किसका जन्मसिद्ध अधिकार है, नकल करना

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उत्तर प्रदेश के एक विश्वविद्यालय में एक छात्र नकल करने को अपना जन्मसिद्ध अधिकार बताता है.

उसके पास इसके लिए तर्क भी हैं, जो भारत की उच्च शिक्षा की दुर्गति को परत-दर-परत खोलते जाते हैं.

ऑक्सफ़ोर्ड विश्वविद्यालय के स्कूल ऑफ़ ज्योग्रफ़ी में डेवलपमेंट ज्योग्रफ़ी के प्रोफ़ेसर क्रैग जैफ़री को नकल करने, करवाने की कई अचंभित करने वाली कहानियां सुनने को मिलीं.

पढ़िए क्रैग जैफ़री की पूरी रिपोर्ट

छात्र अक्सर अपने अधिकारों की बात करते हैं लेकिन हाल ही में उत्तर प्रदेश में छात्र विश्वविद्यालय की परीक्षाओं में नकल करने के अधिकार की बात कर रहे हैं.

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उत्तर प्रदेश के एक विश्वविद्यालय के बाहर एक दुबले व्याकुल से दिखले वाले लड़के, प्रताप सिंह, ने हाथ में चाय लेकर खड़े होते हुए मुझसे कहा, "यह हमारा लोकतांत्रिक अधिकार है! नकल करना हमारा पैदाइशी हक़ है."

भारत के इस हिस्से में विश्वविद्यालय के परीक्षा तंत्र में भ्रष्टाचार आम बात है. पैसे वाले परीक्षा में पास होने के लिए घूस दे सकते हैं. युवाओं का एक पूरा वर्ग है जो बेचैन छात्रों और लालची प्रशासन के बीच दलाल का काम करते हैं.

छात्रों का एक और वर्ग जिसे उनके राजनीतिक संपर्कों की वजह से स्थानीय स्तर पर बहुत अच्छी तरह से लोग जानते हैं और परीक्षक उन्हें हाथ लगाने की हिम्मत नहीं करते. मैंने सुना कि स्थानीय गुंडे कई बार परीक्षा केंद्र में अपनी डेस्क पर छुरा निकालकर रख देते हैं. परीक्षक के लिए यह साफ़ संकेत है, 'यहां से दूर ही सहो.... वरना'.

तो, जब राजनीतिक प्रभाव और पैसे वाले नकल कर सकते हैं तो गरीब छात्र पूछते हैं, हम क्यों नहीं?

जब मैं पश्चिमी उत्तर प्रदेश में काम कर रहा था, प्रताप मुझे कैंपस के बीच में मौजूद धुएं भरी कैंटीन के अंदर ले गया.

कुर्सी पर बैठे एक आवारा कुत्ते को लात मारते हुए उसने सिगरेट का एक पैकेट निकाला.

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सिगरेट जलाकर उसका धुआं छत की ओर उड़ाते हुए वह बोला, "भारत का विश्वविद्यालय तंत्र संकट में है. नकल हर स्तर पर होती है. छात्र दाखिला पाने के लिए और अच्छे परिणाम के लिए रिश्वत देते हैं. शोधकर्ता प्रोफ़ेसरों को शोध निबंध लिखने के लिए पैसा देते हैं और प्रोफ़ेसर भी धोखा करते हैं, जाली अख़बारों में लेख छपवा कर".

मुझे प्रताप से सहानुभूति हुई. एक बार तो उत्तर प्रदेश के एक कॉलेज के रजिस्ट्रार ने स्नातकोत्तर के छात्रों की उत्तर पुस्तिकाएं एक अन्य कॉलेज के छात्रों को जांचने के लिए दे दीं.

ऐसी घटनाएं आम हैं लेकिन इस मामले में स्कूल के छात्रों को स्नातकोत्तर स्तर की उत्तर पुस्तिकाएं जांचने के लिए दे दी गईं.

ज़ैप यूनिवर्सिटी

प्लास्टिक की टेबल पर झुके हुए और मक्खियां उड़ाते हुए उसने कहा, "ईमानदारी से कहूं तो मुझे पता नहीं कि इस पर हंसूं या रोऊं."

"हमारी साइंस लैब में जो उपकरण हैं उन्हें उखाड़कर कुएं में फेंक देना चाहिए. इस तरह के विश्वविद्यालय ब्रिटेन में 1950 में रहे होंगे."

कुछ समय वहले मैंने यह विषय उत्तर प्रदेश के एक प्रमुख कॉलेज के कन्या छात्रावास की पिंकी सिंह के सामने उठाया.

हम जहां बैठे हुए थे वह आधी पढ़ने की जगह थी और आधी शहरी जानवरों को रखने का बाड़ा.

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उसने कहा, "शिक्षा के बारे में मैं आपको बताती हूं. पाठ्यक्रम कमज़ोर है और जब लेक्चरर पढ़ाते ही नहीं हैं तो आपको या तो निजी ट्यूशन लेनी पड़ती है या फिर किताबों से याद करना पड़ता है".

"अगर आप सच जानना चाहते हैं तो सुनें, सलीके से पढ़ने का कोई मतलब नहीं है. आपको बस बाज़ार में मिलने वाली नकल की किताबों को खरीदना है और उत्तर पढ़ लेने हैं."

उन्होंने आगे कहा, "इतिहास की पढ़ाई के पहले साल मैं ढंग से पढ़ रही थी, लेकिन मेरे वरिष्ठ छात्रों ने मुझे बताया, कि जाकर नकल की किताबें ख़रीद लो".

कुछ नए खुले निजी विश्वविद्यालय भी बेहतर नहीं हैं. पिंकी ने मुझे बताया कि हाल ही में स्थापित एक विश्वविद्यालय खुद को ज़ैप यूनिवर्सिटी कह रहा था.

छात्रों ने उसमें दाखिले के लिए ऑनलाइन बड़ी मात्रा में पैसा दिया लेकिन तभी अचानक वह विश्वविद्यालय इंटरनेट से गायब हो गया. वह कहीं ज़मीन पर मौजूद नहीं थी और इंटरनेट पर उसका कोई सुराग मिला नहीं.

पिंकी ने मुझसे कहा, "वह बस 'ज़ैप' (यूं ही गायब) हो गया".

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जब मैं उस बातचीत के बारे में सोच रहा था तो मेरे दिमाग़ में उत्तर प्रदेश के उस विश्वविद्यालय की तस्वीर उभर रही थी जहां मैं गया था. मेरे दिमाग में सड़ रही किताबों, टपकते होस्टलों और गंजे मैदान उभर रहे थे.

इस क्षय के चारों ओर समृद्धि के कुछ चिह्न भी मुझे याद आए. प्रधानाचार्यों की महंगी एसयूवी और तीन मंज़िला घर, चमकदार शॉपिंग मॉल, और विश्व स्तरीय शिक्षा दे रहे कुछ विश्वविद्यालय- उनके चमकीले साइनबोर्ड और शीशे के स्वागत कक्ष, सामान्य कॉलेजों को चिढ़ाते से लगते.

'नया नज़रिया'

सवाल यह है कि इसका हल क्या है?

90 के दशक की शुरुआत में जब उत्तर प्रदेश में नकल के समर्थन में रैलियां निकाली जा रही थीं तब राज्य के मुख्यमंत्री ने इन मांगों के आधार पर नकल-विरोधी कानून पर पुनर्विचार की बात की तो दरउसल उन्होंने विद्यार्थियों को नकल की इजाज़त दे दी.

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का नज़रिया अलग है. वह चीज़ों को बदलने की कोशिश कर रहे हैं.

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उच्च शिक्षा के लिए नई नियमन व्यवस्था है.

इससे पहले केंद्र सरकार ने हालिया पंचवर्षीय योजना में विश्वविद्यालयों को मिलने वाले अनुदान में 20 फ़ीसदी की वृद्धि की थी.

लेकिन ऐसे सुधार ऊंट के मुंह में जीरा समान हैं. वैसे भी शिक्षा राज्य सरकारों के अधिकार क्षेत्र में है, केंद्र सरकार के नहीं और उत्तर प्रदेश जैसे राज्य प्रांतीय विश्वविद्यालयों में ठीक से निवेश नहीं कर रहे.

इससे बहुत से छात्र आधुनिकता से वंचित रह जाते हैं और एक अप्रचलित हो चुके पढ़ाई के तरीकों वाले विश्वविद्यालयों के डूबते जहाज़ में फंसे हुए हैं.

नकल के अधिकार को लेकर आंदोलन अजीब नहीं है बल्कि यह भारत की आज की स्थिति पर व्यंग्यात्मक टिप्पणी है.

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