बाढ़ के बाद की बेबसी

ग़ुलाम मोहम्मद का परिवार, कश्मीर इमेज कॉपीरइट Majid Jahangir

सितंबर में जम्मू-कश्मीर में आई बाढ़ में हज़ारों लोग बेघर और तबाह हो गए. उस समय भारत सरकार ने अपने राहत कार्यों को लेकर तमाम बड़े-बड़े दावे किए लेकिन ज़मीनी हक़ीक़त थोड़ी अलग है.

सरकार की तरफ़ से जिस मदद का वादा किया गया था वो सभी लोगों तक नहीं पहुँचा है.

वहीं सर्दी की आमद ने राहत शिविरों में रहने वालों की मुश्किल बढ़ा दी है. आम लोगों को उम्मीद है कि सरकार उनके लिए घर की व्यवस्था करेगी.

हालांकि सरकारी अधिकारी और प्रदेश के मुख्यमंत्री राहत कार्यों में तेज़ी लाने की बातें ज़रूर कर रहे हैं.

पढ़ें माजिद जहाँगीर की रिपोर्ट

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Image caption भारत प्रशासित जम्मू एवं कश्मीर के मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला ने राहत कार्य में तेज़ी लाने की बात कही है.

श्रीनगर के चतबल इलाक़े के रहने वाले गुलाम मोहम्मद के घर की पहली मंज़िल सात सितंबर की बाढ़ में बिल्कुल तबाह हो चुकी है. अब गुलाम मोहम्मद अपने तीन छोटे बच्चों और पत्नी के साथ मकान के ऊपरी मंज़िल के एक कमरे में रहते हैं.

सरकार से ख़फ़ा गुलाम मोहम्मद सरकार के वादों को झूठा बताते हैं. उनका कहना है कि सरकार ने बाढ़ के बाद जो ऐलान किए उनमें कोई सच्चाई नहीं है.

वो कहते हैं, "सरकार ने एलान किया था कि बाढ़ पीड़ितों को छह महीने के लिए मुफ़्त चावल दिया जाएगा लेकिन मेरे परिवार को अभी तक एक महीने का भी चावल नहीं मिला."

गुलाम मोहम्मद पेशे से मज़दूर हैं जो मुश्किल से अपने परिवार का पेट पालते हैं.

बर्फ़बारी का ख़ौफ़

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गुलाम मोहम्मद को ख़ौफ़ है कि कुछ ही दिनों के बाद कश्मीर में बर्फ़बारी हो जाएगी तो उनका जर्जर मकान गिर जाएगा.

वो कहते हैं, "मैं अब किराए के मकान में रहने जा रहा हूँ. इस मकान में रहने का मतलब है जान को जोखिम में डालना."

यही हाल इसी मुहल्ले में रहने वाले मोहम्मद अमीन का भी है. अमीन बाढ़ के दिन से ही अपने परिवार के साथ मकान को छोड़ चुके हैं. उनके मकान का निचला हिसा अंदर से टूट चूका है. वह भी सरकारी वादों को खोखला बताते हैं.

वो कहते हैं, "मैं पूरे एक महीने से भटक रहा हूं, सरकार कहती तो बहुत कुछ है लेकिन ज़मीनी हक़ीक़त कुछ और है. एक महीने से मैं सरकार के घोषित मुफ़्त चावल हासिल करने की कोशिश कर रहा हूँ लेकिन आज तक यही कहा गया कि अभी चावल आया नहीं जब आएगा तो दिया जाएगा."

अमीन कहते हैं, "मेरा पूरा परिवार मुसीबत में है, सरकार ने अभी तक कोई भी मदद नहीं कि हमारी. जाड़े सिर पर हैं, सर्दी शुरू हो चुकी है, समझ नहीं आता कि सर्दी का मुक़ाबला इस बार कैसे करें"

बढ़ती सर्दी

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ऐसे कई सारे परिवार हैं जो या तो राहत शिविरों में रह रहे हैं या फिर रिश्तदारों या दोस्तों के घरों में.

कुलसुम बेगम ज़िला कुलगाम के केलाम के राहत शिविर में पिछले एक महीने से रह रही हैं. कुलसुम के लिए सबसे बड़ी मुश्किल खुले में खाना बनाना और सर्दी है.

कुलसुम का घर पानी बहा कर ले गया है. वो कहती हैं, "जिन हालात से हम गुज़र रहे हैं काश उन हालात से यहाँ का कोई मंत्री गुज़रे फिर उनको हमारी मुश्किलों का एहसास होगा. इन चुल्हों का धुआँ हर समय हमारे अंदर चला जाता है और हम बीमार हो जाते हैं."

वह कहती हैं, "या तो हमारी सरकार हमारा लिए कोई उपाय करे या फिर हमारा क़त्ल करा दे."

चावल

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सरकार की तरफ़ से इस शिविर में रहने वाले हर एक कुनबे को 75 हज़ार का चेक दिया गया है और 50 किलो प्रति महीने चावल मुफ़्त दिया जा रहा है लेकिन इस क़दम से ये लोग सहमत नहीं हैं. इनकी मांग है कि इनको मकान बनाने के लिए ज़मीन दी जाए.

तीन बच्चों की माँ हसीना कहती हैं, "सरकार के दावों की ज़मीनी हक़ीक़त ऐसी है कि हमको अभी तक ज़मीन नहीं मिली. ठण्ड में बाहर खुले में खाना बनाना पड़ता है. गरम कपड़ों का कोई इंतज़ाम नहीं है, न ही हीटिंग का. क्या 75 हज़ार में कोई मकान बनाया जाता है?"

कश्मीर में पिछले एक हफ़्ते में रात के तापमान में दो डिग्री कमी आई है और अब हर गुज़रते दिन के साथ सर्दी मे इज़ाफ़ा होगा.

राहत कार्य में तेज़ी

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मौसम विभाग के डायरेक्टर सोनम लोटस ने बताया कि पिछले दिनों ऊपरी इलाकों में हुई बर्फबारी के कारण सर्द हवाओं में तेज़ी आई है जिसके कारण कुछ सर्दी बढ़ गई है.

कश्मीर के डिविज़नल कमिश्नर रोहित हंसल कहते हैं कि हमने बाढ़ पीड़ितों के लिए छह महीने तक मुफ़्त राशन देने का एलान किया है.

मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला ने 10 अक्तूबर को अपने सभी अधिकारियों को आदेश दिया कि वो बाढ़ पीड़ितों तक राहत पहुँचाने में तेज़ी लाएँ.

लेकिन सरकारी वादे और राहत कार्यों का असर अवाम तक कब पहुँचेगा, यह वक़्त ही बताएगा.

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