हुदहुद ने उजाड़ा है इनका भी घर

विशाखापत्तनम चिड़ियाघर

समुद्री तूफ़ान हुदहुद ने आंध्र प्रदेश के विशाखापत्तनम में आम जनजीवन के साथ-साथ वहां के चिड़ियाघर को भी भारी नुकसान पहुँचाया है.

670 एकड़ ज़मीन पर फैले इस चिड़ियाघर में दाखिल होते ही पशु-पक्षियों की इस दुनिया में तूफ़ान से हुई बर्बादी के निशान देखे जा सकते हैं.

प्राकृतिक माहौल में बने इस विशाल चिड़ियाघर में अब शायद ही कोई पेड़ बच गया हो.

संदीप साहू की रिपोर्ट

Image caption केयरटेकर रामाकृष्णा का कहना है कि चिड़ियाघर के जानवरों के खाने का इंतजाम पहले ही कर दिया गया था.

बड़े-बड़े पेड़ जो कल तक छांव दिया करते थे अब धरती पर बेजान पड़े हुए नज़र आते हैं. जानवरों के लिए बने कई आश्रयस्थलों से जानवर नदारद हैं.

हालांकि चिड़ियाघर के क्यूरेटर रामलिंगम का दावा है कि तूफ़ान से मारे जाने वाले पशु, पक्षियों की संख्या नगण्य है.

उन्होंने बीबीसी से कहा, "दो-तीन हिरण और कुछ पक्षी ज़रूर मारे गए. लेकिन जिस तरह की ख़बरें मीडिया में छप रहीं हैं वह सरासर गलत है. सभी जानवर और पक्षी अपने अपने आश्रयस्थल में थे. इसलिए उन्हें कोई नुकसान नहीं हुआ."

पिंजरों में बंद

रामलिंगम के दावे को स्वीकार कर भी लिया जाए तो मन में यह सवाल ज़रूर उठता है कि उन दो दिनों में, जब जानवरों की देखरेख करने वाला कोई भी मौजूद नहीं था, पशु-पक्षियों ने क्या खाया-पिया होगा?

इस बारे में पूछे जाने पर चिड़ियाघर के एक अन्य केयरटेकर रामाकृष्ण ने कहा, "चूँकि हमें पहले से ही पता था की तूफ़ान आनेवाला है इसलिए हमने शनिवार को जानवरों को उनके पिंजरों में बंद करने से पहले उनके लिए दो दिन का खाना और पानी रख दिया था."

उन्होंने बताया, "सोमवार को जब हम लोग वापस आए तो हमने सभी जानवरों को सुरक्षित और अच्छे हालात में पाया."

भारी नुकसान

Image caption रेडियो जॉकी सुधा के मुताबिक तूफान से चिड़ियाघर को भारी नुकसान हुआ है.

आमतौर से इस चिड़ियाघर में पर्यटकों की अच्छी चहल-पहल देखने को मिलती है.

लेकिन इस समय वहां पर्यटकों के बजाय पशु प्रेमी स्वयंसेवकों की भीड़ है.

इस भीड़ में हमने रेडियो जॉकी सुधा को ढूंढ़ निकाला, जो तूफ़ान की अगली सुबह ही यहां पहुँच गई थीं.

वे कहती हैं, "तूफ़ान से यहां भारी नुकसान हुआ है. मैं आशा करती हूँ कि जल्दी ही और लोग हमारे साथ हाथ बांटने आ जाएंगे जिससे इस चिड़ियाघर को कम से कम समय में बहाल किया सकेगा."

बरसों लग जाएंगे

Image caption विशाखापत्तनम चिड़ियाघर की स्वयंसेवी ललिता.

एक अन्य स्वयंसेवी ललिता से हमने पूछा कि तूफ़ान से बर्बाद हो गए शहर को छोड़ कर उन्होंने यहां पुनर्वास के काम में सहायता करने की क्यों सोची?

इसपर उनका कहना था, "आदमी तो कम से कम बोल सकता है कि उसे क्या तकलीफ है. लेकिन ये जानवर और पक्षी तो कुछ बोल भी नहीं पाएंगे."

वे कहती हैं, "वैसे भी लोगों की देखभाल करने वाले बहुत हैं. लेकिन इनका हाल पूछने के लिए बहुत कम लोग हैं."

ललिता का मानना है कि चिड़ियाघर को दोबारा जानवरों के रहने लायक बनाने में कम से कम दो महीने का समय चाहिए.

लेकिन यहां हुई तबाही को देखते हुए यह ज़रूर कहा जा सकता है कि इस चिड़ियाघर को फिर पहले जैसा हरा-भरा बनाने में बरसों लग जाएंगे.

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