मनमोहन का 'ज्ञान' या मोदी का 'हुनर'?

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प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भारत में 'स्किल डेवलपमेंट' से बड़ी आबादी को रोज़गार और अर्थव्यवस्था को विकसित करने की बात कहते हैं.

पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह 'नॉलेज बेस्ड इकॉनमी' या ज्ञान आधारित अर्थव्यवस्था की बात करते थे.

मौजूदा सरकार स्कूली शिक्षा व्यवस्था में परिवर्तन के साथ ही यूजीसी में भी बदलाव की तैयारियाँ कर रही है.

लेकिन मीडिया शिक्षा क्षेत्र में किए जा रहे बड़े बदलावों पर पर्याप्त ध्यान नहीं दे रहा है.

पढ़ें अपूर्वानंद का विश्लेषण

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पिछले 10 सालें में जो मुहावरा बहुत प्रचलित हुआ था, वह था 'नॉलेज बेस्ड इकॉनमी'.

भारत के पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को यह टर्म बेहद प्यारा था. हालाँकि शिक्षाविदों को इससे काफ़ी उलझन होती थी क्योंकि ज्ञान को अर्थव्यवस्था के लिए उपयोगी होने मात्र तक ही यह सीमित कर देता था.

फिर भी प्रचलन में ज्ञान शब्द कहीं तो था!

मई, 2014 के बाद से सरकार की ओर से ज्ञान शब्द का उच्चारण ही नहीं किया गया है.

ज्ञान शब्द के लगभग गायब हो जाने के बाद शिक्षा की पूरी चर्चा में अगर कोई शब्द सबसे अधिक लोकप्रिय हो गया है तो वह है हुनर या स्किल.

कहा जा रहा है कि पूरी दुनिया को ड्राइवर, नर्स और इसी तरह के हुनरमंद लोगों की सख़्त ज़रूरत है और भारत के पास ढेर सारे लोग हैं, सो उन्हें ये हुनर देकर कमाई के लिए विदेश भेज देना चाहिए!

इससे भारत को विदेशी मुद्रा भी मिलेगी!

पढ़ाना बच्चों का खेल!

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बीते शिक्षक दिवस को प्रधानमंत्री ने कहा कि 'हर किसी को कम से कम एक दिन अपने क़रीब के स्कूल में पढ़ाना चाहिए.'

यह संभवतः उन लाखों शिक्षकों की ज़रूरत को देखते हुए कहा गया, जिनकी बहाली के लिए सरकार को धन मुहैया कराना है क्योंकि शिक्षा के बुनियादी अधिकार वाले क़ानून में 40 छात्रों के लिए एक शिक्षक की अनिवार्यता बताई गई है.

दूसरे, यह भी सुविधापूर्वक भुला दिया गया कि बच्चों को पढ़ाना कोई बच्चों का खेल नहीं है.

क्या हर किसी से यह कहा जा सकता है कि वह बगल के हस्पताल में जाकर एक दिन डाक्टरी करे या बगल की नदी पर पुल के निर्माण में काम करे?

इन सब के लिए पेशेवर ट्रेनिंग की दरकार है. वैसे ही शिक्षक बनने के लिए भी. ट्रेंड टीचर्स की बहाली की जगह हर किसी को एक बच्चे को पढ़ाने को कहना लोगों की आँख में धूल झोंकना है.

पिछली सरकार के वक़्त, लस्टम-पस्टम ही सही, माध्यमिक और उच्च शिक्षा को लेकर एक बहस की प्रकिया शुरू हुई थी. वह बिलकुल बंद हो गई है.

आरएसएस की दिलचस्पी

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स्कूली शिक्षा में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की दिलचस्पी पाठ्यक्रम बदलने की रही है. लेकिन राज्य सभा के पहले सत्र में मानव संसाधन मंत्री ने कहा कि राष्ट्रीय करिक्युलम 2005 को बदलने का कोई इरादा नहीं है.

ऐसा करने के कुछ वक़्त बाद ही एनसीईआरटी (राष्ट्रीय शैक्षिक अनुसंधान और प्रशिक्षण परिषद) की निदेशक पर दबाव पड़ने लगा कि उन्होंने अपनी ओर से करिक्युलम समीक्षा की जो नियमित प्रक्रिया चला रखी है, उसे बंद कर दें.

जब उन्होंने संस्थान की अकादमिक स्वायत्तता का हवाला दिया और कहा कि यह काम करना उनका अधिकार है तो उन्हें इस्तीफ़ा देने को मजबूर कर दिया गया. मीडिया ने इस इस्तीफ़े की सुध ही नहीं ली.

क्या दीनानाथ बत्रा के अनुसार पाठ्यक्रम बदला जाएगा? इस विचार मात्र से वे भी काँप रहे हैं जिन्होंने ‘घिनौने समाजवाद’ को दफ़न करने के लिए इस सरकार के आने की प्रार्थना की थी.

वैसे भी इस वर्ग के बच्चे भारतीय स्कूली व्यवस्था से प्रायः पलायन कर चुके हैं. इसलिए सरकारी स्कूलों के आम बच्चों के साथ क्या-क्या होता है, इस पर वे अपनी नींद कितनी ख़राब करें! इन बच्चों को तो नल या बिजली की फ़िटिंग या ड्राइविंग सिखा देने भर की ज़रूरत है!

इसी संदर्भ में अपूर्वानंद की कलम से ही पढ़िए 'शिक्षा के भगवाकरण' पर दूसरा लेख.

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