दुनिया भर के सीईओ भारत की ओर क्यों दौड़े?

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मार्क ज़करबर्ग, सत्य नडेला, और जेफ़ बेज़ोस इन तीनों में आम क्या है?

फ़ेसबुक, माइक्रोसॉफ्ट और एमेज़न के शीर्ष अधिकारी इन तीनों ने हाल ही में भारत की यात्रा की है.

ये दुर्लभ मौका है जब 'फॉर्चून 500' सूची में शामिल अमरीका अधारित ग्लोबल कंपनियों के तीन प्रमुख एक पखवाड़े में भारत आए हों. क्यों आ रहे हैं वे यहां?

प्रशांत के रॉय का विश्लेषण

भारत दुनिया में एक उभरता हुआ बाज़ार है. कइयों के लिए ये चीन से भी बड़ा बाज़ार है. चीन में कई सारी बंदिशें हैं. मसलन चीन में फ़ेसबुक, ट्विटर, और यू-ट्यूब पर पाबंदी है.

लेकिन ये अभी ही क्यों आ रहे हैं? नई सरकार इसका बहुत बड़ा कारण है.

बड़ी बात यह है कि ग्लोबल कंपनियों के इन प्रमुखों की यात्राएं खुदरा व्यापार में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश और आधारभूत संरचना जैसे नीतिगत मसलों से जुड़ी हुई है.

वे मंत्रियों से मिलना चाहते हैं यहां तक कि प्रधानमंत्री से भी. भारत के आम चुनाव से पहले के छह महीनों में ये अधिकारी व्यस्त थे. अगर वे मिलते भी तो बहुत कुछ नहीं हो सकता था.

प्रशिक्षण

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तब इस बात के संकेत मिलने लगे थे कि यूपीए की सरकार जाने के कगार पर है.

इस कारण से दुनिया की शीर्ष कंपनियों के अधिकारियों का भारत की ओर कोई ध्यान नहीं था.

सरकार के साथ संबंध माक्रोसॉफ्ट की प्रबंधकीय व्यवस्था का मुख्य बिंदु होता है.

मानव संसाधन विकास मंत्रालय सरकारी स्कूल और कॉलेजों के लिए 'माइक्रोसॉफ्ट' या 'ऑफिस' की खरीददारी तय कर सकता है. और किसी मंत्रालय की ओर से हरी झंडी मिलने का मतलब है बड़ी संख्या में ऑर्डर मिलना.

इसी कारण आजकल भारत में जन्मे और पढ़े-लिखे माइक्रोसॉफ्ट के सीईओ सत्य नडेला मानव संसाधन मंत्री स्मृति ईरानी के साथ देखे गए.

माइक्रोसॉफ्ट के लिए शिक्षा बहुत मायने रखती है. ये भारत में हज़ारों शिक्षकों को माइक्रोसॉफ्ट ऑफिस के इस्तेमाल में प्रशिक्षित कर चुका है.

नई चुनौती

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इससे लाखों छात्रों को माइक्रोसॉफ्ट ऑफिस सीखने में मदद मिल सकती है.

फ़ेसबुक पर बढ़ते यूजर्स की संख्या ने फ़ेसबुक की चुनौती को बढ़ा दिया है.

ये बात 1.4 अरब यूजर्स वाली कंपनी के लिए सुनने में अचरज भरा लगता है लेकिन इसका पुराना बाज़ार अब ठंडा पड़ चुका है और भारत जैसे उभरते बाज़ार से अब अरबों नए यूजर्स आने वाले हैं.

मोबाइल फ़ोन पर बढ़ती निर्भरता के कारण ये हो रहा है. फ़ेसबुक पर भारत में अभी 10 करोड़ सक्रिय यूजर्स हैं.

भारत के 25 करोड़ इंटरनेट यूजर्स में से अधिकांश पूरी तरह से इंटरनेट का इस्तेमाल नहीं करते हैं. ये अक्सर अपने मोबाइल ऑपरेटर के पोर्टल या सिर्फ एक ही ऐप्लिकेशन जैसे 'व्हाट्स एप' या 'फ़ेसबुक फॉर एवरी फ़ोन' तक ही सीमित रहते हैं.

'फ़ेसबुक फॉर एवरी फ़ोन' सस्ते फोन पर भी इस्तेमाल किए जा सकते हैं. दस में से नौ अपने मोबाइल फ़ोन पर ही इंटरनेट का इस्तेमाल करते हैं.

बढ़ता दायरा

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अब मोदी सरकार ने 'डिजिटल इंडिया' योजना के तहत 'internet.org' प्रोजेक्ट के माध्यम से 2019 तक सभी भारतीयों को इंटरनेट से जोड़ने का लक्ष्य रखा है.

इसमें फ़ेसबुक की काफ़ी दिलचस्पी है. आलोचकों का कहना है कि ये प्रोजेक्ट फ़ेसबुक के यूजर्स को बढ़ाने वाले हैं.

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लेकिन अगर भारत में फ़ेसबुक इंटरनेट तक पहुंच बनाने का जरिया बनता है तो इसमें बुरा क्या है?

लाखों भारतीय सोचते हैं कि फ़ेसबुक ही इंटरनेट है या उसकी शुरूआत है. ऑपरेटर भी मुफ्त और कम पैसे में फ़ेसबुक मुहैया कराके खुश हैं क्योंकि जब यूजर्स अन्य लिंक पर क्लिक करना शुरू करते हैं तो वे जल्दी ही अतिरिक्त डेटा इस्तेमाल से पैसा कमाने लगते हैं.

अमेज़न के लिए भारत का बाज़ार अभी आजमाया हुआ नहीं है. रेटिंग कंपनी क्राइसिल के मुताबिक़ भारत में कुल खुदरा व्यापार 25 लाख करोड़ का है जिसका सिर्फ 0.5 फ़ीसदी ऑनलाइन खुदरा व्यापार का है.

ई-व्यापार

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लेकिन ये बाज़ार में सेंध लगा रहा है और पुराने खुदरा व्यापारियों को नुकसान पहुंचा रहा है. नए ई-व्यापारी भारत में अरबों डॉलर का निवेश कर रहे हैं.

फ्लिपकार्ट ने भारत में अपने व्यापार को बढ़ा कर अरबों डॉलर कमाए हैं और अमेज़न के जेफ़ बेज़ोस ने दो अरब डॉलर के निवेश की घोषणा की है. हाल में फ्लिपकार्ट पर 'बिग बिलियन डे' को हुई खरीदारी ने ऑनलाइन मार्केट में कम कीमत को लेकर होड़ मचा दी है.

लब्बोलुबाब ये है कि भारत में ये कंपनियां व्यापार बढ़ाना चाहती हैं जो उपभोक्ताओं की दृष्टि से भी अच्छा हो सकता है. ई-बाज़ार के बढ़ते घामासान का मतलब है भारतीय ख़रीदारों को सस्ते उत्पाद मिलना.

सरकार अरबों की आबादी वाले इस देश को आगे बढ़ाने की जल्दबाजी में है और ऐसी सरकार हमेशा ग्लोबल कंपनियों के लिए अच्छी होती है.

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