गाँववालों ने दी प्रिंसिपल को उपहार में कार

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एक ग़ैर सरकारी संगठन के मुताबिक राजस्थान में आधारभूत सुविधाओं और शिक्षकों की कमी के चलते दस में से चार विद्यार्थी निजी स्कूलों में दाखिला लेने को मजबूर होते हैं.

ग्यारह से 14 आयु वर्ग की लड़कियों की स्कूल छोड़ने की दर 2011 के 8.9. प्रतिशत से बढ़कर 2012 में 11.2 और 2013 में 12.1 प्रतिशत हो गई है.

ये आंकड़े गैर सरकारी संगठन "प्रथम" के हैं. ऐसे में एक राहत और उम्मीद की बयार लेकर आया है सीकर का एक सरकारी स्कूल जहां बच्चों का परिणाम शत प्रतिशत आया और ग्रामीणों ने स्कूल के प्रिंसिपल और शिक्षकों को उपहार भेंट किए.

पढ़िए आभा शर्मा की पूरी रिपोर्ट

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सीकर ज़िले की ढाढण पंचायत के सरकारी स्कूल के शत प्रतिशत परिणाम से उत्साहित लोगों ने स्कूल प्रिंसिपल को एक ऑल्टो कार भेंट की है और सभी शिक्षकों को 40 ग्राम चांदी के मेडल से सम्मानित किया गया है.

सीकर मुख्यालय से 70 किलोमीटर दूर स्थित इस उच्च माध्यमिक विद्यालय में वर्ष 2009 में करीब 450 विद्यार्थी थे, अब उनकी संख्या बढ़कर 1,150 हो गई है.

स्कूल के प्रिंसिपल भागीरथ सिंह माहिचा ने बीबीसी को बताया कि पहले विज्ञान संकाय में उचित व्यवस्था के अभाव में छात्र-छात्राओं को निजी स्कूलों में दाखिला लेना पड़ता था.

उन्होंने कहा, "सरकार से न समुचित अनुदान मिल रहा था, न स्टाफ पूरा था और लैब आदि की व्यवस्था भी संतोषजनक नहीं थी. अब यहां कंप्यूटर, फिज़िक्स, केमिस्ट्री और बायोलॉजी लैब सब हैं. यह ज़िले का एकमात्र सरकारी आवासीय विद्यालय है जहाँ करीब 150 विद्यार्थी रह रहे हैं."

'समय के पाबंद'

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दीनदयाल पारीक और उनके भाइयों के सात बच्चे यहां पढ़ते हैं.

वह कहते हैं, "प्रिंसिपल समर्पित और अच्छे शिक्षक हैं, अनुशासनप्रिय प्रशासक और ज़रूरत पड़ने पर लिपिक का काम करने में भी संकोच नहीं करते."

गांव वाले बताते हैं कि प्रिंसिपल का गांव स्कूल से 25 किलोमीटर ही दूर है लेकिन रात को वह हॉस्टल में ही रुकते हैं, समय के पाबंद हैं और सबसे बड़ी बात है कि उनका शिक्षकों और अभिभावकों दोनों से तालमेल बहुत अच्छा है.

दीनदयाल बताते हैं, "हमारे स्कूल में शिक्षकों की कमी थी. उन्होंने गांववालों से कहा कि यदि हमें अच्छे शिक्षक चाहिए तो वेतन भी अच्छा देना चाहिए. उन्होंने आस-पास के प्रतिभाशाली पर बेरोज़गार युवकों को पढ़ाने को प्रेरित किया. उनका वेतन जनसहयोग से ही दिया जाता है."

मॉडल स्कूल

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पूरे गाँव की सर्वसम्मत राय थी कि प्रिंसिपल और उनके स्टाफ की मेहनत का सम्मान किया ही जाना चाहिए.

गांववालों ने उन्हें लैपटॉप और मेडल देने का विचार किया था लेकिन बच्चों ने अपने माता पिता को कहा कि "मास्टर साहिब का सम्मान कर रहे हो तो खुले मन से करो और कार के लिए राशि जुट गई."

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इस स्कूल से बारहवीं बोर्ड में 151 बच्चे बैठे जिनमें से 134 फर्स्ट डिवीज़न में पास हुए. दसवीं में 136 में से 86 ने अव्वल श्रेणी पाई.

शेखावाटी में भामाशाहों के शिक्षा में योगदान की परंपरा रही है. ढाढण के स्कूल में भी पानी, बिजली फर्नीचर और रखरखाव का सारा खर्च शक्ति मंदिर ट्रस्ट वहन कर रहा है. स्कूल और हॉस्टल की इमारत भी उसी के सहयोग से बनी है.

राजस्थान सरकार हर ग्राम पंचायत में पहली से 12वीं तक के मॉडल स्कूल खोलना चाहती है. ढाढण पंचायत का यह सरकारी स्कूल इसके लिए एक आदर्श हो सकता है.

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