पाकिस्तान में बेगम अख़्तर के दीवाने हैं?

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साल 2014 बेगम अख़्तर की जन्म शताब्दी का साल है. 1914 में जन्मीं बेगम अख़्तर ने ग़ज़ल गायकी और ठुमरी, दादरा गायकी को नया मक़ाम दिया.

कोठों पर जन्मी ग़ज़ल को आमफ़हम बनाने का श्रेय बेगम अख़्तर जैसी गायिकाओं को जाता है.

बेगम अख़्तर ने ग़ज़ल गायिकी को उसी सादगी से निभाया जिस रवायत में उसे कोठों पर गाया जाता था.

पढ़ें, वुसतुल्लाह ख़ान का ब्लॉग

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Image caption बेगम अख़्तर का जन्म उत्तर प्रदेश के फैजाबाद में हुआ था.

पाकिस्तान में बेगम अख़्तर को कोई नहीं जानता, हाँ अख़्तरी बाई फ़ैजाबादी का नाम लिया जाए तो हाय...क्या आवाज़ थी कहने वाले बहुत से बूढ़े आज भी मिल जाते हैं और ये भी पूछते हैं कि मियाँ फिर तो तुम तो अमीर बाई कर्नाटकी और जोहराबाई अम्बालेवाली को भी जानते होगे. और मियाँ यानी मेरे पास बात बदलने के सिवा कोई रास्ता नहीं होता.

कराची में म्यूज़िक की सैकड़ों दुकानों में से सिर्फ एक या दो ही दुकानें हैं जहाँ बेगम अख़्तर की कुछ गायकी आज भी मिल जाती है. मगर इससे ज़्यादा ठुमरियाँ और ग़ज़लें इंटरनेट पर पड़ी हैं.

कुछ लोग अब भी जिंदा हैं जिन्हें लाहौर और कराची में बेगम अख़्तर को सामने बैठकर सुनने को मिला है.

इनमें बहादुर शाह जफर के उस्ताद तानरस ख़ान के पड़पोते, ख़ान साहब उमराव ख़ान के पोते और ख़ानसाहब सरदार ख़ान दिल्लीवाले के बेटे इब्राहिम ख़ान भी शामिल हैं.

पहला रिकॉर्ड

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इब्राहिम ख़ान ने बेगम अख़्तर का पहला ग्रामोफ़ोन रिकॉर्ड 1942 में ख़रीदा था जिसका आधा टुकड़ा आज भी सुरक्षित है.

बेगम अख़्तर जब भी लखनऊ से दिल्ली आतीं तो ख़ान साहब सरदार ख़ान को ज़रूर सलाम करने घर आतीं.

इब्राहिम ख़ान बताते हैं कि जब विभाजन के बाद बेगम अख़्तर पहली बार 1959 में लाहौर में पाकिस्तान म्यूज़िक कांफ्रेंस में भाग लेने के लिए आईं तो दिल्ली के ज़माने की नियाजबंदी के ताल्लुक से बेगम ने उन्हें अपनी जीवनकथा की कुछ झलकियाँ सुनाईं.

जैसे ये कि सात-आठ वर्ष की उम्र में उन्होंने कलकत्ता में ईस्ट इंडिया थिएटर कंपनी के लिए न सिर्फ़ चाइल्ड एक्टर के तौर पर काम किया बल्कि गाया भी.

कलकत्ते में उन्होंने बहुत से गुरुओं से गायकी के अंदाज सीखे मगर उनको उस्ताद झण्डे ख़ान साहब से मिलने वाली परीक्षा के बाद कुछ लगा कि कला के सिरे का एक धागा उनके हाथ भी आ गया है.

इब्राहिम ख़ान कहते हैं कि शुद्ध राग अक्सर खुरदुरे होते हैं मगर बेगम अख़्तर न सिर्फ़ बातचीत में नर्म थीं, बल्कि उनके गले से सुर भी मुलायम होकर निकलते थे.

1970 में बेगम अख़्तर कराची आईं. उस ज़माने में इब्राहिम ख़ान रेडियो पाकिस्तान, कराची में थे. रेडियो पाकिस्तान ने बेगम अख़्तर से दो-तीन ग़ज़लें और एक ठुमरी रिकॉर्ड की.

गायकी का मेयार

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इब्राहिम ख़ान बताते हैं कि जब उन्होंने बेगम अख़्तर से पूछा कि उनकी कोई ऐसी फरमाइश जिसे वो पूरा कर सकें तो बेगम अख़्तर ने प्रसिद्ध कवि बहज़ाद लखनवी और लोक गायिका रेशमा से मिलने की फरमाइश की.

उनसे मिलकर वो ऐसी ख़ुश हुईं कि जब इब्राहिम ने कहा कि मैं आपकी दावत करना चाहता हूँ तो बेगम अख़्तर ने कहा, "अरे मियाँ, तुमने हमारी बहज़ाद साहब और रेशमा से जो मुलाकात करा दी तो इससे बड़ी गिजा हमें क्या मिलेगी."

इब्राहिम ख़ान चूँकि ख़ुद दिल्ली घराने के चश्मोचराग हैं इसलिए उनसे ये पूछना ज़रूर बनता था कि वो बेगम अख़्तर की गायकी कहाँ पर देखते हैं. इब्राहिम ख़ान ने मुझसे पूछा कि जो समझता हूँ वो कहूँ या तुम्हारा दिल रख लूँ.

फिर ख़ुद ही कहने लगे कि कोई भी हो वो कला की तमाम शाखाओं पर पैर नहीं रख सकता और हर बड़े कलाकार को यह बात मालूम होती है. इसीलिए बेगम अख़्तर ने ख़ुद को ग़ज़ल, ठुमरी और दादरे की गायकी तक ही रखा मगर इस मैदान का हक़ अदा कर दिया.

लय, सुर और ताल

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बेगम अख़्तर जिस समय की आवाज़ हैं उस ज़माने में वैसे भी कम गायिकाएँ थीं जो सेमी-क्लासिकल में मशहूर हुईं. अगर कोई इक्का-दुक्का नाम थे भी तो वो शास्त्रीय संगीत में थे, जैसे केसरबाई या हीराबाई बड़ौदकर वगैरह.

लेकिन बेगम अख़्तर के ज़माने में ग्रामोफ़ोन रिकॉर्डिंग और रेडियो प्रसारण आम आदमी तक पहुँच चुके थे. इसलिए बेगम अख़्तर की अधिक गायकी महफूज भी हो गई और ज़्यादा से ज़्यादा लोगों तक उनका नाम भी पहुँच गया.

रही बात कि आज के पाकिस्तान में बेगम अख़्तर को कितने लोग जानते हैं, तो इब्राहिम ख़ान कहते हैं, "मुझे अब इस पर कोई दुख नहीं होता. क्योंकि लोग तो अब बड़े ग़ुलाम अली ख़ान, बरकत अली ख़ान, रोशनआरा बेगम, मुख़्तार बेगम और जाहिदा परवीन को भी नहीं जानते."

वे कहते हैं, "वैसे भी यह वो युग है जिसमें लय, सुर और ताल से ज़्यादा महत्वपूर्ण पब्लिक रिलेशनिंग और भाग्य को समझा जाता है. तो ऐसे समय में किसका किसको जानना, न जानना, सब बराबर है."

रिवायत

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नेशनल एकेडमी ऑफ़ परफॉर्मिंग आर्ट्स, कराची में थिएटर आर्टस के डाइरेक्टर खालिद अहमद के पास बेगम अख़्तर की गायकी का अच्छा ख़ासा कलेक्शन है.

खालिद अहमद कहते हैं, "उर्दू ग़ज़ल गायकी सबसे पहले कोठे पर उतरी. बेगम अख़्तर ने ग़ज़ल को उसी सादगी और समझबूझ के साथ, शेर के वज़न और अर्थ का पूरा सम्मान करते हुए खामखाँ की फ़नकारियाँ और मुफ़्त की मुरकियाँ दिखाने से बचते हुए उसी तरह गाया जो कोठे की ग़ज़ल गायकी का रिवायती अंग है. उन्होंने ग़ज़ल म्यूज़िक के शोर में नहीं छुपाई बल्कि म्यूज़िक को बस गायकी में सहायता के लिए इस्तेमाल किया और मेरे नज़दीक यही ग़ज़ल का मूल अंग है."

ग़ज़ल आज भी गाई जा रही है लेकिन जब से ग़ज़ल गायकी में रिवायती घरानों के बजाय मिडिल क्लास से गुलुकाराएँ आईं हैं तब से ग़ज़ल की गायकी को भी पतली आवाज़ में विनम्रता के साथ गाना ज़रूरी समझा जाने लगा क्योंकि मिडिल क्लास में गले और आवाज़ को पूरा खोलना आज भी महिलाओं के लिए बुरा समझा जाता है.

सेमी और लाइट क्लासिकल लता जी, नूरजहाँ और चित्रा सिंह समेत बहुत से कलाकारों ने गाया लेकिन ठुमरी, दादरे और ग़ज़ल गायकी निभाने में बेगम अख़्तर, इक़बाल बानो, फरीदा खानम, आबिदा परवीन और शुभा मुद्गल की गुणवत्ता बेमिसाल है.

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