योग्य व्यक्ति नहीं, या मोदी की पसंद नहीं

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जब लगभग छह महीने पहले भारत के केंद्रीय मंत्रिमंडल ने शपथ ली, तब दो प्रमुख मंत्रालय एक ही व्यक्ति को दिए गए थे.

चार सबसे अहम माने जाने वाले मंत्रालयों में से दो वित्त और रक्षा मंत्रालय अरुण जेटली के पास हैं (अन्य दो मंत्रालय गृह और विदेश हैं).

जेटली ने जिस दिन कार्यभार संभाला था, तब जेटली ने कहा था कि वह रक्षा मंत्रालय की ज़िम्मेदारी कुछ हफ़्तों के लिए संभालेंगे, जब तक इसे किसी नए व्यक्ति को नहीं सौंपा जाता.

लेकिन मई के बाद पांच महीने बीत जाने के बाद भी रक्षा मंत्रालय अरुण जेटली ही देख रहे हैं. हालांकि अब ख़बरें आ रही हैं कि अगले कुछ ही दिनों में कैबिनेट का विस्तार हो सकता है.

लेकिन इसके बावजूद ये सवाल तो उठता ही है कि, क्या मोदी के पास योग्य व्यक्तियों की कमी है, या उपलब्ध योग्य व्यक्ति उनकी पसंद के नहीं हैं?

आकार पटेल का विश्लेषण

पर्रीकर क्यों?

तब यह कयास लगाए जा रहे थे कि वह व्यक्ति अरुण शौरी हो सकते हैं. प्रधानमंत्री के दिमाग़ में जिस किसी का नाम रहा हो, मई से नवंबर आ गया, लेकिन वह नाम फिलहाल सामने नहीं आया.

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ख़बरों के अनुसार अब गोवा के मुख्यमंत्री मनोहर पर्रीकर को केंद्रीय मंत्रिमंडल में लाया जा रहा है.

सवाल यह उठता है कि एक मुख्यमंत्री को क्यों? ख़ासकर वो जो मुख्यमंत्री के रूप में अच्छा काम कर रहा हो, उसे उसकी ज़िम्मेदारी से मुक्त कर दिल्ली क्यों लाया जाए?

और, किसी बाहरी व्यक्ति को क्यों? जबकि मोदी के पास 300 से अधिक लोकसभा और राज्यसभा के सांसद उपलब्ध हैं.

प्रतिभा की कमी की इस समस्या के पीछे दो वजहें हैं.

समस्या

पहली समस्या तो जगज़ाहिर है. हिंदुत्व जैसी कठोर विचारधारा, जो कि वास्तविक और काल्पनिक अन्याय के ख़िलाफ़ नाराज़गी और क्रोध पर आधारित हो, कुछ ख़ास तरह के लोगों को आकर्षित करती है.

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हमें गोलवालकर, सावरकर और दीनदयाल उपाध्याय जैसे लोगों के लेखन की ओर झुके हुए और उनकी सोच में केंद्रित लोगों से ख़ास उम्मीद नहीं करनी चाहिए.

यही वजह है कि यूपीए-2 में लगभग 200 सीटों वाली कांग्रेस के पास मौजूदा लोकसभा में 280 सीटों वाली भाजपा से कहीं अधिक क़ाबिल व्यक्ति थे.

कांग्रेस के पास वित्त मंत्री के रूप में तीन विकल्प थे - मनमोहन सिंह, चिदंबरम और प्रणब मुखर्जी, जबकि नरेंद्र मोदी के पास वित्त मंत्री के लिए केवल एक व्यक्ति था, जिसे रक्षा मंत्रालय में भी समय देना होता है.

असुरक्षा की भावना

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दूसरी समस्या अधिक विशिष्ट है. यह प्रधानमंत्री की असुरक्षा से जुड़ी हुई है. उनके पास कुछ प्रतिभावान और अनुभवी लोग हैं, लेकिन उन्होंने उनका उपयोग करना ठीक नहीं समझा है.

दलील दी गई कि या तो वे बहुत बुज़ुर्ग हैं (लालकृष्ण आडवाणी और मुरली मनोहर जोशी, दोनों ही लोकसभा में हैं, लेकिन उनके पास कोई काम नहीं है) या वे बहुत युवा हैं (वरुण गांधी, जो महत्वाकांक्षी हैं और अधिक ज़िम्मेदारी की ताक में हैं).

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इन लोगों ने असली वजह छिपाई है कि उनसे मोदी को ख़तरा है और वह मंत्रिमंडल में इन लोगों से 'डील' नहीं कर सकते.

उन्होंने गुजरात में भी यही किया था, जहाँ केशुभाई पटेल और काशीराम राणा जैसे अनुभवी नेताओं को उनके समर्थकों समेत सत्ता से बाहर रखा गया.

गुजरात दोहराने में बाधा

लेकिन दिल्ली में गुजरात की कहानी दोहराने में कुछ बाधाएं हैं.

गुजरात सरकार को चलाने में मोदी का फ़ोकस गवर्नेंस पर था. ऐसी नीतियों को अमली जामा पहनाना जो कि अधिकतर केंद्र से बनती थी.

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जब वाजपेयी सरकार ने बिजली क्षेत्र को निजी कंपनियों के लिए खोला, तो मोदी ने गुजरात में इसे बेहतरीन तरीक़े से लागू किया. निजी कंपनियों के उत्पादन के बूते गुजरात बिजली सरप्लस वाला राज्य बना.

इस काम को करने के लिए उन्होंने राजनेता के (जो मंत्री थे) अधिकारों में कटौती कर नौकरशाहों की एक टीम को अधिकार दिए, जिन्होंने मंत्रालयों का कामकाज देखा. वहाँ सिर्फ़ दो मंत्री थे जिनके पास वास्तविक अधिकार थे (सौरभ पटेल और अमित शाह).

अन्य किसी को भी कैबिनेट का दर्जा नहीं दिया गया ताकि वे समझें कि उनके काम को नौकरशाहों के माध्यम से मोदी देखेंगे.

काम बदला

दिल्ली पहुँचने के बाद मोदी का काम बदल गया है. मोदी को नीतियों पर ध्यान केंद्रित करना है न कि नीतियों को लागू करने पर.

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इससे उनका मॉडल बाधित हुआ है. उन्होंने गुजरात की तरह पीयूष गोयल, निर्मला सीतारमन जैसे विश्वासप्राप्त राज्य मंत्रियों को बहुत अधिक काम देकर नियंत्रण हासिल करने की कोशिश की है.

वे बिजली और उद्योग और वाणिज्य जैसे अहम मंत्रालय संभालते हैं, जो कि मोदी के सबसे पसंदीदा हैं.

लेकिन केंद्र सरकार का मुख्य काम नीतियां और क़ानून बनाना है. इसे संभालने के लिए मोदी को बहुत तेज़ तर्रार लोगों की ज़रूरत है, जो उनके पास बहुत अधिक नहीं हैं.

और दुर्भाग्य से, उनके लिए और सरकार के लिए जो उनके पास हैं, वह उन्हें चाहते नहीं हैं.

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