कैनवास से बाहर आती कला

हेलमेट, इंडियन मॉडर्न आर्ट, आधुनिक भारतीय कला इमेज कॉपीरइट Shivprasad Joshi

समकालीन भारतीय कला अब कैनवास के दायरे से बाहर निकलकर कंप्यूटर और तकनीक की दुनिया में चहलक़दमी कर रही है.

कलाकार अब स्टूडियो के बजाय सड़क पर अपनी कला लेकर आ रहे हैं.

इस वर्ष जयपुर कला महोत्सव में समकालीन भारतीय कला के नए नज़ारे देखने को मिले. इसमें इंस्टालेशन, लाइव आर्ट, वीडियो आर्ट, वीडियो इंस्टालेशन और प्रदर्शन जैसे नए माध्यम शामिल हैं.

युवा कलाकार मुरली चेरुथ ने खुले प्रांगण में दर्शकों के बीच अपनी प्रस्तुति दी. उनके काम में कला और थियेटर का मिला-जुला अनुभव शामिल है.

मुरली कहते हैं, "ऐसे समय में जब इतनी विकटताएं हैं और कला को लेकर समाज में अब भी एक मुकम्मल खुलेपन का अभाव है तो ऐसे में नए ढंग से ही हम ख़ुद को अभिव्यक्त कर सकते हैं. इस अभिव्यक्ति में कला एक परफ़ॉर्मेंस भी बन जाती है."

समय के साथ बदलता रूप

इमेज कॉपीरइट Shivprasad Joshi
Image caption मुरली चेरुथ अपनी कला का खुले प्रांगण में प्रदर्शन करते हैं

मुरली के मुताबिक]

इन प्रयोगों को कला में गिरावट की तरह नहीं देखा जाना चाहिए. बदलती सामाजिक और सांस्कृतिक स्थितियों में कला भी पुराने रूप में नहीं बनी रह सकती.

वरिष्ठ आर्टिस्ट और अपने अनूठे इंस्टालेशन के लिए चर्चित म्युरलिस्ट-पेंटर सुरेंद्र पाल कहते हैं, "कला ने कैनवास को छोड़ा नहीं है, लेकिन वो कैनवास से ही बंधी नहीं रह सकती. उसे नए माध्यमों में उतरना ही होगा, वरना वो दम तोड़ देगी."

संग्रहालयों और ड्राइंग रूम्स में तो कैनवास का ही आकर्षण रहता है. तो क्या ऐसी कला के ख़रीदार होंगे?

सुरेंद्र पाल कहते हैं, ''पहली नज़र में लग सकता है कि नई कला के लिए स्पेस या ग्राहक नहीं होंगे, लेकिन कला का इतिहास बताता है कि जगह बनती रही है और कला को सराहने वालों की संख्या भी बढ़ी है."

पाल बताते हैं कि उनके इंस्टालेशन देश के विभिन्न हिस्सों में लगे हैं और सराहे जाते हैं.

कैनवास की अहमियत

इमेज कॉपीरइट Shivprasad Joshi

गोवा के कलाकार सुबोध केरकर कहते हैं, "कैनवास में कला की अपनी अहमियत है, लेकिन कैनवास के बाहर भी कला रची जा सकती है. साथ ही कला को देखने की दृष्टि में भी विस्तार की ज़रूरत है."

डॉक्टरी का पेशा छोड़कर कला क्षेत्र में आए केरकर कहते हैं, "मैं किसी भी सार्वजनिक स्थान या क़ुदरत के किसी भी कोने में अपना कैनवास ढूंढ लेता हूं."

युवा कलाकार तुषार जोग रेत की बोरियों और पंखे और एक राजनैतिक घटनाक्रम को जोड़कर अपनी कला पेश करते हैं.

बंधन से आज़ाद

इमेज कॉपीरइट Shivprasad Joshi

तुषार की कला को देखकर लगता है कला अब टाइम और स्पेस के बंधन से मुक्त हो गई है.

आज की कला को एक निश्चित परिभाषा या सोच या दायरे में बांधना मुमकिन नहीं रह गया है.

लेकिन एक सवाल बना ही रहता है कि नए माध्यमों की कला की इस उन्मुक्त उड़ान की बाज़ार में कितनी जगह है?

(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए यहां क्लिक करें. आप हमें फ़ेसबुक और ट्विटर पर भी फ़ॉलो कर सकते हैं.)

संबंधित समाचार