कौन थे नेहरू के कट्टर आलोचक?

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भारत के प्रथम प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू के आलोचकों की कमी नहीं है. लेकिन वास्तविकता को समझना हो तो इतिहास के उन पन्नों को पलटना होगा जहां इसके बीज मौजूद थे.

अंबेडकर और जिन्ना की प्रतियोगिता गाँधी से थी, नेहरू से नहीं. कांग्रेस में ही कई लोगों को नेहरू से कई मामलों में मतभेद था. सरदार पटेल, राजेंद्र प्रसाद, संपूर्णानंद और पुरुषोत्तम दास टंडन जैसे नेताओं का नज़रिया नेहरू से अलग था.

कई अवसरों पर ये मतभेद सतह पर भी आए. आगे चलकर नेहरू के सबसे विश्वस्त ही उनके कट्टर विरोधी हो गए. ऐसे लोगों में राम मनोहर लोहिया सबसे अग्रणी रहे.

अगर बाहरी विरोधियों की बात करें तो शुरू से ही राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ और जनसंघ ने नेहरू की मुख़ालफ़त की.

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नेहरू कौन थे? इस सवाल का उत्तर पाने का एक तरीक़ा हो सकता है यह जानना कि उनके विरोधी और आलोचक कौन थे?

पिछले साठ सालों में अक्सर नेहरू को गाँधी के विलोम के रूप में पेश किया जाता रहा है, लेकिन क्या यह सच है?

जब नेहरू ने कार्टूनिस्ट से कहा, 'मुझे भी न बख़्शें...'

संपन्न वकील पिता की इत्मीनान की विरासत के बदले दक्षिण अफ़्रीक़ा से लौटे किसान सरीखे मोहनदास करमचंद गाँधी के खिंचाव को क़ुबूल कर नौजवान नेहरू ने राजनीति में अपनी ज़िंदगी ग़र्क़ कर दी.

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वह अपने देश और अपनी ज़िंदगी के मक़सद की खोज में निकले थे और रास्ते में उन्हें गाँधी नाम का जादूगर मिल गया.

गाँधी से अपने रिश्ते को ख़ुद नेहरू पूरी तरह कभी समझ नहीं पाए. उसमें कुछ रहस्य का तत्व बना रहा. शायद भारत तक पहुँचने का सबसे प्रामाणिक माध्यम उन्हें गाँधी मालूम पड़े.

कुछ भी हो, गाँधी के बग़ैर नेहरू को समझना मुमकिन नहीं है.

गाँधी और नेहरू

गाँधी और नेहरू का रिश्ता द्वन्द्वात्मक था. उनके लिए एक-दूसरे से पूरी तरह सहमत होना कभी ज़रूरी न था.

असहमति के बावजूद दोनों को ही अपनी राजनीति के लिए दूसरे का महत्व मालूम था. यह संबंध 1948 में गाँधी की हत्या के साथ ही ख़त्म नहीं हो गया.

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अगर नेहरू की राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय नीतियों पर ग़ौर करें और उनसे संबंधित नेहरू की दलीलों को पढ़ें तो जान पड़ता है कि विदेश नीति तक में वे गाँधी के अहिंसा के सिद्धांत के उपयोग पर विचार करते रहे थे और एक संवेदनशील राष्ट्र के निर्माण में भी गाँधी के सिद्धांतों की मदद लेने की कोशिश करते रहे.

गाँधी नेहरू के विरोधी नहीं थे, जैसा साबित करने की कोशिश गाँधीवादी ही पिछले साठ साल से करते रहे हैं. किसी व्यक्ति पर बात करते हुए उसकी प्रशंसा का चरम माना जाता है उसका अजातशत्रु होना. वह तो ईसा और गाँधी भी न हुए, जिनकी मौत हिंसक ही हुई.

नेहरू की मृत्यु साधारण हुई, काव्यात्मक नहीं, जैसा उन्होंने गाँधी की मौत के बारे में लिखा. लेकिन कुछ ऐसे लोग थे जो उनका अंत भी गाँधी जैसा ही चाहते थे, जैसा हाल में माहौल ठीक मिलते ही कह भी दिया गया.

नेहरू के आलोचक

नेहरू के प्रतिद्वंद्वी कई थे. लेकिन यह साफ़ हो जाना चाहिए कि कौन न थे. मसलन जिन्ना की प्रतियोगिता नेहरू से नहीं, गाँधी से थी. उसी तरह अंबेडकर भी गाँधी के प्रतिपक्षी थे, नेहरू के नहीं. ये दोनों ही गाँधी के अनुयायियों के रूप में ख़ुद को नहीं देखते थे.

नेहरू से उन्हें अगर परेशानी थी तो इस कारण कि अंग्रेज़ों के जाने की हालत में नए राष्ट्र का सिद्धांत-निरूपण गाँधी के उत्तराधिकारी के रूप में नेहरू करने वाले थे और एक तरह से वह गाँधी के आधिकारिक प्रवक्ता थे.

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स्वाधीनता आंदोलन में नेहरू के प्रतिपक्षी के रूप में सुभाषचन्द्र बोस का नाम लिया जाता है. नेहरू-बोस के पत्राचार को पढ़ने से दोनों के राजनैतिक दृष्टिकोण का फ़र्क़ समझ आता है. लेकिन उसे सबसे सटीक तरीक़े से समझा था तरुण भगत सिंह ने.

वह सुभाष को जुनूनी राष्ट्रवादी और नेहरू को अन्तरराष्ट्रीयतावादी मानते थे और नेहरू को ही नौजवानों के लिए उपयुक्त नेता मानते थे.

नेहरू का राष्ट्रवाद कभी भी सुभाष की तरह बदहवास नहीं हो सकता था कि हिटलर का सहयोग करने को तैयार हो जाए.

नेहरू और पटेल

नेहरू के प्रतिद्वंद्वी सुभाष के अलावा सरदार वल्लभ भाई पटेल थे. पटेल नेहरू से पहले कांग्रेस पार्टी में थे और गाँधी के लगभग समकक्ष भी.

लेकिन राष्ट्र-राज्य के गठन को लेकर और उपनिवेशोत्तर भारतीय सामूहिकता के चरित्र के मामले में दोनों ही दो ध्रुवों पर थे.

सरदार पटेल की राजनीति पर किसका दावा?

पाकिस्तान बन जाने के बाद भारत में मुसलमानों के समान अधिकार वाले नागरिक की तरह रहने को लेकर उन्हें दुविधा थी. उसी प्रकार, एकीकरण की परियोजना में बल-प्रयोग को लेकर उन्हें नेहरू की तरह संकोच न था. वह इस प्रसंग में ख़ासे अधीर थे.

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संविधान-निर्माण के क्रम में आदिवासी बुद्धिजीवियों से हुई वार्ता में भी उनका अधैर्य साफ़ है, क्योंकि उन्हें आदिवासी दृष्टिकोण में अलगाववाद के संकेत मिल रहे थे और यह उन्हें बर्दाश्त न था. यहाँ भी नेहरू की प्रतिक्रिया सहानुभूतिशील है.

यह भी कहा जा सकता है कि कांग्रेस के भीतर ही नेहरू के विरोधी कम न थे. पटेल के अलावा राजेंद्र प्रसाद, संपूर्णानंद और पुरुषोत्तम दास टंडन की सांस्कृतिक दृष्टि नेहरू के ठीक उलट थी.

सोमनाथ मंदिर पुनरुद्धार प्रसंग में राष्ट्रपति राजेन्द्र प्रसाद की भागीदारी पर उनका सख़्त ऐतराज़ सबको याद है. दूसरा बड़ा संकट पैदा हुआ जब कांग्रेस पार्टी ने टंडन को अपना प्रमुख चुन लिया.

नेहरू और कम्युनिस्ट

नेहरू हिंदूवादी टंडन के राजनीतिक नेतृत्व में काम करने को क़त्तई राज़ी न थे. पचास के दशक में ही कांग्रेस पार्टी के भीतर के गाँधीवादियों ने नेहरू विरोधी मोर्चा बनाने का प्रयास भी किया, लेकिन वह नाकामयाब रहा.

कम्युनिस्ट उनके आलोचक जितने थे, विरोधी उतने नहीं. मार्क्सवाद से सहानुभूति होते हुए भी नेहरू को भारतीय कम्युनिस्टों से परेशानी इसलिए थी कि उनमें उन्हें मौलिक चिंतन के साहस का अभाव जान पड़ता था.

Image caption नेहरू कम्युनिस्टों को अपना शत्रु नहीं मानते थे.

1947 की आज़ादी को झूठी कहकर और नव स्वतन्त्र राष्ट्र की सत्ता के विरुद्ध सशस्त्र संघर्ष का ऐलान कर भी उन्होंने नेहरू की उलझन बढ़ा दी, लेकिन नेहरू कम्युनिस्टों को अपना शत्रु नहीं मानते थे.

एक पत्रकार सम्मलेन में जब चुनावों में कम्युनिस्ट पार्टी के बहुमत की ‘आशंका’ व्यक्त की गई, तो नेहरू ने हलके ढंग से कहा कि अगर यह आफ़त आ ही गई तो हम उससे निपट लेंगे.

नेहरू के कटु विरोधी साबित हुए आरंभिक दौर में उनके सहयोगी रहे समाजवादी. इनके प्रवक्ता राम मनोहर लोहिया थे. मधु लिमये ने लिखा है कि 1949 तक लोहिया नेहरू के प्रिय पात्र थे, लेकिन बाद में इनका नेहरू विरोध जुनून की हद तक बढ़ गया.

'निराश नेहरू' का वो ऐतिहासिक भाषण

वह समाजवादियों को धकेल कर समाजवाद-विरोधी राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से सक्रिय सहयोग तक ले गया. अब कहना कठिन है कि भारत में समाजवादी राजनीति जैसी कोई विचारप्रणाली बची भी है या नहीं.

नेहरू और संघ

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आर्थिक विचार के मामले में नेहरू के आलोचक और विरोधी थे राजगोपालाचारी. वे पूँजीवादी दृष्टि के पैरोकार थे और ख़ालिस दक्षिणपंथी. उन्होंने स्वतन्त्र पार्टी बनाई, लेकिन वे धर्मनिरपेक्षता के समर्थक थे.

नेहरू की मृत्यु पर उन्होंने कहा, ''हमारे बीच का आख़िरी सभ्य व्यक्ति विदा हो गया.'' आगे चलकर भारत में किसी धर्मनिरपेक्ष दक्षिणपंथ का अस्तित्व न रहा, जिसकी कामना अभी अमर्त्य सेन भी कर रहे थे.

नेहरू का सुसंगत विरोधी रहा राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ. उसे गाँधी से निबटना था और उस रास्ते में सबसे बड़ी बाधा नेहरू द्वारा व्याख्यायित गाँधी थे. इस व्याख्या को ध्वस्त किए बिना गाँधी को हड़प करना मुमकिन न था.

गाँधी-संस्थाओं और प्रतिष्ठानों में विराजमान गाँधीवादियों को संघ के साथ मिल कर रामधुन गाने में परहेज़ न रहा. गाँधी प्रणीत भारतीयता के लिए सबसे बड़ा ख़तरा नेहरू की निगाह में संघ और तत्कालीन जनसंघ था.

वह बहुसंख्यकवाद के ख़तरों से परिचित थे. इसलिए उन्हें इसमें कोई संदेह न था कि सबसे बड़ी चुनौती भारतीय राष्ट्रवाद को संघ के राष्ट्रवाद से है.

संघ और जनसंघ ने नेहरू के विरुद्ध घृणा प्रचार में कोई मर्यादा नहीं रखी. दूसरे आम चुनाव के पहले दिल्ली भर में पोस्टर लगाए गए जिनमें नेहरू तलवार लिए गायों को बूचड़ख़ाने की तरफ़ हाँकते दिखाए गए थे.

नेहरू को आधा क्रिस्तान और आधा मुसलमान कहकर उन्हें हिंदू-विरोधी घोषित करने से लेकर फ़िरोज़ गाँधी से उनकी बेटी की शादी पर भी घटिया प्रचार करने में परहेज़ नहीं रखा गया. वह दुष्प्रचार बाद में सोनिया गाँधी के विदेशी मूल को मुद्दा बनाने तक गया.

सबसे बड़ा ख़तरा

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मृत्यु के कुछ समय पहले राज्य के प्रमुख अधिकारियों के साथ बैठक में फिर से कम्युनिस्टों के प्रभाव विस्तार की आशंका ज़ाहिर की गई. नेहरू ने कहा कि भारत को ख़तरा कम्युनिस्टों से नहीं है, बहुसंख्यक हिंदू सम्प्रदायवाद से है.

बैठक समाप्त होने पर दरवाज़े से लौटकर नेहरू ने ज़ोर देकर कहा, ''मैं फिर कह रहा हूँ, असल ख़तरा बहुसंख्यक हिंदू सम्प्रदायवाद से है.''

नेहरू के अलग-अलग रंग के आलोचकों की परिणति में ही नेहरू की स्मृति का भविष्य देखा जा सकता है. उनके विरोधियों में राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ ने उनकी मृत्यु के पचासवें वर्ष में हिंदू मानस की कल्पना को ठीक उन्हीं नारों से सम्मोहित कर लिया जिनसे नेहरू उसे सावधान करते रहते थे.

लेकिन क्या इसे नेहरू के विचार की असफलता कहेंगे? नेहरू के प्रति मोहासक्त रोदन से बेहतर है अपने क्षण की चुनौती को समझना और उसमें अपनी भूमिका तय करना. उसमें साहस के साथ आत्म संशय का होना आवश्यक है, जो सोचने का नेहरूवादी तरीक़ा कहा जा सकता है.

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