यहां-वहां भाजपा फिर भी छत्तीसगढ़ बेहाल

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छत्तीसगढ़ में लगातार तीसरी बार भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) की सरकार बनी लेकिन केंद्र में भाजपा सरकार आने के बाद राज्य की मुश्किलें बढ़ गई हैं.

राज्य के मुख्यमंत्री रमन सिंह की सरकार आर्थिक संकटों से घिरी हुई है.

विपक्षी दल कांग्रेस मानती है कि राज्य की आर्थिक हालात ख़राब है.

केंद्र सरकार राज्य को मिलने वाली सहायता कम कर रही है तो छत्तीसगढ़ सरकार भी एक के बाद एक योजनाओं में कटौती करती जा रही है.

आलोक प्रकाश पुतुल की रिपोर्ट

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छत्तीसगढ़ सरकार को अपनी प्रतिभूतियां नीलाम करवानी पड़ रही हैं. रोजगार गारंटी से लेकर कृषि को मिलने वाली केंद्रीय सहायता का बजट कम कर दिया गया है, जिसका सीधा असर राज्य सरकार की योजनाओं पर पड़ा है.

हालांकि मुख्यमंत्री रमन सिंह किसी आर्थिक संकट से इनकार करते हैं. वे कहते हैं, “राज्य की अर्थव्यवस्था ठीक है और कहीं कोई संकट नहीं है.”

मगर विपक्षी दल कांग्रेस के मुताबिक़ सरकार लगभग 25 हज़ार करोड़ से अधिक के क़र्ज़ में है और मोदी की सरकार बनने के बाद से कटौती के कारण राज्य आर्थिक संकट में है.

विपक्ष का दावा अपनी जगह सही भी है.

केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार ने एक के बाद एक राज्य सरकार के हिस्से के बजट में कटौती शुरू कर दी है.

रोज़गार गारंटी योजना

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छत्तीसगढ़ सरकार को पहला झटका महात्मा गांधी रोजगार गारंटी योजना (मनरेगा) में लगा, जब 2014-15 की केंद्रीय मंज़ूरी के 2600 करोड़ रुपए में कटौती करते हुए केवल 1307 करोड़ रुपए मंज़ूर किए गए. यानी रोजगार गारंटी योजना के बजट में लगभग 55 फ़ीसदी कटौती कर दी गई.

राज्य सरकार ने पिछले साल ही मज़दूरी के दिन 150 करने की घोषणा की थी. ज़ाहिर है राज्य में रोजगार गारंटी योजना में पंजीकृत 42 लाख मज़दूरों के लिए यह कटौती मुश्किल पैदा करेगी.

इसके बाद मोदी सरकार ने प्रधानमंत्री सड़क योजना के तहत स्वीकृत 800 करोड़ में से भी 207 करोड़ काट लिए. इसके अलावा कृषि समेत दूसरे मदों में भी केंद्रीय मदद में कटौती कर दी गई.

धान खरीदी

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राज्य में सबसे बड़ा झटका किसानों को लगा. उन्हें सहकारी बैंकों से मिलने वाले ऋण पर ब्याज दर एक से पांच फ़ीसदी के बजाय 12 फ़ीसदी कर दी गई. धान के समर्थन मूल्य और ख़रीदी की सरकारी नीतियों ने भी किसानों की मुश्किल बढ़ा दी.

सरकार अभी तक 1345 रुपए प्रति क्विंटल की दर से धान खरीदती रही है. रमन सिंह की सरकार ने धान का समर्थन मूल्य 2100 रुपए करने का वादा किया था.

पिछले 10 सालों से मुख्यमंत्री रमन सिंह किसानों का एक-एक दाना धान समर्थन मूल्य पर ख़रीदने का वादा दुहराते रहे हैं और उस पर अमल भी करते रहे हैं.

लेकिन समर्थन मूल्य बढ़ने की कौन कहे, नरेंद्र मोदी ने सत्ता में आते ही अनाज ख़रीदी के लिये समर्थन मूल्य देने से मना किया और उसका असर यह हुआ कि छत्तीसगढ़ में पिछले साल तक लगभग 80 लाख मीट्रिक टन धान खरीदने वाली सरकार ने तय किया कि एक एकड़ में केवल 10 क्विंटल धान ही ख़रीदा जाएगा.

विरोध

इसके ख़िलाफ़ किसानों ने पिछले हफ़्ते राज्य भर में सड़क जाम किया था और एक नवंबर को राज्य की स्थापना की 15वीं वर्षगांठ पर राज्य भर में कांग्रेस आर्थिक नाकेबंदी करने वाली है.

कांग्रेस के छत्तीसगढ़ मामलों के राष्ट्रीय प्रवक्ता मोहम्मद अकबर का कहना है कि सरकार वित्तीय स्थिति के बारे में श्वेतपत्र जारी करे.

अकबर के मुताबिक़ 14 अक्टूबर को भारतीय रिज़र्व बैंक ने नीलामी के ज़रिए 10 वर्षीय राज्य विकास ऋण के लिए बोली लगवाई और 16 अक्तूबर को 11 पक्षों से 700 करोड़ का क़र्ज़ लिया जा चुका है. सड़क विकास निगम के लिए अलग से क़र्ज़ लेने की तैयारी है.

अकबर कहते हैं, "राज्य सरकार धान ख़रीदी को तो टाल ही रही है, अधिक से अधिक राशनकार्ड निरस्त करने के बहाने ढूंढ रही है. मनरेगा मज़दूरों का तीन-चार माह से भुगतान नहीं हुआ है. शिक्षाकर्मियों को वेतन नहीं दे पा रही. विभिन्न विभागों के बजट में कटौती कर दी है. ऐसा वित्तीय कुप्रबंधन के कारण हो रहा है.''

संकट के बादल

Image caption राज्य सरकार के मुख्यमंत्री रमन सिंह ने किसानों से उनका सारा धान समर्थन मूल्य पर ख़रीदने का वादा किया था.

2000 में छत्तीसगढ़ राज्य बनने के बाद तत्कालीन कांग्रेस सरकार में रामचंद्र सिंहदेव वित्त मंत्री बने थे. अब वे पूर्व विधायक हैं. सिंहदेव मानते हैं कि राज्य सरकार की हालत ख़राब है.

वह कहते हैं, “14 साल पहले जब मैंने कामकाज संभाला था तो हमारी सरकार के अंतिम दिन तक कभी भी ओवरड्राफ़्ट नहीं हुआ. अब तो सरकार हज़ारों करोड़ के घाटे में है. ग़रीबों की संख्या 18 लाख परिवार से बढ़कर 45 लाख से अधिक हो गई है. सरकार आर्थिक मोर्चे पर मुंह के बल गिर गई है.”

ज़ाहिर है, एक के बाद एक बजट में कटौती की ख़बरें राज्य की अर्थव्यवस्था के लिये कोई बेहतर संकेत तो नहीं दे रही हैं.

अगर यह सिलसिला जारी रहा, तो छत्तीसगढ़ में दूसरी योजनाओं पर भी संकट के बादल छा सकते हैं.

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