'हमें पैसा नहीं, इंसाफ़ चाहिए'

मोहम्मद यूसुफ़ बट, कश्मीर
Image caption कश्मीर में मारे गए एक किशोर के पिता मोहम्मद यूसुफ़ बट

भारत प्रशासित कश्मीर में सेना की गोली से मारे गए एक किशोर के पिता का कहना है कि उनके बेटे की क़ीमत महज़ 10 लाख रुपए नहीं है. उनका कहना है कि उन्हें इंसाफ़ चाहिए.

कश्मीर घाटी में दो लड़कों की मौत का मुद्दा अब भारतीय सेना को विशेषाधिकार देने वाले क़ानून (आफ़्स्पा) के ख़िलाफ़ विरोध में बदल रहा है.

पीड़ितों के परिजन चाहते हैं कि गोलीबारी में शामिल सैनिकों को गिरफ़्तार कर उन पर सिविल अदालत में मुक़दमा चलाया जाए.

मारे गए किशोर फ़ैसल के पिता युसुफ़ बट ने बीबीसी से कहा, "मेरा बेटा 13 साल का छात्र था. उसके हाथ में किताबें थीं. क्या उसकी क़ीमत 10 लाख रुपए थी? हमें पैसा नहीं, इंसाफ़ चाहिए."

यूसुफ़ का कहना था, ''वो कह रहे हैं उन्होंने सैनिकों को हटा दिया है, जबकि उन्हें एक आरामदायक बैरक में रखा गया है.''

मुक़दमे की मांग

इमेज कॉपीरइट RIYAZ MASROOR

सेना ने अपनी ग़लती मानते हुए मृतकों के परिवारों को नक़द राहत राशि देने की पेशकश की है.

नॉर्दर्न कमांड के लेफ़्टिनेंट जनरल डीएस हुडा ने कहा, "मैं ख़ासतौर पर कहना चाहता हूं कि जो हुआ, हम उसकी पूरी ज़िम्मेदारी लेते हैं. हम पीड़ित परिवारों के पुनर्वास के लिए प्रतिबद्ध हैं. रक्षा मंत्रालय ने मारे गए हर युवक के परिवार के लिए 10 लाख और घायलों के परिवार को पांच लाख का मुआवज़ा देने की घोषणा की है."

भारत के रक्षामंत्री अरुण जेटली पहले ही युवकों की हत्या पर ख़ेद जताते हुए मामले की तेज़ सुनवाई का वादा कर चुके हैं.

इमेज कॉपीरइट epa

दूसरी तरफ़ सैनिकों की गिरफ़्तारी को लेकर लगातार प्रदर्शन हो रहे हैं.

नौगाम के एक वरिष्ठ पुलिस अधिकारी ने बीबीसी से कहा, "युवक वाहनों और पुलिस गश्ती दल पर दिनभर पथराव करते रहे, पर स्थिति नियंत्रण में है." मारे गए एक युवक नौगाम के ही थे.

जांच में सहयोग

अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार संस्था एमनेस्टी ने भी भारतीय सेना से आधिकारिक जांच में सहयोग की अपील की है.

अलगाववादी गुटों ने गुरुवार को घाटी में बंद का आयोजन किया था.

नागरिक अधिकार संगठनों की मांग है कि भारतीय सेना को सिविल कोर्ट में केस चलाने से मिली छूट ख़त्म होनी चाहिए.

सेना को विशेषाधिकार देने वाले क़ानून आर्म्ड फोर्सेज़ स्पेशल पॉवर एक्ट (एएफ़एसपीए) को लेकर भारत समर्थक और भारत विरोधी दोनों गुटों के लिए एक राजनीतिक मुद्दा रहा है.

क़ानून के ख़िलाफ़

इमेज कॉपीरइट RIYAZ MASROOR

नागरिक अधिकार कार्यकर्ता रज़ा मुज़फ़्फ़र कहते हैं, "कश्मीर में जब घुसपैठ चरम पर थी, तब सेना को क़ानूनी सुरक्षा दी गई थी, ताकि वह जिसे चाहें, उसे सिर्फ़ संदेह पर गिरफ़्तार कर सकें. अब भारत सरकार शांति होने और चुनाव कराने के दावे कर रही है. यह क़ानून अब हत्या करने का लाइसेंस बन गया है. यह क़ानून ख़त्म होना चाहिए. हम इस शोषणकारी क़ानून को ख़त्म करने के लिए राज्यव्यापी प्रदर्शन करेंगे."

(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए यहां क्लिक करें. आप हमें फ़ेसबुक और ट्विटर पर भी फ़ॉलो कर सकते हैं.)

संबंधित समाचार