हिंसा मुक्त कश्मीर की 'कल्पना बेमानी'

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भारत प्रशासित जम्मू कश्मीर में हाल के दिनों में हिंसा में हुई वृद्धि सुरक्षा तंत्र की नाकामी है या फिर ये समस्या सीमा पर मौजूदा हालात से जुड़ी है?

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी इसे भारी मतदान से उपजी चरमपंथियों की हताशा का नतीजा मान रहे हैं.

श्रीनगर, उरी और अन्य स्थानों पर हुए चरमपंथी हमलों में सुरक्षा कर्मियों सहित 20 से अधिक लोग मारे गए हैं.

सुरक्षा मामलों के जानकार अजय साहनी की राय

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जब भी ऐसी कोई घटना होती है तो साफ़ है कि किसी न किसी स्तर पर सुरक्षा तंत्र की नाकामी तो है ही.

लेकिन जब आपका पड़ोसी देश पूरी तरह चरमपंथ को समर्थन दे रहा हो, वहां से घुसपैठ करवा रहा हो, तो ऐसे में यह उम्मीद रखना ग़लत है कि चरमपंथ बिल्कुल नहीं होगा.

ऐसे हमले नए नहीं हैं, हाल में इससे पहले भी हमले हुए हैं. लेकिन मुद्दा यह है कि हमला कितना सफल हो पाता है.

इनमें से एक हमले में काफ़ी नुक़सान हुआ है और कई सैनिक मारे गए हैं, इसलिए लग रहा है कि बहुत भारी हमला है. लेकिन यह मौके की बात होती है कभी-कभी नुक़सान ज़्यादा हो जाता है.

हताशा

दरअसल पाकिस्तानी सुरक्षा एजेंसियों में जो कश्मीरी चरमपंथियों के समर्थक थे, उन्हें पहले कहीं न कहीं विश्वास था कि जम्मू कश्मीर में चुनाव ज़्यादा सफल नहीं होते हैं.

लेकिन जब पहले दो चरणों में मतदान 71 से 72 प्रतिशत के आसपास पहुंच गया तो उन्हें बहुत ही साफ़ नज़र आने लगा कि अगर इस वक़्त कुछ नहीं किया गया तो पूरे अलगाववादी आंदोलन की विश्वसनीयता ख़त्म हो जाएगी.

इसलिए ये हमले बहुत ही हताशा में उठाया गया क़दम है. वो चाहते हैं कि बाक़ी बचे चुनाव के चरणों में कम से कम मतदान हो, ताकि वो दुनिया से कह सकें कि देखिए लोगों ने वोट कम डाला है, क्योंकि एक साल बाद लोगों को वोटिंग के हालात नहीं, बल्कि वोटिंग का प्रतिशत याद रहेगा.

अफ़स्पा

जहां तक सशस्त्र बल विशेषाधिकार क़ानून (अफ़स्पा) के मुद्दे की बात है तो यह एक राजनीतिक छल है. इस पर तार्किक बहस सुप्रीम कोर्ट में हो चुकी है.

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कोर्ट ने साफ़ कर दिया है कि इसके अमुक प्रावधान हैं और आप चाहें तो इसका संभावित दुरुपयोग रोकने के लिए कुछ प्रावधान शामिल कर सकते हैं, जिसके बाद अफ़्सपा पर कोई ऐतराज़ नहीं हो सकता.

इसे लेकर जितना भी शोर मच रहा है वह बस राजनीतिक छल है. तो इसके नाम पर लोगों को बरगलाते हैं क्योंकि उन्हें इसकी समझ नहीं होती, लोगों ने कानून पढ़ा भी नहीं होता.

इसलिए यह प्रचार हो गया है कि अफ़्सपा बहुत बुरा है. जितनी भी बुरे काम कश्मीर में हो रहे हैं उसके लिए अफ़्सपा ज़िम्मेदार है.

(बीबीसी संवाददाता विनीत खरे से बातचीत पर आधारित)

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