'अंडों की झलक बिना बीत गया सितंबर'

झारखंड शिबू सोरेन, हेमंत सोरेन इमेज कॉपीरइट Neeraj Sinha

कुछ हफ़्ते बाद झारखंड में विधानसभा चुनाव होने हैं. जनता के सामने विकल्प के तौर पर कई राजनीतिक दल हैं, पर इनमें से अधिकांश की पृष्ठभूमि दाग़दार है.

इसके अलावा झारखंड के संसाधनों और राजनीतिक अधिकारों के इस्तेमाल को लेकर कई सवाल हैं.

इस बार के विधानसभा चुनाव से जनता को क्या मिलेगा?

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भारत के किसी दूसरे राज्य की तुलना में झारखंड में चुनाव का मतलब सत्ता के लिए खुला संघर्ष है.

राजनीतिक दलों के घोषणापत्रों में गंभीर उद्देश्य नदारद होते जा रहे हैं. उम्मीदवार बिना सोचे-समझे दूसरे दलों का दामन थामने लगे हैं.

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मतदाता पैसे और शराब के बल पर ख़रीदे जाने लगे हैं. उनके लिए सभी दल एक जैसे हैं.

जैसा कि अरुंधित रॉय की नई किताब में भी बेहद कुशलता से यह बात रखी गई है कि लोकतंत्र में अचानक ढेर सारे पैसे आने के कारण राजनीतिक दलों के एजेंडे में जनता के मुद्दे गौण हो गए हैं.

लोकतंत्र के इस खोखलेपन के लिए झारखंड को भारी क़ीमत चुकानी पड़ी है. सामाजिक सूचकांक में भारत के प्रमुख राज्यों की तुलना में झारखंड का प्रदर्शन सबसे बुरा रहा है.

'दिखावटी' शासन

योजना आयोग के मुताबिक़ 2011 से 2012 के बीच झारखंड में ग़रीबी दूसरे राज्यों के मुक़ाबले सबसे अधिक रही.

इसी तरह, यदि मध्य प्रदेश को छोड़ दें तो किसी भी दूसरे राज्य की तुलना में झारखंड में सामान्य से कम वज़न वाले बच्चों की संख्या अधिक है. इसके बावजूद झारखंड की राजनीति में सामाजिक विकास लगभग ग़ायब है.

इस तरह देखें तो पाएंगे कि झारखंड सरकार ने शासन करने का एक अलग ही तरीक़ा ईजाद कर लिया है. हम इसे 'दिखावटी सरकार' कह सकते हैं.

ये दिखावटी सरकार अमल में लाए जाने की परवाह किए बग़ैर घोषणाएं, योजनाओं की शुरुआत और आदेश जारी करने का काम करती है.

इनसे एक ऐसी काल्पनिक दुनिया तैयार हो रही है, जिसका ज़मीनी सच्चाई से कोई लेना-देना नहीं.

खाद्य सुरक्षा क़ानून

उदाहरण के लिए, झारखंड सरकार ने कई बार घोषणा की है कि राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा क़ानून फलां तारीख़ से लागू होगा.

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जुलाई 2014 में कहा गया था कि योजना एक अक्टूबर से लागू होगी.

एक अक्टूबर आया, और चला भी गया. क़ानून को ज़मीनी स्तर पर लागू करना अब भी दूर की कौड़ी है.

हक़ीक़त ये है कि क़ानून लागू करने के लिए झारखंड सरकार के पास न कोई रणनीति है और न इसकी तैयारी.

इसके विपरीत बिहार सरकार बहुत आगे निकल गई है. वहां राशन कार्ड बांटे जा चुके हैं और खाद्य सुरक्षा क़ानून पर अमल शुरू हो गया है.

दिखावटी घोषणाएं

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इसी तरह, मुख्यमंत्री ने अगस्त में घोषणा की थी कि सितंबर से ही प्राथमिक विद्यालयों में 'मिड-डे मिल' में हफ़्ते में तीन बार बच्चों को अंडे दिए जाएंगे.

भूख और कुपोषण से जूझ रहे झारखंड के बच्चों के बेहतर पोषण के लिए यह बढ़िया क़दम साबित हो सकता था.

मगर अफ़सोस, अंडों की झलक पाए बग़ैर ही बच्चों का सितंबर बीत गया. ज़ाहिर है कि प्राथमिक विद्यालयों में अंडों की आपूर्ति का ठेका लालची कारोबारियों के हाथ में चला गया है. ये मसला अब तक अनसुलझा है.

उदाहरणों की फ़ेहरिस्त लंबी हो सकती है. समस्या हेमंत सोरेन सरकार पर सवाल खड़े करने से कहीं ज़्यादा गंभीर है. इससे पहले की सरकारों के समय भी समस्याएं कम गंभीर नहीं थीं.

29 दिसंबर 2013 को जब रांची में नरेंद्र मोदी ने एक विशाल रैली को संबोधित करते हुए झारखंड की जनता से कहा था कि वे राज्य की ग़रीबी पर मंथन करें और भारतीय जनता पार्टी को वोट दें.

यह कहते हुए मोदी भूल गए कि साल 2000 में झारखंड के अलग राज्य बनने के बाद इन 14 सालों में आठ साल यहां भाजपा की सरकार थी.

कमज़ोर विपक्ष

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दिलचस्प ये है कि न केवल यहां की सरकार कमज़ोर है बल्कि विपक्षी पार्टियों का भी किसी मुद्दे पर कोई दखल नहीं है. इसका सबसे बड़ा कारण यह है कि कोई भी दल इन मुश्किलों से वाकिफ़ नहीं है.

झारखंड के प्रमुख राजनीतिक दलों की खाद्य सुरक्षा या ग्रामीण रोज़गार जैसे मसलों में कोई दिलचस्पी नहीं.

रांची में हाल में राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा अधिनियम पर चर्चा के लिए विधानसभा सदस्यों की बैठक हुई.

भोजन का अधिकार अभियान दल की ओर से बैठक बुलाई गई थी. बैठक में केवल दो विधायक पहुंचे.

उनमें से एक ने लंबा-चौड़ा भाषण दिया जिसका अधिकांश हिस्सा खाद्य सुरक्षा से जुड़ा हुआ नहीं था.

जब राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा पर उनसे सवाल किया गया, तो वे बड़ी विनम्रता से 'विशेषज्ञ नहीं हूं' कहकर बात टाल गए.

सबसे बड़ी चुनौती

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Image caption चुनाव जैसे जैसे नजदीक आ रहे हैं नेता कपड़ों की तरह पाला बदलने लगे हैं.

झारखंड का आने वाला चुनाव दिखावटी सरकार के सिद्धांत का एक और विस्तार है. चुनाव में दिखावटी रस्मों को पूरी श्रद्धा से निभाया भी जाएगा.

अब इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन लगाई जाएंगी, लोग भारी संख्या में मतदान के लिए आएंगे और उम्मीद है कि सब कुछ शांतिपूर्वक होगा.

यह बड़ी उपलब्धि होगी, मगर लोकतंत्र नहीं है. यह तो खोखली इमारत की नींव रखने जैसा है.

चुनाव की ये रस्में तभी सफल होंगी, जब झारखंड के लोगों के सामने सार्थक विकल्प हों और वे रोज़मर्रा के जीवन में पूरी हिस्सेदारी के लिए सशक्त बनाए जाएं.

उम्मीदें

उम्मीद है कि आज नहीं तो कल परिस्थितियां बदलेंगी और राजनीतिक दल जनता की इच्छाएं और ज़रूरतें समझेंगे.

झारखंड में आज सबसे बड़ी चुनौती एक पार्टी की जगह दूसरी पार्टी की सरकार बनना नहीं, बल्कि झारखंड की लोकतांत्रिक राजनीति के समूचे एजेंडे में सुधार लाना है.

ऐसे में ज़रूरी है कि वंचित तबक़ों को भी आवाज़ मिले.

सवाल यहां केवल मतदान का नहीं, बल्कि सवाल यह है कि सभी लोकतांत्रिक संस्थानों में लोगों की सक्रिय भागीदारी हो.

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