माउंटबेटन के भोज में नहीं गया वह सूबेदार

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पिछले 158 वर्ष से दुनिया भर में जाना-माना विक्टोरिया क्रॉस उन लोगों के सीने पर सजता है जिन्होंने दुश्मन से किसी मुठभेड़, लड़ाई या जंग के बीचोंबीच कोई बहुत अद्भुत, आश्चर्यजनक कारनामा कर दिखाया हो.

पहले सिर्फ़ गोरे ब्रितानियों को यह पदक दिया जाता था लेकिन प्रथम विश्वयुद्ध के वक़्त से हिंदुस्तानियों को भी दिया जाने लगा.

बलोच रेजीमेंट के सिपाही ख़ुदादाद ख़ान पहले भारतीय थे जिन्हें यह पदक हासिल हुआ था.

ख़ुदादाद ख़ान की कहानी प्रथम विश्व युद्ध में उनकी बहादुरी के साथ ही ख़त्म नहीं हुई. आज़ादी के बाद के उनके कुछ किस्से तो इतने मशहूर हुए कि आज भी सुनाए जाते हैं.

ये जानने कि ख़ुदादाद ख़ान की विरासत किस हाल में है और उनकी पुश्तें उन्हें कैसे याद करती हैं, बीबीसी संवाददाता वुसतुल्लाह ख़ान पहुँचे चकवाल के पास उनके गांव.

वुसतुल्लाह ख़ान की पूरी रिपोर्ट

विक्टोरिया क्रॉस का तमगा 1856 में महारानी विक्टोरिया के आदेश पर जारी हुआ और उसे 1854 में क्रीमिया की जंग में रूस से छीनी गई दो तोपों की धातु से तैयार किया जाता है.

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आज तक विक्टोरिया क्रॉस 1352 बहादुर सीनों पर लगा है. इनमें वह गुमनाम अमरीकी सिपाही भी शामिल है जिसकी कब्र वॉशिंगटन के ऑर्लिंगटन कब्रिस्तान में है.

तीन बहादुर ऐसे भी हैं जिन्हें दो बार विक्टोरिया क्रॉस मिल चुका है.

शुरू के 56 साल यह सिर्फ़ ब्रिटिश आर्मी के गोरे सिपाहियों को मिलता था, जैसे 1857 की जंगे-आज़ादी में 121 गोरे सिपाहियों को मिला.

लेकिन 1912 में बादशाह जॉर्ज पंचम के ज़माने में भारतीयों को भी इस तमगे के क़ाबिल समझने का ख़्याल ब्रितानवी राज को आ ही गया.

28 जुलाई 1914 को जब पहले विश्वयुद्ध की पहली तोप का पहला गोला दागा गया तो ब्रिटिश साम्राज्य को और कोई परेशानी होगी तो होगी, लेकिन हिंदुस्तान की निष्ठावान उपनिवेश के चलते ऐसी कोई चिंता न थी कि जंगजू रंगरूटों की कमी होगी. भले तथाकथित सभ्यता का युद्ध कितना ही लंबा खिंच जाए.

पराक्रम

पंजाब के इलाक़े पुठवार में हर सरपंच की ड्यूटी लगाई गई कि वह बड़े सीने वाले, सेहतमंद, लंबे-चौड़े जवानों को तनख़्वाह, अलाउंस, राशन, चमकीली वर्दी, दुनिया भर की सैर, साल में एक महीने की छुट्टी, घर वापसी का किराया और सबसे बढ़कर देशसेवा का जोश दिलाकर फ़ौज में भर्ती के लिए तैयार करे.

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जो जवान जितने जवान भर्ती करवाएगा सरकार उसे उतना ही महबूब रखेगी.

कुछ ही महीनों में चार लाख से ज़्यादा देसी फौजी यूरोप भेजने के लिए चौकस हो गए.

सिपाही ख़ुदादाद ख़ान भी इन्हीं लाखों में एक थे. सिपाही ख़ुदादाद ख़ान की रेजीमेंट, ड्यूक ऑफ़ कनॉट्स ऑन बलोच, पहली देसी रेजीमेटों में से एक थी जिन्हें पानी के जहाज़ों में भर-भरकर हिंदुस्तान से पहले फ़्रांस और फिर बेल्जियम के मोर्चों पर पहुंचाया गया.

31 अक्टूबर, 1914 के दिन होलबैक नामक स्थान पर सिपाही ख़ुदादाद ख़ान की रेजीमेंट की जर्मनों से ख़ूनी भिड़ंत हो गई.

जिस तोप पर सिपाही ख़ुदादाद ख़ान की ड्यूटी थी, उस पर उनके पांच साथी और थे जो सब के सब फ़र्ज़ पर क़ुर्बान हो गए.

सिपाही ख़ुदादाद ख़ान घायल होने के बाद भी अकेले तब तक डटे रहे जब तक उन्हें झुटपुटे के बाद बेस कैंप तक पीछे जाने का आदेश नहीं मिला.

इस जुर्रत और हौसले पर ख़ुदादाद ख़ान को हिंदुस्तान का पहला विक्टोरिया क्रॉस और सूबेदारी मिली.

माउंटबेटन को इनकार

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मैं जब सूबेदार का जन्म स्थान देखने चकवाल शहर से ज़रा परे राजदूत आवानों के गांव डब पहुंचा तो वहां एक नया घर बन रहा था.

सूबेदार के एक पड़पोते ग़ुलाम रब्बानी इस निर्माण कार्य की देखरेख कर रहे थे.

मैंने पूछा, "कहां गया वह असली घर? क्या वह इस लायक भी नहीं था कि कोई उसे क़ौमी विरासत समझकर गोद ले लेता?"

ग़ुलाम रब्बानी ने कहा, "पुराना घर बहुत ही पुराना होकर ढह रहा था. जब तक मरम्मत कर सकते थे की, पर कब तक? इस बीच सरकार में से किसी ने नहीं सोचा कि एक स्मारक बनाने के लिए इसे हमसे ख़रीद दे."

मैंने पूछा, "क्या आपमें में से किसी ने, घर ढहाने से पहले, सरकार के कान में यह बात डाली?"

ग़ुलाम रब्बानी ने कहा, "यह तो सरकार का काम था. कोई आता तो बात भी करते."

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विक्टोरिया क्रॉस के साथ ही सूबेदार ख़ुदादाद ख़ान को ज़िला मंडी भाओद्दीन में 50 एकड़ ज़मीन भी मिली थी और यहीं पर ख़ुदादाद ख़ान आठ मार्च, 1971 से अनिश्चितकालीन नींद ले रहे हैं.

करीब ही बूढ़े बरगद की छांव तले उनके भतीजे अहमद ख़ान ने बातों-बातों में यह क़िस्सा भी सुनाया कि जब 1956 में जब सूबेदार ब्रिटेन की रानी की ताजपोशी के मौक़े पर, विक्टोरिया एंड जॉर्ज क्रॉस एसोसिएशन के न्योते पर लंदन गए थे.

वहां लॉर्ड माउंटबेटन ने विक्टोरिया क्रॉस और जॉर्ज क्रॉस हासिल करने वाले सब सैनिकों को खाने पर बुलाया.

सूबेदार ख़ुदादाद ख़ान ने इसमें शामिल होने से यह कहकर इनकार कर दिया कि माउंट बेटन ने जिस बेदर्दी से हिंदुस्तान का बंटवारा किया, ऐसे अन्याय के बाद उसका खाना मुझ पर बोझ होगा.

विक्टोरिया क्रॉस

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विक्टोरिया क्रॉस आज भी दुनिया में 'हॉट कलेक्टर्स आइटम' है. कइयों के बच्चों ने इसे नीलाम कर दिया या नेशनल म्यूज़ियम के हवाले कर दिया.

कहते हैं कि इस वक्त विक्टोरिया क्रॉस का सबसे बड़ा संग्रह ब्रिटेन के लॉर्ड ऐशक्रॉफ़्ट के पास है.

ख़ुदादाद ख़ान का विक्टोरिया क्रॉस ख़रीदने भी कई लोग आए और उनके एक पोते अब्दुल गफ़ूर कहते हैं, "नवाब ऑफ़ बहावलपुर मेरे चाचा के पीछे पड़ गए थे. नवाब ने उन्हें सवा सौ एकड़ ज़मीन और बहावलपुर की सेना में कमीशन की पेशकश भी की थी लेकिन चाचा ने यह कहकर इनकार कर दिया कि इस पर मेरे बाप का ख़ून लगा है और यह हमारी अगली पीढ़ियों का गर्व है."

अब्दुल गफ़ूर जब 2004 में विक्टोरिया एंड जॉर्ज क्रॉस एसोसिएशन की दावत पर अपनी दादी के साथ ब्रिटेन गए तो वहां भी कई लोगों ने सलाह दी कि विक्टोरिया क्रॉस नेट पर नीलाम करने के बारे में सोचें, सात-आठ लाख पौंड अगर मिल गए तो वारे-न्यारे हो जाएंगे.

अब्दुल गफ़ूर ने बताया कि 9/11 के बाद से विक्टोरिया क्रॉस के कुछ नए चाहने वाले भी पैदा हो गए हैं.

कई बार उन्हें और उनके छोटे भाई अली नवाज़ को फ़ोन पर धमकियां मिली हैं कि "तुम ब्रितानिया के एजेंट हो, विक्टोरिया क्रॉस वापस कर दो वरना अच्छा नहीं होगा."

अब्दुल गफ़ूर ने विक्टोरिया क्रॉस ऐसी जगह छुपा दिया है, जिसके बारे में परिवार के कुछ लोग ही जानते हैं. मुझे भी उन्होंने बस इस विक्टोरिया क्रॉस की मूरत के ही दर्शन करवाए.

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पर पाकिस्तानी सेना की हाईकमान ने इतना ज़रूर किया है कि ख़ुदादाद ख़ान को उनकी ज़िंदगी में ही बाबाए बलोच रेजीमेंट का ख़िताब दे दिया और गुज़रने के बाद उनकी एक बड़ी सी तांबे की मूर्ति रावलपिंडी में सेना के संग्रहालय के आंगन में स्थापित कर दी.

लेकिन पंजाब की वह सरज़मीने-पोठवार जिसने ख़ुदादाद समेत एक लाख से ज़्यादा जवान पहला विश्वयुद्ध लड़ने को दान किए थे, आज वही पोठवार इस युद्ध की एक सौवीं वर्षगांठ पर चुप-चुप सा है. जाने पड़ा-पड़ा क्या सोच रहा है.

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