ये पब्लिक है, सब जानती है

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प्यारे मोदी जी, आप करन थापर की बात का बिल्कुल बुरा न मानिएगा, आपको तो पता ही है कि ये मीडियावाले कितने मुँहफट होते हैं.

न तो इन्हें इतिहास का कुछ पता, न ठीक से कभी महाभारत पढ़ी.

वैसे भी अधिकतर पत्रकार अपना लेखन ही दूसरी बार नहीं पढ़ते, तो महाभारत कहां से पढ़ें.

और करन थापर कोई रोमिला थापर तो हैं नहीं कि उनकी बात को गंभीरता से लिया जाए. वैसे, रोमिला थापर को भी कौन गंभीरता से लेता है.

चुनौती

अच्छा तो, करन थापर जी, आख़िर आपने किस आधार पर मोदीजी की इस खोज को चुनौती दी है कि कर्ण चूंकि मां की कोख से पैदा नहीं हुआ था, तो इसका मतलब है कि उस ज़माने में भी जेनेटिक साइंस थी.

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करन जी कोई सुबूत है आपके पास कि जेनेटिक साइंस नहीं थी. बल्कि मैं तो मोदीजी की बात को आगे बढ़ाते हुए यहाँ तक कहूँगा कि इस जगत में शायद पहला टेस्ट ट्यूब बेबी भी कर्ण था, महाभारत वाला.

और आप जैसे पत्रकार से क्या बात हो जो ये तक नहीं जानता कि करोड़ों-अरबों वर्ष पहले एक महान प्लास्टिक सर्जन (जिसका यहाँ नाम लेना उचित नहीं) ने एक मनुष्य के शरीर पर हाथी का सिर ट्रांसप्लांट कर गणेशजी को बनाया.

ट्रांसप्लांट

करन जी मुझे पता है आप यही कहेंगे कि ट्रांसप्लांटेशन सर्जन करता है, प्लास्टिक सर्जन नहीं.

अरे भैय्या करन के पुराने युग में जब प्लास्टिक भी नहीं था, तब भी ये काम प्लास्टिक सर्जन ही किया करता था. अब इस बात को प्लास्टिक की तरह मत खींचिए, ये भगवान के काम हैं.

आपने गुजरात के 40 हज़ार से अधिक स्कूलों में दीनानाथ बत्रा की पसंद की पुस्तकें पढ़ानें पर भी ऐतराज़ ठोक दिया.

महाभारत

क्यों भाई, क्या महाभारत के ज़माने में टीवी नहीं था. अगर नहीं था, तो देवी और देवताओं को कैसे पता चलता था कि धरती और आकाश में कौन-क्या कर रहा है.

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और सिर्फ़ सैटेलाइट टीवी ही नहीं, टीवी एंकर भी होते थे. मुझे तो लगता है कि कौरवों और पांडवों को भी आप जैसे ही किसी टीवी एंकर की लगाई-बुझाई ने लड़वाया था.

करन जी क्या आप वाक़ई समझते हैं कि वैदिक काल में मोटरकार नहीं थी. बहुत दुख होता है जब आप जैसा आदमी ऐसी बातें करें.

उस समय घोड़े को प्यार से मोटरकार कहते थे, क्योंकि वह इंजन से चला करता था. जब घोड़े से प्रदूषण पैदा होने लगा तो भगवान ने इंजन की जगह पेट फिट कर दिया कि बेटा, पेट्रोल की बजाय घास खा और भागते रहो.

इतिहास में दख़ल

और करन जी मेरी बला से तक्षशिला बिहार में है कि नालंदा पंजाब में. मैं इस खोज का क्या अचार डालूँ कि पोरस को सिकंदर ने गंगा किनारे नहीं, सिंधु नदी के पिछवाड़े कूटा था.

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अगर मोदी जी के मुँह से कभी मोहनदास की बजाय मोहनलाल गांधी निकल गया या भगत सिंह को दिल्ली या लाहौर की बजाय अंडमान के काले पानी भेज दिया. तो गांधी, भगत सिंह और मोदी जी का मान-सम्मान कितना घट गया.

वैसे प्रधानमंत्री कौन है, आप या मोदी जी?

ये पब्लिक है, सब जानती है कौन-कितने पानी में है.

अब कभी इतिहास के मामले में दख़ल नहीं दीजिएगा, जिसका काम उसी को साजे.

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