जब फ़ैज़ के लिए डेढ़ घंटे रोकी गई ट्रेन!

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25 अप्रैल, 1981 का दिन था, ऐसा लग रहा था कि इलाहाबाद शहर का हर रिक्शा, तांगा और स्कूटर इलाहाबाद विश्वविद्यालय की ओर चला जा रहा है.

मशहूर सीनेट हॉल के सामने फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ को सुनने के लिए हज़ारों लोग जमा थे. उनमें से एक थे मशहूर लेखक रवींद्र कालिया.

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कालिया उस दिन को याद करते हुए कहते हैं, ''उस दिन मुशायरे की सदारत कर रही थीं महादेवी वर्मा. फ़िराक गोरखपुरी बीमार थे. इसलिए उन्हें गोद में उठाकर मंच पर बैठाया गया था. उनके साथ बैठे थे उपेंद्रनाथ अश्क, प्रोफ़ेसर अकील रिज़वी और डॉक्टर मोहम्मद हसन.

फ़ैज ने अपने भाषण में कहा था,-मेरा दुनिया को सिर्फ़ यही संदेश है...इश्क करिए. फ़िराक साहब एक टक फ़ैज़ को देखे जा रहे थे. तभी डॉक्टर हसन ने फ़िराक का मशहूर मिसरा पढ़ा था-

''आने वाली नस्लें तुम पर रश्क करेंगी हमअसरों

जब उनको ये ध्यान आएगा तुमने फ़िराक को देखा है.''

फिर उन्होंने इसकी तरमीम करते हुए कहा था कि आने वाली नस्लें आप पर रश्क करेंगी जब उन्हें पता चलेगा कि आपने फ़ैज़, फ़िराक और महादेवी को एक ही मंच पर देखा था.''

जब शुभा मुद्गल ने शामे-फ़िराक गाया

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Image caption शुभा मुद्गल ने फ़ैज़ के सामने उनकी ग़ज़ल कांपती आवाज़ में बड़े संकोच के साथ पढ़ी थी.

अगले दिन हिंदी अकादमी के कार्यक्रम में 22 साल की एक युवती ने फ़ैज़ के सामने उनकी ही ग़ज़ल गाई थी. उस लड़की का नाम था शुभा गुप्ता जिन्हें आज लोग शुभा मुद्गल के नाम से जानते हैं.

शुभा बताती हैं, ''इलाहाबाद विश्वविद्यालय की एक छात्रा फ़ैज़ के सामने उनकी ही एक ग़ज़ल गाने वाली थीं और उसकी तैयारी मेरे गुरु रामाश्रय झा को सौंपी गई थी. अचानक मेरे घर के दरवाज़े की घंटी बजी तो देखा कि सामने गुरुजी खड़े हैं. उन्होंने छूटते ही कहा कि मेरे साथ चलो.''

शुभा आगे का वाक़या बताती हैं, ''वो मोपेड चलाते थे. मैं उनके पीछे की गद्दी पर बैठकर हिंदी अकादमी पहुंची. वहाँ उन्होंने बताया कि वह छात्रा ग़ज़ल नहीं गा पा रही है. तुम्हें फ़ैज़ की ग़ज़ल पढ़नी है 'शामे फ़िराक अब न पूछ', मैंने कहा कि वो ग़ज़ल तो याद ही नहीं है मुझे. उन्होंने कहा कि अपने पिताजी से पूछकर लिख लो. कापी का एक पेज फाड़कर वो ग़ज़ल मैंने लिखी और कांपती आवाज़ में बड़े संकोच के साथ फ़ैज़ के सामने इसे पढ़ा.''

फिर क्या हुआ, शुभा कहती हैं, ''फ़ैज़ साहब बड़े उदार थे. कहने लगे तुम्हारे हाथ में क्या है. मैं उसे छिपाने की कोशिश कर रही थी. लेकिन जब उन्होंने पूछ ही लिया तो मुझे कॉपी का वो पेज दिखाना ही पड़ा. उसे देखकर उन्होंने पूछा कि तुम्हें उर्दू नहीं आती? मैंने कहा- उर्दू सीखी नहीं है इसलिए मैंने इसे देवनागरी में लिखा है. फ़ैज़ ने कहा तुम्हारे तलफ़्फ़ुज़ से तो नहीं लगा कि तुम्हें उर्दू नहीं आती. फिर उन्होंने उस काग़ज़ पर अपने ऑटोग्राफ़ दिए. मैं हक्की-बक्की देखती रह गई कि मुझ जैसी नौसीखिया छात्रा से फ़ैज़ इतने प्रेम और स्नेह से बात कर रहे थे.''

जब ट्रेन लेट कराई गई

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Image caption फ़ैज ने 20 नवंबर 1984 को इस दुनिया को अलविदा कहा.

फ़ैज़ को इलाहाबाद से दिल्ली रवाना होना था. उनकी ट्रेन आधी रात को आनी थी. फ़ैज़ ने अपने मेज़बान डीपी त्रिपाठी से कहा, ''बरख़ुद्दार ट्रेन लेट करा दो, हमें सादिका शरन से मिलना है.''

डीपी त्रिपाठी को फ़ैज़ की वह मांग अभी तक याद है, ''ये अजीब-सी मांग थी और ट्रेन छूटने से कुछ मिनट पहले आई थी. ख़ैर, फ़ैज़ साहब को न कहने का तो सवाल ही नहीं उठता था. हमने रेलवे स्टेशन पहुंचकर स्टेशन मास्टर से विनती की लेकिन उसने ट्रेन रोकने से साफ़ इनकार कर दिया. हम उनको मनाने की कोशिश करते रहे लेकिन हमारी सारी कोशिशें नाकाम हुईं.

त्रिपाठी कहते हैं, ''तब हमने उन्हें आखिरी चेतावनी दी...अगर आपने ऐसा नहीं किया तो हम सब छात्र रेलवे ट्रैक पर लेट जाएंगे. जब उन्होंने देखा कि हम टस से मस नहीं होने वाले तो उन्होंने ट्रेन रुकवा दी. एक शायर की इच्छा का सम्मान करने के लिए ट्रेन पूरे डेढ़ घंटे तक रुकी रही और जब फ़ैज़ ट्रेन पर सवार हो गए तो मैंने दिल्ली में उनके मेज़बान इंदर कुमार गुजराल को फ़ोन मिलाकर बताया कि फ़ैज़ साहब कल डेढ़ घंटे देर से दिल्ली पहुंचेंगे.''

उधार के पैसे की अंगूठी

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Image caption फ़ैज़ अहमद फ़ैज अपनी पत्नी एलिस के साथ

वर्ष 1941 में फ़ैज़ ने एक अंग्रेज़ महिला एलिस से श्रीनगर में विवाह किया था और उनका निकाह पढ़वाया था उस समय कश्मीर के सबसे बड़े नेता शेख़ अब्दुल्ला ने.

फ़ैज़ के नवासे अली मदीह हाशमी बताते हैं, ''1941 में श्रीनगर में उनका निकाह हुआ था. मेरी नानी ने मुझे बताया कि फ़ैज़ उनके लिए एक अंगूठी लेकर आए थे. एलिस ने पूछा कि पैसे कहां से आए अंगूठी ख़रीदने के, तो उन्होंने कहा कि मियां इफ़्तखारुद्दीन से उधार लिए हैं लेकिन हम उनको वापस नहीं करेंगे.''

हाशमी ने बताया, ''एलिस ने अंगूठी पहनी. वो उन्हें बिल्कुल फ़िट आई. उन्होंने फ़ैज़ से पूछा- नाप कहां से मिला? फ़ैज़ ने कहा मैंने अपनी उंगली का नाप दिया. इसे कहते हैं परफ़ैक्ट फ़िट. हमारी उंगलियां भी बराबर हैं. उस शादी में उनकी तरफ़ से तीन बाराती गए थे और शाम को हुए दावते-वलीमा में जोश मलीहाबादी और मजाज़ भी शामिल हुए थे.''

फ़ैज़ और नरूदा

Image caption पाब्लो नरूदा साहित्य जगत में एक प्रमुख हस्ताक्षर रहे.

1962 में फ़ैज़ को सोवियत संघ ने लेनिन शांति पुरस्कार से नवाज़ा था. चूंकि फ़ैज़ को दिल का दौरा पड़ चुका था इसलिए उन्हें हवाई जहाज़ से सफ़र करने की मनाही थी. वो कराची से नेपल्स पानी के जहाज़ से गए थे और फिर वहां से तीन दिनों का ट्रेन का सफ़र करते हुए मॉस्को पहुंचे थे.

इस पूरे सफ़र में उनकी बेटी और आज पाकिस्तान की मशहूर चित्रकार सलीमा हाशमी भी साथ थीं. सलीमा बताती हैं, ''मॉस्को पहुंचने के बाद हम लोगों को सोची ले जाया गया जहां मशहूर कवि पाब्लो नरूदा भी अपनी पत्नी के साथ आराम करने आए हुए थे. एक शाम उन्होंने मेरे अब्बू को आमंत्रित किया और उनके लिए छोटी सी दावत रखी. शाम ज्यों-ज्यों ढलती गई, दोनों शायरों ने अपने-अपने कलाम पढ़ने शुरू किए."

सलीमा कहती हैं, "पाब्लो ने स्पेनिश में पढ़ना शुरू किया और अब्बू ने उर्दू में पढ़ा. साथ-साथ अनुवादक उनका तर्जुमा कर रहे थे. थोड़ी देर बाद मैंने महसूस किया कि अनुवादक पीछे रह गए और दोनों शायर अपनी-अपनी ज़ुबान में एक दूसरे से हमकलाम हो रहे थे. पाब्लो सुनाते गए, अब्बू सुनाते गए. मुझे याद है उस दिन पूरा चांद निकला था. अजीब सी कैफ़ियत थी. मेरी उम्र 17-18 साल की रही होगी. मुझे यह महसूस हुआ कि यह बहुत अनोखी शाम है और जो मंज़र मैं देख रही हूं उसका मौक़ा शायद ज़िंदगी में दोबारा न आएगा.''

शेख़ मुजीब का इसरार

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Image caption फ़ैज अहमद फ़ैज एक कार्यक्रम में अटल बिहारी वाजपेयी के साथ.

1974 में फ़ैज़ पाकिस्तानी प्रधानमंत्री ज़ुल्फ़िकार अली भुट्टो के उस प्रतिनिधिमंडल में शामिल थे जो बांग्लादेश बनने के बाद पहली बार वहां गया था.

फ़ैज़, शेख़ मुजीब को पहले से जानते थे. जब वह शेख से मिले, तो उन्होंने कहा कि हमारे ऊपर भी कुछ लिखिए. बांग्लादेश से वापस आने के बाद उन्होंने शेख़ मुजीब के इसरार पर मशहूर नज़्म कही थी- हम थे ठहरे अजनबी...

बैरूत का एकाकी जीवन

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Image caption फ़ैज़ अपनी पत्नी एलिस और बेटियों सलीमा तथा मुनीज़ा के साथ.

1977 में जनरल ज़िया के सत्ता में आने के बाद फ़ैज़ को पाकिस्तान छोड़ना पड़ा और उन्होंने चार वर्षों तक बैरूत में निर्वासन का जीवन बिताया.

उनकी बेटी सलीमा हाशमी कहती हैं कि उन्हें अपने अब्बू का एक बहुत दुखी ख़त मिला जिसमें उन्होंने लिखा था कि उन्होंने मेरा बचपन नहीं देखा क्योंकि वह उस समय जेल में थे. कम से कम मुझे मेरे नाती-पोतों का बचपन तो दिखा दो.

सलीमा अपने बच्चों को वहां लेकर गईं तो वो उनसे मिलकर बहुत ख़ुश हुए. लेकिन उन्होंने महसूस किया कि फ़ैज़ वहां बहुत अकेले थे. लेकिन फ़लस्तीन को उन्होंने बहुत टूटकर चाहा था. वो शायद उनका आख़िरी प्यार था.

सबसे बड़ी दिक्कत थी कि बैरूत में उनके शेरों को सुनने वाला कोई नही था. वहां एक पाकिस्तानी बैंक मैनेजर रहा करते थे जिन्हें वह अपने शेर सुनाते थे. वहां तैनात पाकिस्तानी राजदूत को भी शेरो-शायरी की कोई ख़ास समझ नहीं थी.

शराब के शौक़ीन

फ़ैज़ शराब के शौकीन थे. एक बार किसी ने मज़ाक किया था कि फ़ैज़ के स्कूल का नाम स्कॉच मिशन हाईस्कूल था. लगता था कि ये तभी से तय हो गया था कि शराब से उनका साथ हमेशा के लिए रहेगा.

उनकी बेटी सलीमा कहती हैं कि वो शराब ज़रूर पीते थे लेकिन उन्हें किसी ने कभी नशे में धुत्त नहीं देखा. दरअसल जितनी वो पीते थे उतने ही शांत हो जाते थे. वैसे भी वह बहुत कम बात करते थे और दूसरों की बातें ज़्यादा सुना करते थे.

उन्हें महिलाओं का साथ भी बहुत पसंद था. अली मदीह कहते हैं कि महिलाओं से ही उन्हें सीख मिली थी कि कभी भी कोई कड़वा शब्द इस्तेमाल न करें.

शौकत हारून से इश्क़

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Image caption फ़ैज के बारे में कहा जाता है कि वे बोलते कम, सुनते अधिक थे.

एक बार एक इंटरव्यू में अमृता प्रीतम ने उनसे पूछा था कि क्या एलिस को उनके सारे इश्क़ों के बारे में पता था? फ़ैज़ का जवाब था, ''बिल्कुल. वह मेरी पत्नी ही नहीं मेरी दोस्त भी हैं.. यही वजह है कि हम लोग इतने साल तक साथ रहे.''

उसी इंटरव्यू में फ़ैज़ ने अपनी एक दोस्त और शायद माशूका शौकत हारून का ज़िक्र किया है. शौकत उनसे जेल के अस्पताल में मिली थीं जब वो रावलपिंडी षड्यंत्र केस में कराची जेल में बंद थे.

फ़ैज़ के दामाद हुमैर हाशमी याद करते हैं कि शौकत जिन्हें लोग प्यार से शौकी कहते थे लंबे क़द और गोरे रंग की महिला थीं. वह आमतौर से साड़ी पहनती थी. उनके बाल करीने से कटे होते थे और वह महँगी सिगरेट पिया करती थीं.. और वो भी हमेशा एक लंबे नक्काशीदार सिगरेट होल्डर में. उनकी साड़ियों से बेहतरीन परफ़्यूम्स की महक आया करती थी."

1968 में जब फ़ैज़ कराची से लाहौर लौटे तो उन्हें शौकी के अचानक देहांत की ख़बर मिली. फ़ैज़ के लिए इसे सहन कर पाना बहुत मुश्किल था.

वह कुछ दिन तक बिल्कुल शांत हो गए. कुछ दिन बाद उन्होंने उनकी याद में तीन मरसिए ''दूर जाकर करीब हो जितने...'' ''चांद निकला किसी जानिब तेरी ज़ेबाई का'' और ''कब तक दिल की ख़ैर मनाएं''...इसमें से आख़िरी दो मरसिए फ़रीदा ख़ानम ने गाए थे.

फ़रीदा ख़ानम और नूरजहाँ से दोस्ती

सूफ़ी गुलाम मुस्तफ़ा तबस्सुम फ़ैज़ के उस्ताद थे. उनको वह अपनी रचनाएं सुधारने के लिए देते थे. एक बार दोपहर के खाने पर फ़ैज़ और तबस्सुम बैठे थे.

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Image caption नूरजहां, फ़ैज़ को बहुत चाहती थीं.

फ़ैज़ ने इच्छा जताई कि क्या ही अच्छा हो फ़रीदा ख़ानम यहां आ जाएं. उन्हें फ़ोन किया गया और उन्हें लेने के लिए कार भेजी गई. फ़रीदा पहुंच भी गईं पूरी तरह सजी-धजी. दिन का खाना शाम तक चला.. और वह महफ़िल में तब्दील हो गया.

दोस्तों को पता चला कि फ़ैज़, तबस्सुम और फ़रीदा ख़ानम एक साथ बैठे हैं, तो उनकी तादाद बढ़ती चली गई.

उसी तरह एक बार जब फ़ैज़ लाहौर में नूरजहां के लिबर्टी मार्केट के घर के नीचे से गुज़र रहे थे तो उन्होंने तय किया कि नूरजहां के घर पर अचानक दस्तक देकर उनसे मिला जाए.

जब फ़ैज़ अंदर पहुंचे तो नूरजहां हारमोनियम बजाती हुई कुछ गा रही थीं. फ़ैज़ को देखते ही उन्होंने हारमोनियम बजाना बंद कर दिया, ख़ुशी से चिल्लाईं और दौड़कर फ़ैज़ को गले लगाकर चूमने लगीं.

शराब मंगवाई गई और फ़ैज़ के इसरार पर नूरजहां ने फिर से गाना शुरू किया और वो महफ़िल सुबह पौ फटने तक चली.

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