मोहर्रम को लेकर बवाना में 'तनाव'

बवाना महापंचायत इमेज कॉपीरइट kumar ravi

दिल्ली के त्रिलोकपुरी में हुई सांप्रदायिक हिंसा के बाद अब बवाना गाँव में तनाव के बादल छाए हैं.

उत्तर पश्चिमी दिल्ली में स्थित बवाना और आस-पास के गाँवों के जाट समुदाय ने गांव से गुज़रने वाले मोहर्रम के ताज़िए के जुलूस के विरोध में एक महापंचायत आयोजित की.

मंगलवार को मोहर्रम को देखते हुए इलाके में पुलिस बंदोबस्त कड़ा कर दिया गया है.

महापंचायत के संयोजक प्रदीप माथुर ने करीब 1,000 लोगों को संबोधित करते हुए कहा, "मोहर्रम और ताज़िए भारतीय संस्कृति नहीं हैं. अगर उन्हें यह सब करना है तो अपने घर में करें. हम उन्हें हमारे गांवों में जुलूस नहीं निकालने देंगे. इससे हमारे बच्चों पर ग़लत असर पड़ता है."

1000 लोगों की पंचायत

आर्य समाज के नरेश आर्य ने कहा, "हर साल वे यूँ तलवार और शस्त्र दिखाकर क्या साबित करना चाहते हैं? इस बार हम उन्हें अपने गांवों में नहीं आने देंगे और इसके लिया क्या करना है यह आप सभी को मोबाइल पर मैसेज के ज़रिए बता दिया जाएगा."

इमेज कॉपीरइट kumar ravi

पंचायत से पहले आस-पास के गांवों में पर्चे बांटे गए. इसमें पंचायत के लिए आमंत्रित करते हुए लिखा था, "जब-जब हिंदू बंटता है तब-तब हिंदू घटता है."

पर्चे में आरोप लगाए लगाए गए थे कि 'हर साल मुसलमान बवाना में ताज़िए का जुलूस निकालते वक्त महिलाओं को छेड़ते हैं, दुकानें लूटते हैं, शस्त्र प्रदर्शन करते हैं'.

रविवार को बवाना में देश भक्ति के गाने, स्वतंत्रता सेनानियों की क़ुर्बानी और सीमा पर जवानों की शहादत को याद करते करीब 1000 लोगों के साथ यह पंचायत शुरू हुई.

राजनीतिक साजिश

महापंचायत कुछ महीने पहले गांव के मुट्ठी भर युवाओं की ओर से शुरू किए गए 'हिंदू और गाय रक्षा समिति' ने आयोजित की थी.

पंचायत में मंच पर बवाना से भाजपा के मौजूदा विधायक घुग्गन सिंह और कांग्रेस पार्षद देविन्दर पोनी भी मौजूद थे.

इमेज कॉपीरइट kumar ravi

कॉलोनी के निवासी मोहम्मद शहाबुद्दीन ने कहा, "करीब 20 दिन पहले जिला थाना में हमने पुलिस अफसरों के सामने बवाना गांव वालों की बात मान ली थी और कहा था कि हम जुलूस हमारी कॉलोनी में ही निकालेंगे. फिर अब यह महापंचायत क्यों? इस सवाल ने हमें डरा दिया है."

दूसरी ओर, कॉलोनी के महबूब आलम कहते हैं कि अब अचानक यह बवाल क्यों जबकि बरसों से जुलूस के लिए हिंदू भी चंदा देते रहे हैं.

महफ़ूज़ आलम कहते हैं, "पिछले सात सालों से जुलूस निकल रहा है. ताज़िया बनाने के लिए हिंदू भी चंदा देते हैं. अगर हम दुकानें लूटते थे तो इतने सालों में कोई क्यों नहीं बोला? अब ऐसा क्या बदला है? हमें तो यह कोई राजनीतिक षड्यंत्र लगता है और यह बहुत डरावना है."

भूमिका पर सवाल

कॉलोनी के कलीमुद्दीन ने कहा, "अभी कुछ दिन पहले बकरीद के वक़्त भी हमारे यहाँ बवाना से कुछ लोग आए थे और घर-घर यह कह कर तलाशी ले रहे थे कि कहीं तुम बकरीद पर गाय की बलि तो नहीं दे रहे हो. लेकिन फिर पुलिस आकर उन्हें यहाँ से ले गई. अब हमें डर है कि हर त्यौहार पर ऐसा कुछ ना कुछ होगा. क्योंकि राजनेता नफरत के खेत बोते दिख रहे हैं."

इमेज कॉपीरइट kumar ravi

पड़ोस के गांव से आए कार्यक्रम के विशेष अतिथि धर्मेन्द्र दब्बास से पूछा गया कि जब ताज़िए का रास्ता बदला जा चुका है तो यह सभा क्यों?

इस पर वह कहते हैं, "हम उन्हें अपना निर्णय एकजुट होकर बताना चाहते हैं. अगर हममें राम है, तो परशुराम भी है. अगर वह नहीं आएंगे तो ठीक है, पर आएंगे तब हम देखेंगे."

दिल्ली की राजनीत में जाट प्रभुत्व वाले बवाना जैसे 225 गांव है. इस तरीक़े की पंचायत से राजनीतिक पार्टियाँ फायदा उठाएंगी इस बात को नकारा नहीं जा सकता.

त्रिलोकपुरी में हुए सांप्रदायिक दंगों में करीब 30 लोग और एक दर्जन से ज़्यादा पुलिस कर्मी घायल हुए थे. दंगों के बाद भाजपा के पूर्व पार्षद की भूमिका पर सवाल भी उठे थे.

दिल्ली पुलिस के स्पेशल सेल के जॉइंट कमिश्नर ने कहा, "स्थिति नियंत्रण में करने के लिए हमने पुलिस बंदोबस्त बढ़ा दिया है और दोनों समुदाय के बीच बातें चल रही हैं."

(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए यहां क्लिक करें. आप हमें फ़ेसबुक और ट्विटर पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)

संबंधित समाचार