्द्र ओझा कहते हैं, "भाजपा को मराठी वोट भी मिलेंगे लेकिन शिव सेना को गुजराती वोट नहीं मिलेंगे."

मुंबई के एक प्रसिद्ध मुस्लिम नेता हबीब फकीह अभी-अभी राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी छोड़ कर भाजपा में आए हैं.

वो स्पष्ट तरीके से इस मुद्दे को समझाते हैं, "शिव सेना ने ये मुद्दा हमेशा उठाया है जिसके कारण उसे गुजराती वोट नहीं मिलते हैं. ये मुद्दा एक बार फिर उठाकर शिव सेना इस कोशिश में लगी है कि वो मराठी वोटर जो अब तक उसे नज़रअंदाज़ करते रहे हैं, इस बार उसे वोट दें"

कृपाशंकर सिंह कांग्रेस के एक बड़े स्थानीय नेता हैं जो यहाँ उत्तर प्रदेश से आकर बसे हैं. वो इस चुनाव में कलीना से उम्मीदवार भी हैं.

वो शिव सेना के पक्ष को समझाते हुए कहते हैं, "प्रधानमंत्री यहाँ आते हैं और केवल गुजरात की बातें करते हैं. वो केवल गुजरात के प्रधानमंत्री हैं या पूरे देश के?"

सियासी जुआ

गुजरात की मुख्यमंत्री आनंदीबेन हाल ही में मुंबई आईं और मुंबई के उद्योगपतियों को गुजरात में निवेश करने का निमंत्रण दिया.

इससे यहाँ महाराष्ट्र के लोगों में नाराज़गी बढ़ी, जिसका फ़ायदा शिव सेना ने उठाने की कोशिश की है. लेकिन ये एक सियासी जुआ है.

कुछ विशेषज्ञ तो 15 अक्तूबर को होने वाले चुनाव से काफ़ी पहले ही कह चुके हैं कि इससे शिव सेना को भारी नुकसान होगा.

कप्तान मलिक इस चुनाव में कलीना चुनावी क्षेत्र से कृपाशंकर सिंह के ख़िलाफ़ चुनाव लड़ रहे हैं और महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना छोड़कर एनसीपी में आए हैं.

उनका कहना है कि जाति, प्रांत और समुदाय के नाम पर वोट मांगने वालों को चुनाव में नाकामी मिलेगी.

तीन तरह के वोटर

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कप्तान मलिक की एक रैली में एक सरदार जी मिले जिन्होंने गुजराती बनाम मराठी मुद्दे की ज़बर्दस्त समीक्षा की.

उऩ्होंने कहा, "निजी रूप से मैं कहूँगा मोदी ने इसकी शुरुआत की. मोदी ने शिव सेना को चारा दिया और उद्धव उसमे फँस गए."

वो आगे कहते हैं, "तीन तरह के मराठी वोटर हैंः एक प्रांतीय, दूसरे सांप्रदायिक और तीसरे विकास के नाम पर वोट देने वाले. पहली श्रेणी वाला वोटर शिव सेना को वोट देगा, दूसरे और तीसरे श्रेणी के वोटर भाजपा को वोट डालेंगे."

"और पहली श्रेणी के वोटर महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना को भी वोट देंगे तो इसका मतलब ये हुआ कि मुंबई और इसके आस पास शिव सेना को ज़बरदस्त नुकसान हो सकता है."

यही राय यहाँ आम लोगों की है.

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