'हम किसी के नौकर नहीं, उत्पादक हैं'

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केरल में क़रीब ढाई दशक पहले सरकार की शुरू की एक योजना अब एक ऐसे अभियान में बदल चुकी है जो महिलाओं की आर्थिक, सामाजिक, राजनीतिक भूमिका में बदलाव ला रही है.

सामूहिक कृषि से शुरू कुदुम्बश्री योजना आज लाखों महिलाओं को आत्मनिर्भर बना रही है, उनमें आत्मसम्मान जगा रही है.

पढ़िए ग्रामीण महिलाओं की स्थिति पर बीबीसी हिंदी विशेष में वरिष्ठ पत्रकार पी साईनाथ और अनन्या मुखर्जी की पड़ताल की तीसरी और अंतिम कड़ी.

'समुदाय की ताकत'

ज़रा केरल के कुदुम्बश्री का ख़्याल करिए- 40 लाख महिलाओं का एक नेटवर्क, जिनमें ज़्यादातर गरीबी रेखा से नीचे हैं.

केरल सरकार ने इसे 1998 में इस उद्देश्य के साथ शुरू किया था कि वंचित तबके की महिलाओं की सामूहिक भागीदारी से उनकी ग़रीबी की ढांचागत वजहों का समधान किया जा सकेगा.

केरल की मशहूर 'जन योजना' प्रक्रिया के तहत शुरू इस कार्यक्रम का उद्देश्य सरकार और नागरिकों के बीच बाधाओं को हटाना था.

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Image caption कुदुम्बश्री योजना ने लाखों महिलाओं को आत्मनिर्भर बनाया है.

उम्मीद थी कि इसमें समाज नीचे से योजनाओं को सक्रिय रूप से आकार देगा.

इस तरह कुदुम्बश्री में शुरुआत से ही समुदाय और अफ़सरशाही का अंग साथ मिलकर काम करते थे. इसके प्रशासक मंडल के अध्यक्ष स्थानीय स्वशासन के राज्यमंत्री हुआ करते थे.

हर ज़िले के फ़ील्ड अधिकारी के पास में कुदुम्बश्री का एक कार्यालय हुआ करता था. कार्यालय का मुख्य काम समुदाय के राज्य भर में मौजूद नेटवर्क की गतिविधियों की सहायता करना था, जो अब 40 लाख महिलाओं तक पहुंच चुका है.

वे कई तरह की गतिविधियों में संलग्न हैं जिससे उन्हें आय होती है. लेकिन इसके साथ ही सक्रिय नागरिक भी बन चुकी हैं जो समाज के विभिन्न अन्यायों को चुनौती दे रही हैं.

कुदुम्बश्री का सांगठनिक ढांचा ही है जो इसे अलग बनाता है. यह तीन स्तर पर सामुदायिक एकता के ढांचे पर आधारित है. इनमें से पहला है 'पड़ोस का समूह' (एएचजी), जिसमें 10-20 महिलाएं होती हैं.

एएचजी एक क्षेत्रीय विकास संस्था (एडीएस) का भाग होते हैं. और यह मिलकर पंचायत स्तर पर बनाते हैं एक सामुदायिक विकास संस्था (सीडीएस).

अलगाव से समूह की ओर

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कुदुम्बश्री प्रयोग के कुछ महत्वपूर्ण प्रभाव पड़ रहे हैं.

पहला यह है कि इससे महिलाओं को अपने अलगाव से बाहर आने का बड़ा ज़रिया मिला है. यह अलगाव महिलाओं पर उससे कहीं ज़्यादा प्रभाव डालता है जितना हम समझते हैं.

वीमन्स डेवलेपमेंट नेटवर्क के साथ कोस्टा रिका में, मध्य और दक्षिण अमरीकी महिलाओं पर किए गए एक अध्ययन में हमने पाया कि महिलाओं ने प्रमुख बाधा के रूप में इसकी पहचान की.

नेटवर्क का आदर्श वाक्य है, 'साथ मिलकर हम अकेले से ज़्यादा कर सकते हैं.' और यह संपर्क, सहयोग और एकता की ज़रूरत को आवाज़ देता है.

महिलाएं जो अलगाव झेलती हैं वह कई स्तर पर हो सकता है और इसका भारी आर्थिक प्रभाव पड़ सकता है.

सफल लघु-उद्यम को विकसित करना बेहद मुश्किल काम है. महिलाओं को घर की ज़िम्मेदारियों के साथ ही उत्पादन और मार्केटिंग से जुड़े कई काम ख़ुद ही करने पड़ते हैं.

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Image caption संघ कृषि या सामूहिक खेती ने भूमिहीन मज़दूरों को स्वतंत्र उपार्जक बना दिया है.

लेकिन अलगाव मूलरूप से असर आत्मविश्वास पर डालता है, जबकि अपनी ही तरह की महिलाओं से संपर्क करने की क्षमता महत्वपूर्ण प्रभाव डालती है.

इन संपर्कों से ज़मीनी स्तर ऐसे काम किए जाना भी संभव हो पाता है जो महिलाएं अकेले नहीं कर सकतीं.

कुदुम्बश्री यह काम आस-पड़ोस की महिलाओं को साथ लाकर करती है. इनमें से बहुत सी महिलाओं के लिए यह घर के बाहर पहला और एकमात्र स्थान होता है- जहां वे अपनी जैसी महिलाओं के साथ संवाद करती हैं.

इसी तरह वार्ड और गांव स्तर पर अंतर-संवाद किए जाते हैं. कुदुम्बश्री के उपक्रम, मासिक बाज़ार, खाद्य उत्सव और अन्य कदम महिलाओं को ऐसे बहुत से मौके देते हैं जो उन्हें अन्यथा उपलब्ध न होते.

उनकी वेबसाइट के अनुसार कैफ़े कुदुम्बश्री फ़ूड फ़ेस्टिवल को 3.22 करोड़ रुपये का टर्नओवर मिला, उनके 1434 मासिक बाज़ारों से 4.51 करोड़ रुपये मिले.

मज़दूर नहीं उत्पादक

दूसरे, कुदुम्बश्री पैसा कमाने की संभावनाओं के साथ ही बड़े स्तर पर सामाजिक प्रभावों की भी संभावनाएं खोल रहा है.

संघ कृषि या सामूहिक खेती ऐसी ही एक संभावना है. आज करीब 2,00,000 महिलाएं इस तरह के समूहों में सक्रिय हैं और करीब एक लाख एकड़ भूमि पर खेती कर रही हैं.

यह 2007 में स्थानीय अनाज का उत्पादन बढ़ाने के रूप में शुरू हुआ था. केरल की महिलाओं ने इस विचार को उत्सुकता से ग्रहण किया.

अब राज्य भर में 47,000 से ज़्यादा कृषि समूह हैं जिनमें महिला कृषक हैं. यह समूह परती भूमि को लीज़ पर लेते हैं, उसे तैयार करते हैं फिर उनमें खेती करते हैं.

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वे या तो उत्पाद को बेच देते हैं या फिर उसे अपने इस्तेमाल के लिए रख लेते हैं- यह सदस्यों की ज़रूरत पर निर्भर करता है.

यहां कई प्रेरणादायक उदाहरण हैं. पेराम्ब्रा में पंचायत के साथ मिलकर काम कर रहीं कुदुम्बश्री महिलाओं ने 26 साल से बंजर पड़ी 140 एकड़ ज़मीन को खेती योग्य बना दिया है. अब वे उस पर चावल, सब्ज़ियां और साबूदाना उगाती हैं.

इससे केरल के कृषि क्षेत्र में महिलाओं की भूमिकाओं में साफ़ बदलाव आ रहा है. हज़ारों कुदुम्बश्री महिलाएं अब कम वेतन पाने वाली श्रमिकों से उत्पादक में बदल रही हैं.

स्वतंत्र उत्पादन से वह अपने समय और श्रम पर बेहतर नियंत्रण कर पा रही हैं. इसी तरह फ़सलों के उत्पादन के तरीकों और उनके उत्पादन पर भी.

करीब 1,00,000 महिलाएं अब ऑर्गेनिक फॉर्मिंग कर रही हैं और इससे ज़्यादा इसे करना चाहती हैं. कुदुम्बश्री कृषकों में वैकल्पिक कृषि तकनीकों का इस्तेमाल कर पर्यावरण विनाश से लड़ने के लिए बेहद उत्साह है.

किसी संगठन से जुड़ने के अनुभव के अन्य प्रभाव भी हैं. कुदुम्बश्री महिलाएं राजनीति में भी भागीदारी कर रही हैं. साल 2010 में उनमें से 11,773 ने पंचायत चुनाव में भागीदारी की जिनमें से 5485 जीतीं.

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Image caption कुदुम्बश्री की सबसे बड़ी उपलब्धि यह है कि इसने महिलाओं के जीवन को आसान किया है.

तेलंगाना के वारंगल ज़िले में हाल ही में हुए एक कृषि सम्मेलन में एक के बाद एक वक्ता ने यही बात रखी: कि कृषि कार्यकर्ता की आज की स्थिति बदलनी चाहिए. उन्हें भूमिहीन नहीं रहना चाहिए. उन्हें उत्पादक, मालिक होना चाहिए.

कुदुम्बश्री की महिलाएं इससे आगे निकल गई हैं. उत्पादक के रूप में परिवर्तन पहले ही 'भूमिहीन मज़दूर' की श्रेणी से अलग कर देता है.

लैंगिक समानता

एदामालाकुड़ी में, जहां आदिवासी महिलाएं सौर ऊर्जा के ज़रिए अपने गांवों तक बिजली लाईं, वहां कुदुम्बश्री के तहत 40 सीडीएस हैं. इनमें मौजूद हर महिला मुथावन आदिवासी है.

उनमें से हर एक महिला ख़ुद को उत्पादक के रूप में देखती है और चाहती है कि दूसरे भी उसे इसी रूप में देखें.

दूरदराज़ के एक इलाक़े में उन्होंने हमें बताया, "हम किसी के नौकर नहीं हैं, हम उत्पादक हैं."

कोई कैसे इस ऐतिहासिक बदलाव को भौतिक या शारीरिक रूप से नाप सकता है? यह मानसिकता का ऐसा बदलाव है जो उनकी अपनी दुनिया को बदल देता है, भले ही यह उस स्तर का हो जिस स्तर पर उनके चारों तरफ़ का संसार है.

कुदुम्बश्री की महिलाओं सबसे बड़ी उपलब्धियों को किलोग्राम, एकड़, आय या उत्पाद के संदर्भ में नहीं आंका जा सकता.

कोई भी घरों में बदलते समीकरणों का आंकड़ों में कैसे हिसाब लगाएगा? इदुक्की, वायंड, थ्रिस्सुर जैसे कई ज़िलों में एक के बाद एक कई महिलाओं ने हमें स्वतंत्र उपार्जक होने की अपनी भावना के बारे में बताया.

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अधिकतम एक सहायक होने से एक स्वतंत्र उपार्जक होने के अहसास का महत्व हम कैसे माप सकते हैं?

बढ़ती राजनीतिक चेतना का किसी संख्या में मूल्य कैसे तय किया जा सकता है? या फिर कुछ अच्छा काम करने की संतुष्टि की मात्रा कैसे पता चलेगी? हम नियोक्ताओं, कार्यस्थलों में होने वाले शोषण को लेकर महिलाओं की कमज़ोरी में आई कमी को कैसे मापेंगे? या सिर्फ़ दिहाड़ी कमाने वाले के बजाय एक उत्पादक होने के आज़ादी वाले भाव की गणना कैसे करेंगे?

क्या आप लैंगिक न्याय का कोई मौद्रिक मूल्य तय कर सकते हैं- शायद यह सबसे बड़ा योगदान है जो कुदुम्बश्री देता है.

थिलान्गेरी सामूहिक विकास संस्था की अध्यक्ष सुबैरा (36) कहती हैं, "क्या पुरुष और महिलाएं बराबर हैं? यक़ीनन हैं. यह विवाद का विषय नहीं है लेकिन कई बार व्यवहार का होता है".

सुबैरा को किडनी की गंभीर बीमारी है. वह अपनी मां के साथ रहती हैं जो इस बीमारी से बिस्तर पर पड़ी हुई हैं.

लेकिन सुबैरा की नेतृत्व क्षमता आद्वितीय है. वह अपने गांव को शून्य से 100 फ़ीसदी वित्तीय समावेशन पर ले आई हैं.

'दर्द बना ताकत'

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Image caption कुदुम्बश्री ने महिलाओं को उत्पादक बना दिया है और इससे उन्हें परिवार में सम्मान मिला है.

बहुत सी कुदुम्बश्री महिलाएं ख़ुश हैं कि जबसे वह आर्थिक और सामाजिक रूप से सक्रिय हुई हैं उनके बच्चे उन्हें अब अलग तरह से देखते हैं. इससे छोटी लड़कियों को बहुत से सपने देखने की आज़ादी भी मिलती है.

उदाहरण के लिए 10वीं कक्षा की समीशा अपने गांव की बाल पंचायत की अध्यक्ष हैं. वह कहती हैं, "मैं एक पत्रकार बनना चाहती हूं और अपने समाज की बुराइयों के बार में बोलना चाहती हूं."

हालांकि कुछ महिलाओं के लिए इस आंदोलन में शामिल होना आसान नहीं है. अक्सर उनके परिवार या समुदाय की ओर से गंभीर ऐतराज़ होता है.

लेकिन फिर भी महिलाएं रुकती नहीं हैं, ऐसी चीज़ की ख़ातिर जिसे नापा नहीं जा सकता- कम से कम उस पैमाने से तो नहीं जो हमारे पास हैं.

कुदुम्बश्री की एक सदस्य ने उन समस्याओं, जिनका उन्हें काम जारी करते हुए सामना करना पड़ता है, का ज़िक्र करते हुए बताया, "मैं इस अभियान से इसलिए जुड़ी हुई हैं क्योंकि यह मेरे दर्द को ताक़त में बदल देता है."

क्या हम उस कार्य के महत्व को आंक सकते हैं जो संघ कृषि या कुदुम्बश्री करते हैं? उन्होंने महिलाओं को खाद्य उत्पादन पर नियंत्रण दे दिया है- जो कि खाद्य सुरक्षा की कुंजी है.

हर जगह स्थानीय महिलाएं चिरस्थाई विकास में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं. चाहे यह कॉर्पोरेटीकरण और व्यावसायिक भूमि विकास का विरोध हो या स्थाई कृषि करना हो. संघ कृषि ने उनकी भूमिका को और बढ़ाया ही है.

ऐसे देश में जहां ज़्यादा से ज़्यादा खेती की ज़मीन को नकली उपज उपजाने के लिए इस्तेमाल किया जाता है. कोई बंजर भूमि को धान की खेती के लिए तैयार करने के महत्व को कैसे मानेगा?

कुदुम्बश्री की 'हरित सेना' ने ठीक यही काम किया है.

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क्या कोई संघ कृषि से पुनर्जीवित किए गए खेतों में प्रवासी पक्षियों के लौटने की कोई कीमत या भौतिक मूल्य तय कर सकता है? क्या इसे नापा जा सकता है?

इस बदलाव के सामाजिक, सांस्कृतिक और मनोवैज्ञानिक महत्व का अनुमान कोई कैसे लगा सकता है?

कोई दिमाग में सीखने के लिए आए मोड़ को कैसे मापेगा? न सिर्फ़ उच्च भौतिक उत्पाद बल्कि जिससे महिलाएं अपने लोकतांत्रिक अधिकारों को ज़्यादा समझ रही हैं और उनका इस्तेमाल कर रही हैं?

यह लघु राजनीतिक है एक वृहद प्रभाव के साथ. सदस्यों के अक़्सर बेहद मज़बूत राजनीतिक संबंध होते हैं लेकिन वह समूह की बैठकों में प्रभावी नहीं होते.

सिर्फ़ भूमि सुधार आंदोलन ही ज़्यादा बड़े प्रभाव वाले और ऐतिहासिक रूप से महत्वपूर्ण थे. लेकिन कुदुम्बश्री की महिलाएं एक ऐसा तत्व लेकर आई हैं, जो उनमें नहीं था- लैंगिक न्याय. तो हम इसे कैसे मापेंगे? यह किलो या एकड़ में नहीं बदलता.

और असली चुनौती तो यह है कि हम इस लैंगिक न्याय और सामूहिकता की भावना का उपयोग 'विकास' और 'गरीबी मिटाने' में कैसे करेंगे?

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