ऑनलाइन दाम इतने कम होते कैसे हैं?

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ऑनलाइन ख़रीदारी पर ग्राहकों को जो छूट मिल रही है वह ऑफ़लाइन विक्रेताओं के लिए देना संभव ही नहीं है.

कई बार ऑनलाइन सेल में सामान उस क़ीमत से भी कम में मिल जाता है जिस पर विक्रेता ख़रीदते हैं.

आख़िर क्या गणित है इस सबके पीछे?

यह बता रहे हैं टेक्नोलॉजी लेखक प्रशांतो कुमार रॉय ऑनलाइन खुदरा बाज़ार पर विशेष श्रृंखला की दूसरी कड़ी में.

धनतेरस पर, दिवाली की शुरुआत के पहले दिन जब भारतीय धातु की चीज़ें ख़रीदते हैं, मैंने एक इंडक्शन कुकर ख़रीदा- ऑनलाइन.

डिलीवरी

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अमेज़न डॉट इन पर दिवाली के एक विशेष ऑफ़र में मैंने सिर्फ़ 3,000 रुपये दिए- यह उसके डिब्बे पर लिखी कीमत की आधी राशि थी. डिलीवरी तो मुफ़्त थी ही.

उसी दिन दिल्ली की एक बड़ी खुदरा दुकान पर वही उत्पाद 4,500 रुपये में बिक रहा था. उस व्यापारी ने मुझे बताया कि वह इसे उत्पादक, जो एक बड़ी बहुराष्ट्रीय कंपनी है, से ही 4000 रुपये में ख़रीद रहे थे.

अक्तूबर की शुरुआत में फ़्लिपकार्ट की 'बिग बिलियन डे' सेल में भारी छूट के साथ क़रीब 15 लाख उपभोक्ताओं को 10 करोड़ डॉलर का सामान बेचा गया.

कई लोग और ख़रीदना चाहते थे लेकिन वेबसाइट क्रैश कर गई और कंपनी के संस्थापकों को ग्राहकों से माफ़ी मांगनी पड़ी, जिसकी वजह क़ीमतों में गड़बड़ी भी शामिल थी.

इसके तुरंत बाद अमेज़न इंडिया ने अपने 'दिवाली धमाका वीक' की घोषणा कर दी, जो कि ख़रीदारों के लिए अपेक्षाकृत बेहतर रहा.

इंटरनेट को समय

ऑनलाइन सेल के बाद उपभोक्ता सेल में मिलने वाले दामों को लेकर हतप्रभ रह गए.

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दिवाली से पहले गुड़गांव की एक उद्यमी पूर्वा राकेश ने स्नैपडील से 60% छूट पर काल्विन क्लाइन और अन्य परफ़्यूम ख़रीदे थे. वह पूछती हैं, "वे ये करते कैसे हैं?"

वह इंटरनेट को ज़्यादा समय नहीं देतीं, लेकिन उन्होंने टीवी चैनलों पर 'एक ख़रीदो एक मुफ़्त' के विज्ञापन देखे, फिर कोशिश की और बस अटक गईं.

तब से वह हैंडबैग ख़रीद चुकी हैं और 80% छूट पर तकियों का ऑर्डर दे चुकी हैं.

लेकिन हमेशा ख़बर अच्छी नहीं होती. पूर्वा को कुछ ऑर्डर मिलने में बहुत देर हुई है और उन्हें रद्द करने, पैसा वापस पाने में दिक़्क़तों का सामना करना पड़ा है.

वह कहती हैं, "अमेज़न बेहतर है. लेकिन उनकी क़ीमतें बहुत कम नहीं होतीं."

'सब्सिडी पर सवार छूट'

हालांकि ख़रीदार तो सेल के मज़े लूट रहे हैं लेकिन बाक़ी लोगों को कम क़ीमतों की चिंता है- इसमें सामान बनाने वाली कंपनियां और उसे बेचने वाले उनके नियमित वितरक और डीलर्स.

उनका कहना है कि ये ई-टेलर्स अपने भारी निवेश के चलते सामान पर सब्सिडी दे रहे हैं.

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इससे संबंधित एक और ख़बर है कि अक्तूबर के अंत में सॉफ़्टबैंक ने भारत में ई-कॉमर्स के क्षेत्र में दस साल में 10 अरब डॉलर निवेश करने का ऐलान किया है.

इस जापानी टेलीकॉम और मीडिया ग्रुप ने भारत की शीर्ष ई-रिटेल कंपनी स्नैपडील में 62.70 करोड़ डॉलर की हिस्सेदारी के चलते इस निवेश की योजना बनाई है.

इस राशि से सॉफ़्टबैंक को स्नैपडील में 30% हिस्सेदारी मिलने की उम्मीद है.

यह ऐलान भारत के दो शीर्ष ई-टेलर्स फ़्लिपकार्ट के एक अरब डॉलर और उसके अगले दिन अमेज़न के दो अरब डॉलर की 'भारी राशि' वाली घोषणाओं के तीन बाद हुआ है.

बिक्री की इजाज़त

भारत में अमेज़न और फ़्लिपकार्ट जैसी विदेशी पूंजी वाली कंपनियों को सामान के भंडारण और ग्राहकों को सीधे बिक्री की इजाज़त नहीं है.

वह दरअसल बाज़ार हैं जो अन्य विक्रेताओं को सामान बेचने की सुविधा देते हैं. इसलिए इनके लिए सामान पर सीधे सब्सिडी देना आसान नहीं है.

ये ऑनलाइन बाज़ार जो कर सकते हैं, और कर रहे हैं, वह यह है कि विक्रेताओं को दी जाने वाली सुविधाओं- जैसे कि पैकेज डिलीवरी और अन्य लॉजिस्टिक्स- पर अपना कमीशन और फ़ीस कम या ख़त्म कर सकते हैं.

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इतने सारे ऑनलाइन ऑफ़र्स पर 'फ़्री डिलीवरी' मिलती है. बड़े सामान पर भी जिन्हें पहुंचाना महंगा पड़ता है.

इन तमाम हलचलों के बावजूद ऑनलाइन कॉमर्स अब भी भारत के कुल खुदरा बाज़ार के एक फ़ीसदी से भी कम है.

'मुक़ाबला मुश्किल है'

तो फिर पारंपरिक खुदरा व्यापारी ई-टेलिंग (ऑनलाइन खुदरा बिक्री) को लेकर इतने चिंतित क्यों हैं? क्योंकि इसका बाक़ी बाज़ार पर असर साफ़ नज़र आ रहा है.

ख़रीदार इंटरनेट पर दाम देखते हैं और फिर शोरूम पर उसी कम क़ीमत की मांग करते हैं.

टेक्नोलॉजी सामान जैसे कुछ क्षेत्रों में ऑनलाइन ख़रीदारी कहीं ज़्यादा है.

दिल्ली के एक टेक्नोलॉजी ट्रेड एसोसिएशन के प्रतिनिधि और वितरक अनिल मांगला कहते हैं कि मोबाइल फ़ोन और कंप्यूटर उत्पादों में लोग ब्रांड और विशिष्टताओं को प्राथमिकता देते हैं, उन्हें चीज़ें को छूने या महसूस करने की ज़रूरत नहीं होती.

मांगला कहते हैं, "न सिर्फ़ ग्राहक बड़ी मात्रा में ऑनलाइन ख़रीदारी कर रहे हैं, बल्कि ऑनलाइन क़ीमतें एक आधार भी बन गई हीं जिस पर वे ख़रीदारी करना चाहते हैं".

और तो और व्यापारियों के दोस्त, रिश्तेदार भी नाराज़ हो जाते हैं जब उन्हें दिए जाने वाली 'ख़ास क़ीमत' ऑनलाइन उपलब्ध क़ीमत से ज़्यादा होती है.

नुक़सान

मांगला के अनुसार 'ग्रे मार्केट' के उत्पाद भी ऑनलाइन बिक्री के लिए पहुंच जाते हैं. ऐसा उत्पाद जिसे बिना आयात शुल्क चुकाए या बिना बिल के लाया गया हो उसे सामान्य वितरकों के लिए बेचना आसान नहीं होता, क्योंकि उन्हें नियमों का पालन करना होता है.

मांगला कहते हैं, "लेकिन ई-टेलर्स बाज़ार हैं और वे ज़िम्मेदारी उस विक्रेता पर डाल देते हैं, जो उनके मंच का इस्तेमाल करता है".

वह कहते हैं कि इसका अर्थ यह है कि देश को टैक्स और शुल्क का भी नुक़सान हो रहा है.

लेखक और उद्यमी रश्मि बंसल कहती हैं कि किताबों के व्यापार में यह असर लंबे समय से नज़र आ रहा था.

सब्सिडी

कई बुकस्टोर बंद हो गए हैं, क्योंकि ऑनलाइन किताबें सस्ती हैं, तुरंत और मुफ़्त डिलीवरी होती है.

एक बार फिर से किताबों को ऑनलाइन बाज़ारों के ज़रिए सब्सिडी दी जा रही है.

बंसल अपनी ही किताबों का उदाहरण देती हैं, जिनकी क़ीमत 200 रुपये रखी गई थी. उन्हें अपने प्रकाशक से लेखक के लिए विशेष छूट 40% मिलती है.

लेकिन एक अग्रणी ऑनलाइन बाज़ार में उन्हें यह किताब सिर्फ़ 90 रुपये में मिल जाती है, वह भी फ़्री डिलीवरी के साथ.

वह कहते हैं, "इससे मुक़ाबला करना बहुत मुश्किल है".

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