भारत को 'पाक बनाने की कोशिश' या फिर...

इमेज कॉपीरइट AP

विदेश मंत्री सुषमा स्वराज के इस बयान से बड़ा विवाद छिड़ा है कि सरकार का गीता को राष्ट्रीय ग्रंथ घोषित करना औपचारिकता मात्र है.

इस पर बहस संसद से लेकर सामाजिक और सांस्कृतिक गलियारों में भी हो रही है.

कई लोग गीता को भारतीय जीवन शैली का अटूट अंग बता कर सरकार के रुख़ का समर्थन कर रहे हैं, वहीं आलोचक इसे देश में कट्टरपंथ को हवा देने की कोशिश मान रहे हैं.

ऐसे ही दो अलग अलग नज़रिए पढ़ें.

जस्टिस क़ुद्दुसी: राष्ट्रीय ग्रंथ बनाने में दिक्कत नहीं

(जस्टिस इशरत मसरूर क़ुद्दूसी, ओडिसा हाई कोर्ट के पूर्व मुख्य न्यायधीश)

इमेज कॉपीरइट THINKSTOCK

अगर भगवत गीता को राष्ट्रीय ग्रंथ घोषित किया जाता है तो हमें इसमें कोई दिक़्क़त नहीं है.

गीता भरतीय संस्कृति से अधिक जुड़ी है, इसे हिन्दू धर्म से नहीं जोड़ना चाहिए. जिस तरह रामायण का संबंध हिन्दू धर्म से है, उसी तरह ये भारत की संस्कृति से जुड़ी है.

इस किताब में आध्यात्मिक बातें हैं, धार्मिक नहीं.

गीता राष्ट्रीय ग्रंथ, क्यों और कैसे: स्वामी

मेरे विचार में हर चीज़ को धार्मिक दृष्टि से नहीं देखना चाहिए. गीता को राष्ट्रीय ग्रंथ बनाने की मांग को मानव कल्याण की नज़र से देखना चाहिए.

क़ुरान हो या और कोई धार्मिक किताब, सभी धार्मिक पुस्तकों में कोई नसीहत मिलती है तो उसे सबको अपनाना चाहिए. इस मांग के पीछे नज़रिया ये होगा कि इसकी इज़्ज़त हो, इसका सम्मान हो.

इमेज कॉपीरइट Reuters

इन ग्रंथों का अपमान करने पर अभी किसी सज़ा का प्रावधान नहीं है. इसे राष्ट्रीय ग्रंथ बनाने की मांग के पीछे ये बात होगी कि लोगों को बाध्य किया जाए कि वो इसकी बेइज़्ज़ती न करें.

सबका सम्मान करने की बात हर धर्म में है. अल्लाह ने फ़रमाया है कि एक लाख 24 हज़ार पैग़म्बर भेजे गए हैं जो हर धर्म में भेजे हैं. इसीलिए पता नहीं किस धर्म में पैग़म्बर आए हैं, इसलिए सब की इज़्ज़त करनी चाहिए.

गीता को राष्ट्रीय ग्रंथ बनाना एक मिसाल हो जाएगी. इस में कोई समस्या नहीं..

लेखक कंवल भारती: भारत को पाकिस्तान बनाएंगे?

(कंवल भारती, लेखक और दलित मुद्दों के विचारक)

नरेंद्र मोदी के प्रधानमंत्री बनते ही संघ परिवार के लिए मानो भारत हिन्दू देश बन गया है और भारत में पेशवा राज लौट आया है.

इमेज कॉपीरइट Sanjiv Chandan
Image caption पिछले दिनों दिल्ली में एक हिंदू कांफ्रेस हुई

शायद इसीलिए गीता को राष्ट्रीय ग्रंथ घोषित करने की मांग कर संघ परिवार और भाजपा के नेता भारत को पाकिस्तान बनाना चाहते हैं.

जिस तरह पाकिस्तान में कट्टरपंथियों के दबाव में ईशनिन्दा क़ानून बनाया गया है और उसके तहत अल्लाह और क़ुरान की निन्दा करने वालों को फांसी तक की सजा का प्राविधान है, ठीक वही हालत भारत में भी पैदा हो सकते हैं.

यानी गीता को राष्ट्रीय ग्रंथ घोषित होने का मतलब है, जो भी गीता की निन्दा करेगा, वह राष्ट्रद्रोह करेगा और जेल जाएगा.

इस साज़िश के आसान शिकार सबसे ज़्यादा दलित और आदिवासी होंगे. क्योंकि ये दोनों समुदाय गीता के समर्थक नहीं हैं.

इसके तहत अन्य अल्पसंख्यक, जैसे मुस्लिम, ईसाई और सिख समुदाय भी हिन्दू कट्टरपंथियों के निशाने आ सकते हैं.

इमेज कॉपीरइट PTI

यह भी कहा जा रहा है कि भाजपा के नेताओं का गीता-शिगूफ़ा यादव समाज को भाजपा के पक्ष में ध्रुवीकृत करने की सुनियोजित राजनीति है क्योंकि यादव अपने को कृष्ण का वंशज मानता है.

लेकिन कुछ मुट्ठीभर कट्टरपंथियों को छोड़ दें, तो आज समाज की मुख्य समस्या शिक्षा, रोजगार और मूलभूत सुविधाओं की है, मन्दिर और गीता-रामायण की नहीं है.

इसलिए अगर भाजपा गीता के सहारे यादव समाज को लक्ष्य बना रही है, तो उसे सफलता मिलने वाली नहीं है.

(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए यहां क्लिक करें. आप हमें फ़ेसबुक और ट्विटर पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)

संबंधित समाचार