'ऊँट मेला नाम का रह जाएगा'

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राजस्थान के पुष्कर में लगने वाले विश्वप्रसिद्ध ऊँट मेले में हर साल हज़ारों ऊँट ख़रीदे-बेचे जाते हैं. मगर कुछ सालों से ऊँट को पारंपरिक कामों में उपयोग के बजाए वध करने के लिए ख़रीदने की प्रवृत्ति बढ़ी है.

ऊँट पालने वाले इससे परेशान हैं क्योंकि उनके लिए ऊँट के साथ उनकी जीविका ही नहीं, भावनाएं भी जुड़ी हैं.

पुष्कर मेले से आभा शर्मा की रिपोर्ट

रंगीन गुब्बारों, रंगारंग प्रस्तुतियों और सैलानियों से गुलज़ार पुष्कर मेला कार्तिक पूर्णिमा पर ख़त्म हो गया. मेले ने यदि किसी को सबसे ज्यादा मायूस किया तो वह थे ऊँट और उनके पालक.

पुष्कर मेले की पहचान ऊंटों से है, जहां ऊँटपालक राजस्थान के दूरदराज़ हिस्सों से ऊँट बेचने आते हैं.

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वैसे 2001 से ही ऊँट पालकों की चिंता शुरू हो गई थी जब इसमें कुछ ऐसे ख़रीदार नज़र आने लगे जो कृषि, परिवहन और पारंपरिक वजहों से ऊँट नहीं ख़रीद रहे थे.

लोकहित पशु संस्थान के प्रमुख हनवंत सिंह राठौड़ कहते हैं, "कुछ वर्षों से पुष्कर मेले में कुछ ऐसे ख़रीदार और उनके बिचौलिए देखे गए हैं जो ऊंटों को काटने के लिए ख़रीदते हैं. उनके हिसाब से इस बार भी ऊंटों की क़रीब 90 प्रतिशत बिक्री वध के लिए हुई है."

हनवंत कहते हैं, "हरियाणा और पंजाब आदि राज्यों से लोग खेती-बाड़ी और परिवहन के लिए पुष्कर मेले से ऊँट ख़रीदकर ले जाते रहे हैं. अगर ऐसे प्रदेशों के ख़रीदार पुष्कर मेले में नज़र आते हैं जहाँ ऊँट के उपयोग की कोई परंपरा नहीं है, तो स्वाभाविक रूप से इसे वध के लिए ही ख़रीदा जा रहा है."

उन्होंने बताया कि यहां के ऊंटों को उत्तर प्रदेश, तमिलनाडु और बांग्लादेश और खाड़ी देशों में भी माँस बिक्री के लिए भेजे जाने की ख़बरें हैं.”

ऊँट निर्यात पर असमंजस

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इसी वर्ष जून में ऊँट को राजस्थान का राज्य पशु घोषित किया गया था. इसके चलते इसके निर्यात पर प्रतिबंध संबंधी ख़बरों से भी पुष्कर मेले में असमंजस रहा और ऊँट पालकों ने पाँच से सात हज़ार रुपए के बीच ऊँट बेच दिए.

मेले के अंतिम पांच दिनों में जिला प्रशासन के स्पष्टीकरण के बाद क़ीमत आठ से 10 हज़ार तक पहुंची.

पहले ऊँटनी को दूध के लिए ख़रीदने वाले 25 हज़ार से पाँच हज़ार तक की क़ीमत देने को तैयार हो जाते थे और ऊँट 40,000 रुपए तक बिकता था. इस बार इसमें बहुत कमी देखी गई.

ऊँटपालकों की मजबूरी

प्रदेश का राईका रेबारी समाज ऊँट पालन भगवान शिव का वरदान समझकर करता है. पाली के जोझावर निवासी बाबूलाल राईका बचपन से ही अपने दादा के साथ पुष्कर मेले में आते रहे हैं.

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बाबूलाल कहते हैं, "सरकार से आर्थिक संवर्धन के बिना वे लोग अपने ऊंटों को नहीं बचा सकते. सरकार क़ानून तो बना रही है, पर पशुपालकों के हितों की, उनकी तकलीफ़ की अनदेखी कर रही है. हमारे पास हज़ारों लीटर ऊंटनी का दूध है, पर उसे बेचें कहां?"

वे कहते हैं, ''हर तहसील में एक डेयरी खुल जाए, तो हमें सहारा हो जाए. चारागाह कम हो रहे हैं, पक्की सड़कों और तेज़ दौड़ती गाड़ियों की भीड़ में ऊँट वैसे ही पिछड़ रहा है. उस पर हमारी आय बढ़ने का कोई साधन नहीं होगा तो हम ऊँट कैसे रख पाएंगे?”

'कैमल कर्मा' पुस्तक की जर्मन लेखिका इल्ज़े कोहेला रोलेफ़्सन पिछले 23 बरसों से पुष्कर मेले में आ रही हैं. वह कहती हैं, "इस बार मेले में ऊंटों से ज़्यादा फ़ोटोग्राफ़र नज़र आए.”

रोलेफ़्सन जब पहली बार 1991 में पुष्कर आईं थीं तो यह ऊँटों से भरा था. उन्हें आशंका है कि यदि यही हाल रहा तो शायद अगले साल ऊँट मेला सिर्फ़ नाम का ही रह जाएगा.

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