पटना: जन सुनवाई में खुली दावों की पोल

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पटना का आर ब्लॉक चौराहा आज एक बार फिर लाल झंडे से पटा था. मौका था भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी-लेलिनवादी) द्वारा आयोजित जन-सुनवाई का.

इस पूरे घटनाक्रम पर नज़र बनाए हुए थे पटना से बीबीसी संवाददाता मनीष शांडिल्य. पढ़िए उनका विस्तृत विश्लेषण.

पार्टी ने जुलाई से सितंबर, 2014 के बीच बिहार के 23 ज़िलों में दो लाख छह हज़ार से अधिक लोगों के बीच सर्वेक्षण किया था. कुल सर्वेक्षित घरों में दो लाख से अधिक घर ग्रामीण इलाक़े से थे. और ऐसे परिवारों में भी 60 प्रतिशत भूमिहीन परिवारों के बीच यह सर्वेक्षण किया गया.

इस सर्वेक्षण से निकले निष्कर्षों को ‘आज का बिहार - विकास के दावे और ज़मीनी हक़ीक़त’ नाम से जारी रिपोर्ट में सामने लाया गया.

निष्कर्ष

रिपोर्ट में बारह निष्कर्ष सामने लाये गये हैं. रिपोर्ट के अनुसार 60 प्रतिशत से अधिक ग्रामीण परिवार अब भी भूमिहीन हैं और लगभग 40 प्रतिशत परिवारों को ही मनरेगा के तहत जॉब-कार्ड मिल पाता है. रिपोर्ट में स्कूलों में सौ फ़ीसदी नामांकन के सरकारी दावे को भी ख़ारिज किया गया है.

रिपोर्ट के निष्कर्ष की झलक जमुई की सविता देवी और पूर्णियां के तेतर ऋषि के बयानों में भी सुनाई दी. दलित समुदाय से आने वाली सविता ने बताया कि उन्हें न तो इंदिरा आवास योजना के तहत राशि मिली है और न ही शौचालय बनाने के लिए.

वहीं तेतर के अनुसार सालों सरकारी दफ़्तरों के चक्कर काटने के बावजूद उन्हें अब तक ज़मीन नहीं मिली है. ग़ौरतलब है कि बिहार सरकार ने भूमिहीनों को तीन डिसमिल ज़मीन देने की घोषणा कर रखी है.

महत्व

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सर्वेक्षण के महत्व पर भाकपा (माले) के राष्ट्रीय महासचिव दीपांकर भट्टाचार्य ने कहा, ‘मार्क्सवादियों के लिए वस्तुगत यथास्थिति का अध्ययन करना और इसके आधार पर उसे बदलने के लिये आंदोलन करना ज़रुरी है. यह सर्वेक्षण इस दिशा में हमारी मदद करेगा.’

जन-सुनवाई को भारतीय कम्युनिष्ट पार्टी (मार्क्सवादी) के राष्ट्रीय महासचिव प्रकाश करात और भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के वरिष्ठ नेता अतुल कुमार अंजान ने भी संबोधित किया.

करात ने कहा कि बिहार सरकार सूबे के मज़दूर, किसान और मेहनतकश जनता के लिए काम नहीं कर रही है. साथ ही हर नेता ने अपने भाषण में केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार को भी निशाने पर लिया.

अकादमिक मानदंड

रिपोर्ट खुद कहती है कि इसमें ग्रामीणों के एक ख़ास वर्ग पर ज़्यादा ध्यान केंद्रित किया गया है. ऐसे में एक सवाल यह खड़ा होता है कि यह सर्वेक्षण अकादमिक मानदंडो के कितना क़रीब है?

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इस सवाल पर जन आंदोलनों के राष्ट्रीय समन्वय यानी एनएपीएम के बिहार संयोजक और प्राध्यापक आशीष रंजन कहते हैं, ‘चूंकि सर्वेक्षित परिवारों की संख्या बहुत ज़्यादा है. ऐसे में सर्वेक्षण के तथ्य अगर अकादमिक मानदंडों पर पूरी तरह खरे न भी उतरें तो भी वे ज़मीनी सच्चाई के बहुत क़रीब हैं.’

सवाल

दूसरी ओर जानकार यह सवाल उठा रहे हैं कि भाकपा (माले) जैसा दल जब दशकों से ग़रीबों, भूमिहीनों और दलितों के बीच काम कर रहा है तो आज भी उनकी स्थिति में कोई बड़ा बदलाव क्यों नहीं आया है?

इन सबके बीच भाकपा (माले) ने अपनी रिपोर्ट से सरकार को आईना दिखाने का काम ज़रुर किया है. इसका दावा आज दीपांकर भट्टाचार्य ने भी किया. ग़ौरतलब है कि बिहार सरकार भी अगले हफ़्ते अपना रिपोर्ट कार्ड जारी करेगी.

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