झारखंड: सूखे की मार से पलायन को मजबूर

झारखंड में सूखा

पिछले दो सालों से झारखंड का पलामू संभाग सूखे की चपेट में है. पिछले दो सालों से इस इलाक़े में बारिश ठीक से नहीं हुई और इस कारण नदी नाले सूख चुके हैं और ज़मीन के अन्दर पानी का स्तर भी काफ़ी नीचे चला गया है.

नदी नाले सूख चुके हैं और चापाकलों में भी पानी नदारद है.

ग्रामीणों का कहना है कि पिछले विधान सभा के चुनाव के दौरान भी कम ओ बेश यही हालात रहे. पलामू संभाग के गढ़वा में एक ऐसा ही गाँव है फ़राठीया जहाँ पर लोग सूखे की मार से त्रस्त हैं.

गढ़वा के फ़राठीया गाँव वैसे तो आम गाँव जैसा ही है. मगर इस बार सूखे की मार झेलते-झेलते इस इलाक़े के लोग बेहाल हो गए हैं.

चारा भी नहीं

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Image caption मंगलवार को झारखंड में पहले चरण का मतदान होगा.

ग्रामीणों का कहना है कि सूखे की वजह से सब परेशान हैं. क्या इंसान, क्या जानवर.

यहाँ के रहने वाले मोईन का कहना है कि अब जानवरों का चारा भी नहीं है और उन्हें इसे महंगी क़ीमत पर दूसरी जगहों हे ख़रीदना पड़ रहा है.

वो कहते हैं, "पहले तो हम अनाज के साथ-साथ जानवरों का चारा भी अपने ही खेतों में उगा लिया करते थे. मगर इस बार न तो फ़सल है और ना ही जानवरों के लिए चारा."

मोईन के अनुसार, ''हमेशा चुनाव के वक़्त ही नेता ग्रामीणों की सुध लेने पहुँचते हैं. वो वादा तो करते हैं. मगर जीत कर विधान सभा या लोक सभा में जाने के बाद फिर पलट कर नहीं आते.''

ग्रामीण कहते हैं कि पिछले कुछ सालों से वो नदी पर बाँध बनाने की मांग कर रहे हैं. मगर अब तक यह नहीं हो पाया.

एक ग्रामीण का कहना था, "बाँध बन गया तो मुश्किलें आसान हो जाएंगी. हमें बारिश पर निर्भर नहीं रहना पड़ेगा. सिंचाई की व्यवस्था ठीक ठाक हो सकती है. मगर किसी के कानों में जूं तक नहीं रेंगती."

लोगों में आक्रोश

ज़िला मुख्यालय से यह गाँव है तो 20 किलोमीटर की दूरी पर. मगर यहाँ तक आने वाली सड़क को भी सूखे की ही नज़र लग गई है क्योंकि पिछले कई सालों से यह सड़क बन नहीं पाई है.

आए दिन सड़क पर हादसों की वजह से ग्रामीणों में काफ़ी आक्रोश है.

सूखे ने अब इस इलाक़े में लोगों के सामने रोज़गार का भी बड़ा सवाल खड़ा कर दिया है. चूँकि खेत खलिहान सूख चुके हैं इसलिए ग्रामीण इलाक़े के लोगों को दूसरे शहरों और प्रदेशों में मज़दूरी करने को मजबूर होना पढ़ रहा है.

इस बार भी नेता आए और अपने साथ ढेर सारे वादे भी लाए. मगर गढ़वा के फ़रठिया गाँव के लोगों को इतना पता चल गया है कि वादे तो सिर्फ़ बातें ही हैं. और भला बातों का क्या भरोसा.

मगर इन सब के बावजूद ये वोट देने जाएंगे क्योकि उन्हें यक़ीन है कि एक दिन इनकी ज़िन्दगी भी बेहतर होगी. शायद इसी भरोसे पर वो फिर अपना नेता चुनेंगे.

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