मोदी 'डांटते कम हैं, इनाम ज़्यादा देते हैं'

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मोदी सरकार में मंत्री साध्वी निरंजन ज्योति ने दिल्ली में एक जनसभा में विपक्षी दलों को अपशब्द कहे थे. लेकिन वह इस बात को मानने को राज़ी नहीं थीं कि उन्होंने कुछ ग़लत कहा है.

काफ़ी दबाव के बाद संसद में माफ़ी मांग कर जब वह बाहर आईं तो मीडिया की तमाम कोशिशों के बावजूद उन्होंने यह नहीं बताया कि संसद में उन्होंने क्या कहा था.

असल में भारतीय जनता पार्टी जैसी हिंदुवादी पार्टी में अपशब्दों का इस्तेमाल करने वाली वह अकेली साध्वी नहीं हैं.

ख़बर आई कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने उन्हें डांट लगाई है लेकिन यही मोदी हैं जिन्होंने गिरिराज सिंह को भी डांट लगाई थी और फिर अपने मंत्रिमंडल में शामिल कर लिया.

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निरंजन ज्योति उन बहुत सी अनपढ़ या मामूली पढ़ी हुई साध्वियों में से एक हैं जो भाजपा में शामिल हैं.

ऐसी ही दूसरी हैं उमा भारती, जो लोकसभा में दी गई जानकारी के अनुसार छठी कक्षा तक पढ़ी हैं.

निरंजन ज्योति शुरू में यह जानकर चकित थीं कि लोगों को उनके शब्द ग़लत लगे, लेकिन जब मीडिया हमलावर हो गया तो उन्होंने कई बाद खेद प्रकट किया.

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Image caption अरुण जेटली उग्र हिंदुत्व को लेकर सहज नहीं हैं लेकिन उनकी राजनीतिक ताक़त नहीं है.

जब मीडिया ने इस मुद्दे को उठा लिया तो विपक्षी दलों ने भी इसे संसद में उठाया.

अरुण जेटली भाजपा के उन नेताओं में से हैं जो हिंदुत्व को लेकर सहज नहीं हैं. उन्होंने इस बयान से पल्ला झाड़ लिया.

लेकिन जेटली की राजनीतिक जड़ें मज़बूत नहीं है और वह अपनी सीट भी नहीं जीत सकते.

मोदी की चुप्पी

मोदी हिंदू जनाधार का मिजाज़ समझते हैं और यही वजह है कि उन्होंने तुरंत प्रतिक्रिया नहीं दी.

हालांकि, उन्होंने अपनी पसंदीदा एजेंसी (एएनआई) के ज़रिए एक रिपोर्ट लीक करवा दी कि उन्होंने एक बैठक कर अपने मंत्रियों को चेतावनी दे दी है कि उन्हें बोलने से पहले सोचना चाहिए. यह एक तरह से परोक्ष निंदा ही थी.

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'द हिंदू' ने एक सम्पादकीय में लिखा, "अगर प्रधानमंत्री को सचमुच साध्वी की भाषा बुरी लगी थी तो सबको डपटने की शैली अपनाने के बजाय, उन्हें ऐसा साफ़-साफ़ कहना चाहिए था. अगर वह अपने मंत्रियों और सांसदों को सीधा संदेश देना चाहते थे कि कोई बकवास नहीं चलेगी, तो उन्हें निरंजन ज्योति को मंत्रिमंडल से हटा देना चाहिए था."

इसमें आगे कहा गया है, "केवल आलोचना से कुछ विशेष हासिल नहीं होता. मंत्री का माफ़ीनामा इस्तीफ़े की मांग कर रहे विपक्षी दलों के हमले की धार कुंद करने की कोशिश भर लगती है."

विपक्षी दलों ने मोदी की ग़लती ताड़ ली और इसका फ़ायदा उठाया. इसके बाद मोदी संसद में आए और कहा कि ऐसी बात किसी को भी नहीं कहनी चाहिए.

तोगड़िया और गिरिराज

सवाल यह है कि हिंदुत्व के नाम पर बोलने वाले ऐसी बातें बोलते क्यों हैं और उनकी व्यापक निंदा क्यों नहीं होती?

चुनाव प्रचार के दौरान भाजपा के एक अनजाने उम्मीदवार, गिरिराज सिंह, यह कहकर चर्चा में आ गए कि "जो लोग नरेंद्र मोदी को रोकना चाहते हैं, वे पाकिस्तान की ओर देख रहे हैं. आने वाले दिनों में ऐसे लोगों के लिए जगह हिंदुस्तान में नहीं, झारखंड में नहीं, पाकिस्तान में होगी."

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क़रीब उसी समय विश्व हिंदू परिषद के नेता प्रवीण तोगड़िया का गुजरात की एक सभा में दिए गए भाषण का टेप लीक हुआ था.

वह हिंदू इलाक़े के लोगों को सलाह दे रहे थे. वहां एक दाउदी बोहरा ने जायदाद खरीदी थी. दाउदी बोहरा भारत के सबसे शांतिप्रिय और संपन्न समाजों में से एक है.

बोहरा अक्सर सुन्नी मुसलमानों में घुलमिल नहीं पाते, लेकिन वे कहीं ज़्यादा संपन्न होते हैं और हिंदू बहुल समृद्ध शहरी इलाक़ों में रहना पसंद करते हैं.

झिड़की

जिस इलाक़े के लोगों ने तोगड़िया को सलाह के लिए बुलाया था, वे नहीं चाहते थे कि बोहरा परिवार वहाँ रहे. तोगड़िया ने उन्हें सलाह दी कि वे दंगों का माहौल बनाएं और उस परिवार को लेकर जो चाहे करें, ताकि वह उस जायदाद को छोड़कर चले जाएं, जिसे उन्होंने क़ानूनन ख़रीदा है.

इसे वीडियो में रिकॉर्ड कर लिया गया और इसमें कोई संदेह नहीं कि तोगड़िया क्या योजना बना रहे थे.

जैसा कि मैंने कहा, यह दोनों चीजें क़रीब एक ही समय हुईं. मीडिया को इसकी भनक लग गई थी और मोदी ने इसका जवाब एक सामान्य ट्वीट करके दे दिया.

मोदी ने लिखा, "भाजपा के हितैषी होने का दावा करने वालों के छोटे बयान, चुनाव प्रचार को विकास और सुशासन के मुद्दे से भटका रहे हैं."

पुरस्कार

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बाद में मोदी ने गिरिराज को मंत्री बना दिया, जिससे यह साफ़ हो गया कि उन्हें किस पर यक़ीन है.

आरएसएस ने भी इसी तरह तोगड़िया के बारे में झूठ बोला, यह कहते हुए कि यह उन लोगों को ग़लतफ़हमी हो सकती है, जो गुजराती नहीं बोलते.

तोगड़िया अब भी विहिप के अंतरराष्ट्रीय अध्यक्ष बने हुए हैं.

इसकी वजह यह है कि बुदबुदाते हुए की गई आधी-अधूरी निंदा के बावजूद मोदी और आरएसएस ऐसे बयानों की इजाज़त देते हैं और फिर अनिवार्य रूप से उनको पुरस्कृत करते हैं.

और यक़ीनन इसकी एक वजह यह भी है कि भारत का एक बड़ा हिस्सा इनका साथ देता है, मीडिया के विरोध के बावजूद.

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