इस तरह टुकड़े टुकड़े हो रहा विक्रांत

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विमान वाहक पोत विक्रांत ने 1971 में भारत-पाकिस्तान युद्ध के दौरान पूर्वी पाकिस्तान की नौसैनिक घेराबंदी में अहम भूमिका निभाई थी.

अब विक्रांत को टुकड़ों में तब्दील किया जा रहा है.

भारत के पहले विमान वाहक पोत आईएनएस विक्रांत को पुर्जा पुर्जा करने के खिलाफ़ दाखिल जनहित याचिका को सुप्रीम कोर्ट ने नामंज़ूर कर दिया था.

उसके तीन महीने बाद देश के इस ऐतिहासिक नौसैनिक जहाज़ को तोड़ने का काम शुरू हो गया.

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इसे तोड़ने के काम का अनुबंध 60 करोड़ रुपए में शिप ब्रेकिंग कंपनी आईबी कमर्शियल्स को दिया गया.

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आईबी कमर्शियल्स के निदेशक अब्दुल ज़ाका ने कहा, "विक्रांत को तोड़ने में छह से सात महीने का समय लगेगा. इस काम में 150 से 200 लोगों को लगाया जाएगा."

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ज़ाका ने बताया कि सुप्रीम कोर्ट ने अगस्त में इस पोत को सामुद्रिक संग्रहालय में बदलने की याचिका ठुकरा दी थी.

कंपनी ने दक्षिण मुंबई में दारूकाना में जहाज विखंडन यार्ड में इस पोत को तोड़ने के लिए विभिन्न सरकारी अधिकारियों से इजाज़त ले ली है.

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सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसले से पहले महाराष्ट्र सरकार ने 1961 में नौसेना में शामिल किए गए और जनवरी 1997 में सेवा से हटाए गए विक्रांत की देखभाल करने में असमर्थता जताई थी.

महाराष्ट्र सरकार ने तब कहा था कि जहाज़ को संग्रहालय के तौर पर संरक्षित करना आर्थिक रूप से सही नहीं होगा.

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आईएनएस विक्रांत को कबाड़ में बदले जाने को देश का 'दुर्भाग्य' बताते हुए शिवसेना के प्रवक्ता ने सोमवार को कहा, "पाकिस्तान के ख़िलाफ़ 1971 में लड़े गए युद्ध को जीतने में भारत की मदद करने वाला सेवामुक्त विक्रांत अपने अस्तित्व की लड़ाई में अपने ही देश के लोगों से हार गया."

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शिवसेना ने अपने 'सामना' के संपादकीय में लिखा, "देश का हर व्यक्ति इस युद्ध पोत के कबाड़ में बदले जाने के ख़िलाफ़ था और चाहता था कि इसे संग्रहालय बना दिया जाए. इसे कबाड़ में बदले जाने से बचाने के लिए हम 100-150 करोड रुपये नहीं जुटा पाए. इसे देश का दुर्भाग्य ही कहा जा सकता है."

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रक्षा सूत्रों ने बताया कि विक्रांत से निकली गई 60 प्रतिशत कलाकृतियों को मुंबई की मैरिटाइम हिस्ट्री सोसायटी में भेजा जाएगा और बाकी की कलाकृतियाों का कुछ हिस्सा गोवा के नेवल एविएशन म्यूज़ियम में रखा जाएगा.

बाकी की कलाकृतियां विभिन्न संग्रहालयों और संबद्ध केंद्रों को दी जाएंगी.

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