थाने में पड़े पत्थर सी हो गई हालत

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कश्मीर में ऐसे कई नौजवान हैं जिन पर पत्थरबाज़ी के आरोप में केस चल रहे हैं. जब कोई चुनाव आता है तो उन्हें गिरफ़्तार कर लिया जाता है.

ऐसे भी हैं जिन्हें कोर्ट ने ज़मानत पर रिहा कर दिया है.

इनमें से कई युवकों को अब नौकरी नहीं मिल पाती क्योंकि उनके ख़िलाफ़ मामले चल रहे हैं.

पढ़ें पत्थरबाज़ी के अभियुक्तों पर माजिद जहांगीर की रिपोर्ट

कश्मीर के श्रीनगर में रहने वाले अरशद आलम नकीब 25 साल के हैं. उन्हें संगीत और क़बूतर पालने का शौक़ है.

अरशद ने कुछ ही महीने पहले चंडीगढ़ से इंजीनियरिंग की डिग्री ली है. एक आम नौजवान जो हिंदुस्तान के किसी कोने में हो सकता है- अरशद उसी आबादी का हिस्सा हैं.

फ़र्क यह है कि पुलिस ने 2010 में उन्हें पत्थरबाज़ी के आरोप में गिरफ़्तार किया था और तब से उन्हें नौकरी नहीं मिल रही. पिछले चार साल से उनका मामला अदालत में है.

अरशद पर पुलिस ने पब्लिक सेफ़्टी एक्ट भी लगाया था, लेकिन 20 दिन बाद अदालत ने अरशद को ज़मानत पर रिहा करने के आदेश दिए. उनका कहना है कि जिस जुर्म में पुलिस ने उन्हें गिरफ़्तार किया था, वह उन्होंने कभी किया ही नहीं.

वह कहते हैं, "मेरे ख़िलाफ़ जो केस दर्ज हुआ, उसमें मुझे एक बड़ा अपराधी दिखाया गया है. मेरे ऊपर सात से ज़्यादा मामले दर्ज किए गए हैं, जबकि मैंने एक भी अपराध नहीं किया."

अरशद का आरोप है कि ज़मानत पर रिहाई के बावजूद पुलिस बेवजह उन्हें हिरासत में लेती है.

'बंधक'

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अरशद बताते हैं, "जब लोकसभा चुनाव हुए थे तब मुझे थाने में बुलाया गया और आठ दिन तक बंधक रखा गया. मुझे ऐसा लगता है कि जैसे मैं पेशेवर अपराधी हूं."

यह वह साल था जब कश्मीर की तस्वीर ऐसी दिखती थी, जिसमें एक तरफ़ हथियारों से लैस सेना हो और दूसरी तरफ़ पत्थरों से लैस नौजवानों की भीड़ हो.

इसकी शुरुआत हुई 2010 में माछिल सेक्टर में भारतीय सेना द्वारा तीन युवकों को एक मुठभेड़ में मार गिराने से.

सेना का कहना था कि मारे गए तीनों युवक चरमपंथी थे, पर कुछ दिन बाद जम्मू-कश्मीर की जांच रिपोर्ट में कहा गया कि तीनों युवक आम नागरिक थे.

उस फ़र्ज़ी मुठभेड़ के बाद पूरे कश्मीर में तीन महीने तक उग्र आंदोलन चला. इस दौरान बड़ी संख्या में नौजवानों को पत्थरबाज़ी के आरोप में गिरफ़्तार किया गया. इसमें कई कसूरवार और कई बेकसूर भी थे.

ऐहतियातन हिरासत

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2010 के बाद अभी तक अरशद के ख़िलाफ़ कोई नया मामला दर्ज नहीं हुआ है.

अदालत से ज़मानत मिलने के बावजूद पत्थरबाज़ी के अभियुक्तों को थानों में तलब करने के मामले पर जम्मू-कश्मीर पुलिस के आईजी अब्दुल ग़नी मीर ने बीबीसी से कहा, "ऐसे लोगों को ऐहतियातन फिर गिरफ़्तार किया जाता है. जैसे अगर चुनाव है, तो ऐसा किया जाएगा."

वह कहते हैं, "यह सब क़ानून के तहत ही किया जाता है. इसे लेकर कोई ग़लतफ़हमी नहीं होनी चाहिए."

अरशद ने ख़ुद पर पब्लिक सेफ़्टी एक्ट के तहत दर्ज मुक़दमा हटाने के लिए जम्मू-कश्मीर हाईकोर्ट में अपील की थी, जिस पर अदालत ने स्थगन आदेश दिया था.

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कश्मीर के नागरिक अधिकार कार्यकर्ता परवेज इमरोज़ कहते हैं, "धारा 107 एक क़ानून है, जिसके तहत शांति बहाली के लिए किसी को गिरफ़्तार किया जा सकता है. मगर कश्मीर में पुलिस, सेना और दूसरी एजेंसियों को इतने अधिकार दिए गए हैं कि वे कुछ भी कर सकते हैं."

वह कहते हैं, "अब किसी का मामला अगर अदालत में चल रहा है, तो पुलिस उसी केस में उसे बंद कर देती है और कहा जाता है कि यह शांति के लिए ख़तरा है. यहां सशस्त्र बल विशेषाधिकार क़ानून है तो आप क्या कर सकते हैं? ऐसा तो होता ही रहेगा".

पेशी से परेशान

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Image caption राज्य के मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्लाह ने 2011 में पत्थरबाज़ी के मामले में आम माफ़ी देने की बात कही थी.

अदालत में हर महीने की पेशी से अरशद परेशान हो गए हैं.

उनका कहना है, "जब हम अदालत में पहुंचते हैं तो सब समझते हैं कि हम बहुत बड़े अपराधी हैं. किसी को सच्चाई मालूम नहीं कि हमारे साथ हुआ क्या है."

जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्लाह ने 2011 में ऐलान किया था कि पत्थरबाज़ी के 1200 मामले वापस लिए जाएंगे, सभी को 'आम माफ़ी' दी जाएगी.

इसी साल नेशनल कांफ्रेंस के वरिष्ठ नेता और पंचायती राज मंत्री अली मोहम्मद सागर ने भी विधानसभा में कहा था कि सरकार बहुत जल्द पत्थरबाज़ी के अभियुक्त लड़कों के लिए आम माफ़ी का ऐलान करने वाली है.

अरशद के साथ सभी युवकों को इस ऐलान पर अमल का इंतज़ार है. तब तक संगीत और कबूतर का शौक़ पालने वाले अरशद नौकरी तलाश करते रहेंगे और चार साल से अटके अपने मामले पर फ़ैसले की राह भी तकते रहेंगे.

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