आज़ादी का चुंबन और विरोध की आवाज़ें

'किस ऑफ़ लव' अभियान

'किस ऑफ़ लव' अभियान भारत में आहिस्ता-आहिस्ता रफ़्तार पकड़ रहा है.

नौजवानों के लिए यह अपनी बात कहने की आज़ादी का तरीक़ा है तो ऐसे 'लकीर के फकीर' लोग भी हैं जो नैतिकता के नाम पर अपना रवैया सख़्त किए हुए हैं.

जानकार कहते हैं कि यह आंदोलन सामाजिक तौर-तरीक़े की सख़्ती के ख़िलाफ़ नई पीढ़ी की भावनाओं में आए उबाल की तरह दिखने लगा है.

आंदोलन का किसी ऐसे स्तर पर पहुंचना अभी बाक़ी है जिसमें सामाजिक और राजनीतिक चेतना के उभार के लक्षण दिखें और जिसका असर सामाजिक तौर-तरीक़ों पर पड़े.

दो नवंबर को कोच्चि में शुरुआत के बाद यह अभियान दिल्ली, कोलकाता, मुंबई, चेन्नई और हैदराबाद पहुंचा और पुलिस की इजाज़त के बाद यह नवंबर के आख़िर तक बंगलुरू पहुंचने को तैयार है.

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कई लोगों को यह अभियान दिल्ली गैंगरेप और भ्रष्टाचार को लेकर हुए विरोध प्रदर्शनों की याद दिलाता है. मगर कई विरोधाभास हैं जो हंसाते हैं और आश्चर्यचकित भी करते हैं.

राजनीतिक फ़लक पर क्या कुछ चल रहा है, यह आंदोलन इसकी झलक दिखाता है.

केरल में कोझीकोड के एक 'पारिवारिक रेस्तरां' में नौजवान लोगों की 'नज़दीकियों' को एक चैनल ने स्टिंग ऑपरेशन के नाम पर दिखाया और उसके बाद बीजेपी युवा मोर्चा की अगुवाई में उस कॉफ़ी शॉप पर हमला बोल दिया गया.

कहा जाता है कि चैनल का संबंध कांग्रेस पार्टी से था लेकिन बंगलुरू में विचारों का संगम देखा जा रहा है जहां कांग्रेस और बीजेपी दोनों के नेताओं ने कर्नाटक कांग्रेस की अगुवाई वाली सरकार पर इस 'किस कैंपेन' को इजाज़त न देने की सलाह दी है.

'तानाशाही'

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उनका कहना है कि सार्वजनिक जगहों पर चुंबन भारतीय संस्कृति के ख़िलाफ़ है, जो चारदीवारी के दायरे में किया जाता है. उसे सार्वजनिक करने की अनुमति नहीं दी जा सकती."

समाजशास्त्री शिव विश्वनाथन ने बीबीसी हिंदी से कहा, "संदेश साफ़ है कि जिस्म के बर्ताव को लेकर किसी भी तरह का कट्टरपंथ स्वीकार नहीं होगा. जिस्म ही उपभोक्तावाद और आज़ादी का स्रोत है. 25 साल से कम उम्र का कोई भी शख़्स अपने जिस्म पर किसी तरह की तानाशाही स्वीकार करने को तैयार नहीं."

विश्वनाथन कहते हैं कि अभिभावक, परिवार, सिविल सोसायटी और समुदाय कहे तो ठीक पर सरकार या सरकार समर्थित समूह नैतिकता पर फ़ैसला नहीं दे सकते. इससे नौजवान पीढ़ी में बेहद तनाव है.

प्यार का चुंबन

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उनका कहना है, "हम एक अलग तरह के समाज में रहते हैं जहां शरीर, ख़्वाहिशें, साथ रहने का अहसास और बराबरी के लिए बेक़रारी जैसी भावनाएं महसूस की जा सकती हैं. इसलिए अब बीते कल में वापसी की बात कोई स्वीकार नहीं करता और संस्कृति की ओर लौटने के आह्वान को असभ्य माना जाता है."

गीता रामाशेषन पेशे से वकील हैं और चेन्नई में महिला अधिकारों के लिए भी काम करती हैं.

वह कहती हैं, "चुंबन अभियान पर हम प्रतिक्रिया व्यक्त करते हैं क्योंकि इसमें एक औरत शामिल होती है लेकिन जब एक आदमी सड़क किनारे पेशाब करता है तो किसी को फ़र्क़ नहीं पड़ता. जैसे सभी ने इसे इस कदर अपना लिया है कि कोई नहीं सोचता कि यह भद्दी बात है."

गीता का मानना है, "दुर्भाग्य से इस मामले में किसी ने भी सार्वजनिक जगहों पर फूहड़पन या फिर कोर्ट में उपद्रव करने का सवाल नहीं उठाया है."

प्रतीकात्मक विरोध

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हालांकि एक अपवाद है कि जब सुप्रीम कोर्ट ने यह साफ़ किया था कि किसी के गाल चूमने और किसी को गले लगाने में कोई भद्दी बात नहीं है.

बाबू मैथ्यू ट्रेड यूनियन की राजनीति कर चुके हैं और क़ानून के जानकार हैं. उनका कहना है, "प्यार के चुंबन को वासना की नज़र से नहीं देखा जा सकता. अगर कोई ऐसा सोचता है तो उसका दिमाग़ खराब है. यह एक प्रतीकात्मक विरोध है."

उन्होंने कहा, "नैतिकता के नाम पर किसी तरह की पहरेदारी का विरोध करने से लोकतंत्र ही मज़बूत होगा."

कन्नड़ सिनेमा के लिए अवॉर्ड जीत चुकीं कविता लंकेश ने कहा, "क्या लोगों को पीटना हमारी संस्कृति है? और अगर यह बात है तो मैं हिंसा का चुंबन लेना अधिक पसंद करूंगी. चुंबन को हमेशा अश्लील नहीं माना जा सकता. यह निर्दोष भी हो सकता है."

पश्चिमी संस्कृति!

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एक तरफ इस अभियान की ज़बर्दस्त आलोचना हो रही है तो श्रीराम सेने जैसे दक्षिणपंथी संगठन हमला भी बोल रहे हैं.

श्रीराम सेने ने मंगलौर में महिलाओं पर सिर्फ़ इसलिए हमला किया क्योंकि वे एक पब में थीं.

वैलेंटाइंस डे के विरोध का मसला हो या एक बर्थडे पार्टी पर बजरंग दल का हमला हो क्योंकि उसमें नौजवान लोग भाग ले रहे थे और बजरंग दल के मुताबिक़ यह पश्चिमी संस्कृति थी.

एक सच यह भी है कि नौजवानों ने बीजेपी और नरेंद्र मोदी को वोट किया था. क्या यह विरोधाभास नहीं है?

नई संस्कृति

विश्वनाथन कहते हैं, "यह विरोधाभास नहीं बल्कि दो अलग-अलग मुद्दे हैं. वे लोग मोदी और बाक़ी लोगों से कह रहे हैं कि आप हमें हर बात के लिए हुक्म नहीं दे सकते. आप जो कुछ कर रहे हैं, हम उनमें से कुछ बातों का समर्थन करते हैं. एक स्तर पर मोदी प्रेरणा देते हैं और वह जो कुछ भी कहते हैं, लोग उस पर आंख मूंदकर विश्वास कर लेते हैं."

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विश्वनाथन की तरह गीता रामाशेषन भी सहमत हैं कि यह विरोध प्रदर्शन भावनाओं का विस्फोट जैसा ही है.

गीता कहती हैं, "फिलहाल यह कहना मुश्किल है कि यह आंदोलन राजनीतिक प्रक्रिया में किसी किस्म के बदलाव की बुनियाद रखेगा या नहीं जिससे खाप पंचायतों या हॉनर किलिंग जैसे मुद्दों पर कोई रास्ता निकले. यह अभी एक शहरी मिजाज़ की घटना है."

लेकिन बाबू मैथ्यू राजनीतिक पार्टियों के इतर इसके दूरगामी नतीजों को लेकर सकारात्मक हैं. वह कहते हैं कि यह राजनीतिक चेतना के आकार लेने में मदद करेगा. यह एक नई संस्कृति की शुरुआत है.

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