गौतम अडानीः अच्छे दिनों वाला उद्योगपति!

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ऑस्ट्रेलिया ने 15.5 अरब डॉलर की एक कोयला परियोजना को मंज़ूरी दे दी है.

हालांकि इस प्रोजेक्ट की वजह से पर्यावरण पर पड़ने वाले प्रभाव को लेकर चिंताएं ज़ाहिर की जा रही थीं.

यह सौदा करने वाले भारत के अडानी समूह की कारोबारी रणनीति पर जाने-माने आर्थिक विश्लेषक परंजॉय गुहा ठाकुरता रोशनी डाल रहे हैं.

अडानी को पहले ही ऑस्ट्रेलिया के क्वींसलैंड में कोयले की ढुलाई के लिए एक बंदरगाह बनाने की इजाज़त दी जा चुकी है.

अडानी समूह पर परंजॉय गुहा की रिपोर्ट विस्तार से

मोदी और अडानी

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ऊपर की तस्वीर भारत के अखबारों में 22 मई को प्रकाशित हुई थी. तब जब नरेंद्र मोदी गुजरात से भारत के प्रधानमंत्री पद की शपथ लेने के लिए रवाना हो रहे थे. उस गुजरात से जहां वे 12 साल तक मुख्यमंत्री रहे.

अहमदाबाद हवाई अड्डे पर उन्हें छोड़ने आए लोगों के अभिवादन में जब वे हाथ हिला रहे थे, तो जहाज़ पर प्राइवेट एयरलाइन का लोगो भी साफ़ दिख रहा था, 'अडानी.'

भारत के सबसे अमीर लोगों में एक 52 साल के गौतम अडानी उन कारोबारियों में हैं, जो भारत के सबसे ताकतवर शख्स के साथ अपने क़रीबी रिश्तों को ज़ाहिर करने से गुरेज़ नहीं करता.

1978 में मुंबई के एक कॉलेज की पढ़ाई अधूरी छोड़ने से लेकर हीरों और प्लास्टिक के कारोबार तक. गौतम अडानी ने सचमुच एक लंबा सफ़र तय किया है.

एक वक़्त ऐसा भी आया, जब उनकी दौलत उनके लिए मुसीबत बन गई. 1997 में फ़िरौती के लिए किसी ने उन्हें अगवा कर लिया. इस सिलसिले में एक शख्स पर आज भी मुक़दमा चल रहा है.

कारोबारी हित

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इन दिनों अडानी एक बड़े कारोबार समूह के मुखिया हैं, जो भारत में बंदरगाहों का सबसे बड़े ऑपरेटर है और यही नहीं उनकी बिजली बनाने वाली सबसे बड़ी प्राइवेट कंपनी भी है.

अडानी समूह के कारोबारी हित कोयला उत्खनन, निर्माण क्षेत्र, ढुलाई, अंतरराष्ट्रीय कारोबार, शिक्षा, रियल इस्टेट, खाद्य तेल और अनाज के भंडारण तक में है.

उनकी कंपनी फ़िलहाल 30 से ज़्यादा चीज़ों के कारोबार में लगी है और उनके व्यापारिक हित कम से कम 28 देशों में हैं जिनमें ऑस्ट्रेलिया और इंडोनेशिया भी हैं.

2003-04 के वित्तीय वर्ष में अडानी समूह भारत में सबसे ज़्यादा विदेशी मुद्रा कमाने वाली कंपनी बन गई थी. इसके बाद से गौतम अडानी ने कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा.

अकेले पिछले साल अडानी समूह की कंपनियों की बाज़ार पूंजी में 250 फ़ीसदी से ज़्यादा की वृद्धि दर्ज की गई है.

अडानी के कारोबारी साम्राज्य का टर्न ओवर 2002 के 76.50 करोड़ डॉलर से बढ़कर आज 10 अरब डॉलर तक पहुंच गया है. इत्तेफ़ाक से यह वही दौर था जब नरेंद्र मोदी सत्ता के फ़लक पर तेज़ी से उभर रहे थे.

गुजरात दंगे

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दोनों की दोस्ती 2002 से ही शुरू हो गई थी. यह वही वक़्त था जब गुजरात हिंदू-मुस्लिम दंगों में झुलस रहा था.

व्यापार जगत की संस्था कन्फ़ेडरेशन ऑफ़ इंडियन इंडस्ट्रीज़ (सीआईआई) से जुड़े उद्योगपतियों ने उस वक़्त हालात पर काबू पाने में ढिलाई बरतने के लिए मोदी की आलोचना भी की थी.

तब मोदी गुजरात हिंसा को नज़रअंदाज़ कर इस राज्य को निवेशकों के पसंदीदा ठिकाने के तौर पर पेश करने की कोशिश में थे.

अडानी ने गुजरात के अन्य उद्योगपतियों को मोदी के पक्ष में करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई. उन्होंने सीआईआई के समांतर एक और संस्था खड़ी करने की चेतावनी भी दी थी.

बड़े बंदरगाह

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इसलिए पिछले साल मार्च में जब शिक्षकों और विद्यार्थियों के विरोध के बाद अमरीका के व्हॉर्टन स्कूल ऑफ़ बिज़नेस के एक कार्यक्रम में मोदी का नाम मुख्य वक्ताओं की लिस्ट से हटाया गया, तो उस वक़्त अडानी समूह ने अपनी स्पॉन्सरशिप वापस ले ली थी.

अडानी उस कार्यक्रम के प्रमुख प्रायोजकों में थे. गुजरात सरकार पर अडानी समूह को भारत के सबसे बड़े बंदरगाह मुंदड़ा के लिए बड़े पैमाने पर कौड़ियों के भाव ज़मीन देने के आरोप लगते रहे हैं.

गुजरात के सागर तट पर बने इस बंदरगाह की वजह से पर्यावरण पर पड़ने वाले प्रभाव को लेकर चिंताएं ज़ाहिर की जा रही थीं.

सुप्रीम कोर्ट की मंज़ूरी

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मुंदड़ा बंदरगाह पर दुनिया में कोयले की सबसे बड़ी माल उतराई की क्षमता है. यह बंदरगाह स्पेशल इकॉनॉमिक ज़ोन के तहत बना है, जिसका मतलब होता है कि उसकी प्रमोटर कंपनी को कोई टैक्स नहीं देना होगा.

इस ज़ोन में बिजली प्लांट, निजी रेलवे लाइन और एक निजी हवाई अड्डे का काम कोर्ट के आदेश की वजह से रोक दिया गया था पर इस साल की शुरुआत में सुप्रीम कोर्ट ने पर्यावरण संबंधी औपचारिक मंज़ूरी दे दी थी.

अडानी समूह एक बार फिर ख़बरों में तब आया, जब हाल ही में ऑस्ट्रेलिया सरकार ने इस ग्रुप को कोयले और रेलवे से जुड़ी एक बड़ी परियोजना की इज़ाजत दी. पर्यावरण मुद्दों के लिए काम करने वाले समूह इसका विरोध कर रहे थे.

मीडिया में अडानी

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हाल ही में ऑस्ट्रेलिया की फ़ेयरफ़ैक्स मीडिया ने अहमदाबाद शहर के बाहर बन रही कोठियों में लगे हज़ारों मज़दूरों की कथित बदहाली पर रिपोर्ट छापी थी.

ये मज़दूर अडानी समूह के लिए काम कर रहे ठेकेदारों ने रखे थे. हालांकि अडानी समूह का कहना था कि उसने कोई क़ानून नहीं तोड़ा है.

अडानी की दौलत पर भारत के टैक्स महकमे की भी नज़र रही है.

मई में सरकारी अधिकारियों ने बिजली बनाने के काम में आने वाले उपकरणों के आयात की क़ीमत को कथित तौर पर क़रीब एक अरब डॉलर बढ़ाकर दिखाने के लिए नोटिस जारी किया था.

बुनियादी ढांचा

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2010 के फ़रवरी महीने में अडानी के भाई राजेश अडानी को कथित तौर पर कस्टम ड्यूटी चोरी के मामले में गिरफ़्तार भी किया गया था. वे अडानी ग्रुप के प्रबंध निदेशक हैं.

तमाम ध्यानाकर्षण के बावजूद आमतौर पर यह शक्तिशाली उद्योगपति मीडिया से दूरी बनाकर रहा है. उन्होंने बहुत कम इंटरव्यू दिए हैं और वे टिप्पणियां बहुत सावधानी से करते हैं.

वे दावा करते हैं कि उन्होंने हमेशा क़ानून का पालन किया है.

राजनीतिज्ञों से नज़दीकियों पर वह कहते हैं कि यह इसलिए है कि चूंकि अडानी समूह की कंपनियां बुनियादी ढांचे से जुड़ी परियोजनाओं में शामिल हैं और इसके लिए सरकारी समर्थन की ज़रूरत होती है.

गौतम अडानी के क़रीबी ऐसा मानते हैं कि मोदी के विरोधी और अडानी के कारोबारी प्रतिद्वंदी उन्हें निशाना बना रहे हैं.

मगर उनके आलोचक कहते हैं कि उनका विकास राजनेताओं के लिए उनकी उदारता और क्रोनी कैपिटिलिज़्म (सांठगांठ वाले पूंजीवाद) के प्रसार का नतीजा है.

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