यहाँ रोज़ पकती हैं दो लाख रोटियाँ

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किसी भी आपदा के समय अमृतसर स्थित दरबार साहिब (स्वर्ण मंदिर) के लंगर की प्रबंध कमेटी अहम भूमिका निभाती रही है और कश्मीर की बाढ़ आपदा के दौरान भी कमेटी ने ऐसा ही किया.

कश्मीर में आई बाढ़ आपदा के दौरान इस कमेटी ने सेना और किराए के विमानों से कई क्विंटल भोजन रोज़ाना बाढ़ पीड़ितों तक पहुंचाया था.

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स्वर्ण मंदिर के लंगर में हर वक़्त बड़ी मात्रा में भोजन उपलब्ध रहता है. आम दिनों में क़रीब एक लाख लोग इस लंगर में खाना खाते हैं.

लंगर में रोज़ पंद्रह क्विंटल दाल, बारह क्विंटल चावल और सात क्विंटल आटा लगता है. दो लाख रोटियां बनती हैं, सौ गैस सिलेंडर, 500 किलो लकड़ी और बिजली की खपत भी होती है.

शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी की पत्रिका 'गुरमत प्रचार' के संपादक समरजीत सिंह कहते हैं, "यह लंगर चौबीस घंटे चलता है."

आपदा प्रभावित क्षेत्रों में खाना भेजने के बारे में पूछने पर समरजीत सिंह कहते हैं, "लंगर-पंगत की रवायत हम पर यह ज़िम्मेदारी डालती है कि हम कुदरती आपदा के वक़्त जहां तक हो सके लंगर पहुंचाएं."

कश्मीर के लिए परांठे

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लंगर में तकरीबन 450 लोग काम करते हैं, इसमें वेतनभोगी कर्मचारी और सेवाभाव से काम करने वाले, दोनों शामिल हैं.

आपातकालीन हालात के लिए लंगर के पास रोटियां पकाने वाली तीन मशीनें हैं जो एक घंटे में चार क्विंटल आटा तैयार कर सकती है.

लंगर में एक साथ बारह तवों पर रोटियां पक सकती हैं और हर तवे पर 28 रोटियां एक साथ बन सकती हैं.

लेकिन जब लंगर ने कश्मीर में भोजन भेजना शुरू किया तो उसे मौसम का भी ख्याल रखना होता था.

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शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी की धर्म प्रचार समिति के सचिव सतबीर सिंह ने बताया, "कश्मीर में पकी हुई रोटियां जाते-जाते सूख जाती थीं. इसलिए वहाँ देसी घी के परांठे, सूखी सब्ज़ी और अचार भेजा जाता था."

मुसीबत में ज़्यादा सेवा

अपनी इसी क्षमता की वजह से आपदाग्रस्त क्षेत्रों के लिए इस लंगर का महत्व बहुत बढ़ जाता है.

कुदरती आपदा प्रबंधन में विशेषज्ञ (रिटायर्ड) मेजर जनरल राज मेहता बताते हैं, "आपदा प्रबंधन में दरबार साहब के लंगर की अहमियत बहुत ज़्यादा है. इस बार कश्मीर में लंगर ने जो सेवा की है उसको लोग सालों तक नहीं भूलेंगे."

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आपदा के मौक़ों पर श्रद्धालुओं से लंगर में ज़्यादा सेवा करने की विनती की जाती है और अधिक कर्मचारियों को भी लगाया जाता है.

धर्म और संस्कृति पर शोध कार्य में लगी 'प्रकाश नाद' नामक संस्था से जुड़े जगदीश सिंह कहते हैं, "ऐसे मौक़ों पर ही इंसान के इंसान का हाथ थामने के अहसास को बल मिलता है."

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