आधी दुनिया के पूरे हक़ के लिए!

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महिलाएं, चौका-चूल्हा छोड़ अंतरिक्ष पर पहुंच गईं लेकिन ज़मीन पर उनकी स्थिति कमोबेश वैसी ही है.

ज़्यादातर लोगों के लिए बेस्ट कुक अब भी मां ही हैं पापा नहीं. दुनिया की आधी आबादी की छवि कहने को ही बदली है.

दुनिया भर में चर्चा करने के बाद दिल्ली के इंडिया हैबिटैट सेंटर में भी इस मुद्दे पर चार दिन तक माथापच्ची चली.

इस चर्चा से यह बात उभरी कि आधी आबादी को पूरा हक़ देने के लिए पुरुषों को चलना होगा चार क़दम.

महिलाओं की स्थिति बदलने का मतलब उन्हें सुविधा और अधिकार देना रहा है लेकिन अब बात हो रही उनकी नियति समझे जाने वाले कामों का ज़िम्मा पुरुषों को देने की.

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का काम

क्या बलात्कार, यौन शोषण, हिंसा और ग़ैरबराबरी का घरेलू कामों से कोई संबंध है?

विशेषज्ञों का मानना है कि जिन घरों में पुरुष घरेलू काम में सहयोग करते हैं वहां महिलाओँ को ज़्यादा सम्मान मिलता है.

भारत के बाराबंकी में एक सामाजिक संगठन पुरुषों को घरेलू कामों में भागीदारी का महत्व के लिए अभियान चला रहा है.

इस संगठन से जुड़ीं सुनीति नियोगी कहती हैं, "हमें लगा कि महिला और पुरुष की बराबरी के लिए पुरुषों को साथ लाए बिना बात नहीं बनने वाली."

सुनीति बताती हैं कि पुरुषों को मनोरंजक तरीकों से खेल-खेल में घरेलू कामों में हाथ बंटाना सिखाया जाता है.

परिवार नियोजन

परिवार नियोजन प्रमुख रूप से महिलाओँ की ज़िम्मेदारी माना जाता रहा है. इसका उनके शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य पर काफ़ी असर होता है.

अंतरराष्ट्रीय समाज सेवी संगठन प्रोमुंडो के उप निदेशक एंड्रयू लेवैक कहते हैं, "दुनिया भर में बच्चा पैदा करने संबंधी स्वास्थ्य की पूरी ज़िम्मेदारी महिलाओं की मानी जाती है."

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लेवैक मानते हैं कि पुरुषों को इस मामले में अपनी भूमिका समझनी चाहिए.

वो कहते हैं, "रिसर्च से यह साफ़ हो चुका है कि पारंपरिक सोच रखने वाले पुरुष कॉन्डोम का कम इस्तेमाल करते हैं."

गर्भवती महिलाओं की देखभाल

भारत के कई इलाक़ों में महिलाएं पहले बच्चे के प्रसव के लिए मायके जाती हैं. माना जाता है कि मां के घर में अच्छी देखभाल होगी. एकल परिवारों में ये ज़िम्मेदारी पतियों पर है.

ब्राज़ील में एक ग़ैरसरकारी संगठन ने इसके लिए अभियान चलाया.

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गर्भावस्था के दौरान और उसके बाद मां-बच्चे का ख़्याल रखने में पुरुषों की भागीदारी बढ़ाने के बेहतर नतीजे सामने आए हैं.

अब तो बाक़ायदा पिता बनने पर मिलने वाले अवकाश को बढ़ाने की मांग होने लगी है.

बचपन से प्रशिक्षण

पारंपरिक रुप से पुरुष और महिलाओँ की भूमिका को एक ख़ास तरीक़े से दिखाया जाना बच्चों के मन पर असर डालता है.

जंग जीतने,सरकार बदलने, समाजसेवा करने वाले हीरो बन गए, नाचने गाने और तरह तरह के खेल खेलने वाले भी हीरो हैं लेकिन घर में काम करने वाला कोई इतिहास पुरुष कहीं नहीं देखा सुना गया. ज़रूरत है कि इसे बदला जाए.

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