डूबते विपक्ष के लिए साध्वी बनी तिनका

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भारतीय जनता पार्टी सरकार के छह महीने बीत जाने के बाद भी सहमे-सहमे विपक्ष को केंद्रीय मंत्री साध्वी निरंजन ज्योति के बयान से तिनके जैसा सहारा मिला है.

सोलहवीं लोकसभा के शीतकालीन सत्र में पहली बार एकताबद्ध विपक्षी राजनीति गरमाती नज़र आ रही है. ऐसे में साध्वी का बयान पार्टी के लिए बेहद नाज़ुक मोड़ पर सेल्फ़ गोल जैसा घातक साबित हुआ है.

पिछले छह महीने से नरेंद्र मोदी अपने समर्थकों को आश्वस्त और विरोधियों को परास्त करने में सफल रहे हैं. उनके बड़े से बड़े आलोचक भी मान रहे थे कि येन-केन प्रकारेण नरेंद्र मोदी हवा को अपने पक्ष में बहाने में कामयाब हैं.

हनीमून की समाप्ति

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मोदी के आलोचक मानते हैं कि यह हनीमून है जो लम्बा खिंच गया है. साध्वी प्रकरण की वजह से यह हनीमून ख़त्म नहीं हो जाएगा और न ही मोदी की हवा निकल जाएगी.

अलबत्ता इससे भाजपा के वैचारिक अंतर्विरोध खुलेंगे. इसके अलावा संसद में हंगामों का श्रीगणेश हुआ. दोनों सदनों में तीन दिन से गहमागहमी है.

गुरुवार को राज्यसभा को पूरे दिन के लिए स्थगित करना पड़ा. यानी विपक्ष को एक होने और वार करने का मौका मिला है.

सवाल पूछा जा रहा था कि साध्वी ने जो कहा सो कहा, दुनियाभर से तार जोड़ने वाले मीडिया-मुखी प्रधानमंत्री खामोश क्यों हैं. शायद इसी दबाव में प्रधानमंत्री ने राज्यसभा में खुद जाकर खेद व्यक्त किया.

प्रधानमंत्री ने कहा, ‘साध्वी अनुभव में नई हैं और उन्होंने इस मामले में माफ़ी मांग ली है. मैंने भाजपा संसदीय दल में इस मुद्दे को उठाते हुए सांसदों को ऐसे बयानों से बचने की हिदायत दी है.’

लगभग ऐसी ही हिदायत उन्होंने पिछले अप्रैल महीने में अपने मित्रों को दी थी, जब चुनाव प्रचार चल ही रहा था.

'यू टर्न सरकार'

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मोदी सरकार बेशक लोकसभा में आराम से है, पर राज्यसभा में उनका सिरदर्द बना रहेगा. कांग्रेस ने 'छह महीने पार, यू टर्न सरकार' के नाम से सरकार पर पहली बार गम्भीर हमला किया है.

दूसरी ओर जनता दल में फिर से जान डालने का यज्ञ चल रहा है.

संसदीय काम के लिहाज से मॉनसून सत्र अच्छा गुजरा. शीतकालीन सत्र का पहला हफ़्ता भी फलदायी रहा. लोकसभा ने अपने निर्धारित समय के 86 प्रतिशत और राज्यसभा ने 81 प्रतिशत समय का सदुपयोग किया.

शोर-शराबे और व्यवधान के मौके नहीं आए. पर इस हफ्ते कहानी में मोड़ आ गया.

सरकार के सामने फिलहाल बीमा विधेयक को पास कराने की राजनीतिक चुनौती है. दूसरी बड़ी चुनौती भूमि अधिग्रहण कानून में संशोधन की है. सरकार पर विपक्षी हमलों के कई मौके अभी आएंगे.

योजना आयोग को समाप्त करने, गुजरात दंगों पर नानावती आयोग की रिपोर्ट, सीमा पर चीनी सेना की घुसपैठ, नौसेना के जहाजों से जुड़ी दुर्घटनाएं वगैरह. पर साध्वी प्रकरण के लिए वह तैयार नहीं थी.

‘अपनों’ से खतरा

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नरेंद्र मोदी ने सत्ता हासिल करने के प्रयास में शत्रुओं पर जो करारे वार किए थे, उनका जवाब देर-सबेर मिलना ही है. ऐसे में साध्वी जैसे नेताओं के बयान राह के काँटे बनेंगे.

मोदी के सामने पार्टी के भीतर दो चुनौतियाँ हैं. पहली है उनके मौन-विरोधी, जो पार्टी के भीतर हैं. संघ परिवार के साथ संगति बैठाना दूसरी चुनौती है.

साध्वी का बयान ग़लत मौके पर आया है. संसद में उसकी अनुगूँज नई-नवेली सरकार के लिए ख़तरनाक है. 'हेट स्पीच' को लेकर संघ परिवार का ट्रैक रिकॉर्ड ख़राब रहा है.

माना जाता है कि यह पार्टी की सोची समझी योजना है. एक ओर जहरीले बयान देते हैं और दूसरी तरफ माफ़ी माँग लेते हैं.

नरेंद्र मोदी ने अप्रैल में ट्विटर संदेश में कहा था, "जो लोग भाजपा के शुभचिंतक होने का दावा कर रहे हैं, उनके बेमतलब बयानों से कैंपेन विकास और गवर्नेंस के मुद्दों से भटक रहा है. मैं ऐसे किसी भी गैर-जिम्मेदाराना बयान को खारिज करता हूं."

कब तक पल्ला झाड़ेंगे?

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Image caption प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा है कि नेताओं को बोलते समय सावधानी बरतनी चाहिए.

पिछले महीने हुए मंत्रिमंडल विस्तार में साध्वी निरंजन ज्योति के साथ गिरिराज सिंह भी शामिल हुए थे, जिनके बयान से मोदी ने पल्ला झाड़ा था.

गुरुवार को राज्यसभा में मोदी ने कहा, ‘‘मैंने बहुत कठोरता से इस प्रकार की भाषा को नामंजूर किया है. चुनाव की गर्मा-गर्मी में भी हमें ऐसी भाषा से बचने की कोशिश करनी चाहिए.’’

सवाल है कि दिल्ली में चुनाव होने वाले हैं. क्या साध्वी का बयान उसके पहले योजनाबद्ध तरीके से कुछ करने की योजना है?

हाल में उत्तर प्रदेश के उप चुनावों में ‘लव जेहाद’ और योगी आदित्‍यनाथ की रणनीति के फेल हो जाने के बाद भी क्या पार्टी इस प्रयोग को दोहराना चाहती है?

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सवाल यह भी है कि इसके पीछे मोदी की सहमति है या मोदी से इतर कोई और ताक़त काम कर रही है?

छह दिसम्बर को बाबरी मस्जिद विध्वंस की 22वीं वर्षगांठ है. इस मौके पर इस विषय पर उठा कोई भी विवाद से देश का माहौल ख़राब होगा. राम मंदिर के मुद्दे से भाजपा किनाराकशी कर चुकी है. मोदी सरकार विकास के मुद्दे को लेकर बनी है.

भाजपा को ‘काडर बेस’ के बजाय ‘मास बेस’ पार्टी बनाने की कोशिश की जा रही है. भारी संख्या में नए सदस्यों को शामिल किया जा रहा है. शायद साध्वी प्रकरण इस क्रिया की प्रतिक्रिया है.

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