ये है कबड्डी की पाठशाला

कबड्डी, निज़ामपुर, गाँव, हरियाणा

इस साल के इंचियॉन एशियाई खेल समेत अब तक हुए सातों एशियाई खेलों में भारत ने कबड्डी का स्वर्ण पदक जीता है. दुनियाभर में भारतीय कबड्डी की धाक जमाने वाले सबसे ज़्यादा खिलाड़ी दिल्ली-हरियाणा सीमा पर बसे एक छोटे से गांव से हैं.

इस गांव का नाम है निज़ामपुर जहां पीढ़ियों से कबड्डी खेली जा रही है.

इंचियॉन एशियाई खेलों में स्वर्ण जीतने वाली टीम के सदस्य मंजीत चिल्लर भी इसी गांव में रहते हैं.

आख़िर इस गांव की मिट्टी में ऐसा क्या है जो यहां एक के बाद एक चैंपियन पैदा हो रहे हैं.

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कुछ कुश्ती और कुछ रग्बी का मिला-जुला रूप, ये है कबड्डी. विरोधी को छूने, उसे पकड़कर अपने पाले में गिराने या फिर विरोधी की पकड़ से छूटकर अपने पाले में लौट पाने की ताक़त. कुछ दिमाग़ी कौशल और बहुत सारी ताक़त.

दिल्ली और हरियाणा के बहादुरगढ़ की सरहद पर मौजूद गांव निज़ामपुर में इसी के गुर सिखाए जाते हैं.

कबड्डी की नर्सरी है यहां का जंगलीराम स्टेडियम, जहां ये नौजवान हर शाम पहुंचते हैं. उन्हें अंतरराष्ट्रीय खिलाड़ियों से निपटने के गुर सिखाते हैं राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय कबड्डी खिलाड़ी.

सुबह-शाम, गली-मोहल्ले यहां अगर किसी बात की चर्चा होती है, तो वो है कबड्डी. जिसे शहर में अब तक मुहावरों में याद किया जाता था.

आईपीएल के बाद पीकेएल

प्रो कबड्डी लीग (पीकेएल) ने कबड्डी को अंतरराष्ट्रीय पहचान दी. इसे देखने वालों की तादाद क्रिकेट के मशहूर आईपीएल टूर्नामेंट के बाद दूसरे नंबर पर थी.

अकेले निज़ामपुर में दो एशियाड स्वर्ण पदक विजेता हैं और कम से कम सात खिलाड़ी पीकेएल में खेल रहे हैं.

इनके अलावा यहाँ तीन जूनियर और तीन सीनियर एशियाई चैंपियन हैं. पूरे गांव में तक़रीबन सौ युवा और बच्चे कबड्डी की प्रैक्टिस के लिए इस मैदान पर आते हैं.

पीकेएल खिलाड़ी मोहित चिल्लर कहते हैं, ''कबड्डी अब हमारे गांव में धर्म बन गई है. 50 फीसदी बच्चे कबड्डी में अपना भविष्य देखते हैं. हमारे गांव से राष्ट्रीय स्तर के कई खिलाड़ी निकल चुके हैं.''

छठी क्लास से कबड्डी खेल रहे मोहित के पिता और भाई भी कबड्डी खेलते हैं. मोहित की तमन्ना है भारतीय टीम में चयन.

निज़ामपुर के रहने वाले और अर्जुन पुरस्कार विजेता राकेश कुमार मानते हैं कि जैसे आईपीएल ने क्रिकेट को नई पहचान दी, उसी तरह पीकेएल ने कबड्डी की किस्मत और तस्वीर दोनों बदल दी है.

बाज़ार में कबड्डी

उनके मुताबिक़ इस साल शुरू हुई कबड्डी लीग ने कबड्डी को बाज़ार में खड़ा कर दिया है.

एशियाई खेलों में स्वर्ण पदक विजेता राकेश कुमार का कहना था, ''अब तक हमारी कबड्डी छिपी हुई थी. हम एशियन गेम्स में जाते थे. दो महीने, एक महीने तक पता चलता था कि हमें गोल्ड मिला है. अब वह प्रतिभा छिपी नहीं है. इस लीग के ज़रिए दुनिया को पता चल गया है कि कबड्डी भी कोई खेल है और जुझारू खेल है."

जब आप जंगलीराम स्टेडियम में पहुंचते हैं तो आपको चारों तरफ़ 10 साल से 30-35 साल तक के युवा केपीएल की किसी न किसी टीम की टीशर्ट में दिखाई देते हैं.

गांव के प्रधान धरम सिंह बताते हैं कि आज जो दर्जा कबड्डी को हासिल है, वो गांव में कभी कुश्ती को हासिल था.

धरम सिंह ने बताया, ''हमारे जन्म से पहले से हम यह शौक़ देख रहे हैं. बहुत अच्छे-अच्छे खिलाड़ी हुए हैं यहां और सभी को रोज़गार भी मिलता आया है. सरकारी नौकरी भी मिलती हैं. अब बच्चे इसे ही अपनी पढ़ाई मान रहे हैं.''

सहूलियतें नहीं

हालांकि निज़ामपुर और कबड्डी अब एक दूसरे के पर्याय बन चुके हैं पर कई दिक़्क़तें भी हैं.

स्टेडियम का जिम, मैदान में बना प्रैक्टिस ट्रैक सभी खस्ताहाल हैं. ऊपर से स्टेडियम के पास धुआं उगलती फ़ैक्टरी.

मगर सबसे बड़ी समस्या है खिलाड़ियों के लिए मैट का अभाव. इसकी ग़ैरमौजूदगी में उन्हें मिट्टी पर खेलना पड़ता है. जिसकी वजह से उनके प्रदर्शन पर इसका सीधा असर पड़ता है.

मिट्टी बनाम मैट

फिलहाल भारतीय रेलवे में कार्यरत कबड्डी कोच और अंतरराष्ट्रीय खिलाड़ी वीरेंद्र कुमार के मुताबिक़, ''मिट्टी और मैट में रफ़्तार का फ़र्क़ है. मैट पर रफ़्तार ज़्यादा आती है, तो चोट भी ज़्यादा लगती है. कई बार हमारे खिलाड़ियों को चोट लग जाती है. लेकिन अब क्या करें? सुविधा है नहीं, तो मिट्टी से ही काम चला रहे हैं.''

कबड्डी भारत में सदियों से खेली जाती रही है पर आज इसे एशिया, यूरोप और अमरीका ने भी अपना लिया है. इसी साल ब्रिटेन में वर्ल्ड कबड्डी लीग शुरू हुई, जिसमें शामिल आठ टीमें पूरे पांच महीने तक अलग-अलग देशों में खेल रही हैं.

ज़ाहिर है कबड्डी में आज नाम है, शोहरत है और पैसा है और निज़ामपुर से बेहतर कबड्डी सीखने की शायद ही कोई दूसरी जगह हो, जहां माहौल है, कोच हैं और खेल के लिए प्यार भी.

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