आशुतोष महाराज: अंतिम संस्कार पर 'जंग'

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जालंधर में दिव्य ज्योति जागरण संस्थान के प्रमुख आशुतोष महाराज का अंतिम संस्कार काफ़ी समय से क़ानूनी दावपेंचों में फंसा है.

जहां अदालत ने अब 17 दिसंबर तक उनका अंतिम संस्कार करने का निर्देश दिया है, वहीं उनके समर्थक ये मानने को ही तैयार नहीं है कि आशुतोष महाराज ने देह त्याग दी है. वो उन्हें समाधी में लीन बताते हैं.

दिव्य ज्योति जागरण संस्थान में इस बारे में कोई ज़्यादा बात नहीं करता है, लेकिन कई जानकार इसे हितों के टकराव और संपत्ति की दावेदारी का मामला मानते हैं.

पढ़िए पूरी रिपोर्ट

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पंजाब का जालंधर ज़िला.. यहां से नूरमहल जाते समय शहर से पहले ही दिव्य ज्योति जागरण संस्थान आता है.

मोड़ पर पुलिस का नाका है. बड़े से बोर्ड पर दिव्य ज्योति जागरण संस्थान लिखा है.

इस मोड़ पर पंजाब पुलिस आगे जाने वाले हर किसी से पूछताछ करती है. खम्भों पर आशुतोष महाराज की तस्वीरों वाले बोर्ड लगे हैं.

सामने पुलिस की चौकी दिखाई देती है. और साथ ही संस्थान के सेवादारों की भी चौकी है.

तनाव और खामोशी

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मेरे पत्रकार की पहचान बताते ही वो तंबू की तरफ़ इशारा करते हुए मेरे आगे-पीछे चल पड़ते हैं.

मुझे बंधक होने का एहसास होता है. तंबू के अंदर मेज़-कुर्सियां हैं. मै वहां संस्थान के प्रवक्ता से बात करने की मांग करता हूं तो वो टालते हैं.

और इसके बदले बात पलट कर चाय की पेशकश करते हैं. इतना साफ़ पता चलता है कि वो किसी भी तरह की बातचीत करना नहीं चाहते.

माहौल में एक अजीब क़िस्म का तनाव और ख़ामोशी है. ऐसा लगता है कि हर कोई किसी घटना के अंदेशे से थोड़ा सतर्क है.

बाहर का व्यक्ति

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तंबू के अदंर सफ़ेद कुर्ते-पायज़ामे में एक व्यक्ति ने मेरा परिचय पूछा.

ख़ुद को सेवादार बताते हुए वे कहते हैं कि सुरक्षा का ध्यान रखते हुए नाकेबंदी की गई है, "पत्रकार अंदर से ग़लत रिपोर्ट करते हैं. कभी श्रद्धालु बन कर आओ तो सब कुछ पता चलेगा."

इसके बाद वह हाथ जोड़ते हैं कि संस्थान के पास बताने के लिए कुछ नया नहीं है. आस-पास कई जगह लिखा है, "आप कैमरा की निगरानी में हैं."

यहां पत्रकार कैमरा नहीं निकाल सकते. मुख्य सड़क पर संस्थान से आए श्रदालुओं से बात करने की मैंने कोशिश की तो कुछ ही पलों में कई लोग मेरे आस पास घिर आए जैसे वो चाहते ही ना हो कि कोई भी बाहर का व्यक्ति किसी से बात करे.

'गहन समाधि'

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श्रद्धालु किसी बात का जवाब दिए बिना हाथ जोड़ कर चला गया.

आशुतोष महाराज को केंद्र सरकार ने कभी ज़ेड-प्लस सुरक्षा दी थी जो बाद में ज़ेड क्लास कर दी गई.

नतीजतन अब भी संस्थान के अंदर केंद्रीय रिज़र्व पुलिस फ़ोर्स तैनात है. पंजाब में दिव्य ज्योति जागरण संस्थान 29 जनवरी से लगातार चर्चा में है.

नूरमहल के इस संस्थान के मुखिया का शव फ्रीज़र में पड़ा है लेकिन संस्थान का कहना है कि आशुतोष महाराज 'गहन समाधि' में हैं.

पंजाब और हरियाणा हाई कोर्ट ने राज्य सरकार को निर्देश दिया है कि आशुतोष महाराज के शव का 15 दिनों के अंदर अंतिम संस्कार सुनिश्चित किया जाए.

यानी 17 दिसंबर तक की समय सीमा तय की गई है.

अंतिम संस्कार

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इस मामले में संस्थान की रिव्यू पिटीशन हाई कोर्ट ने रद्द कर दी है और संस्थान ने अब डबल बेंच की मांग करने वाली याचिका दायर की है जिस पर 12 दिसंबर को सुनवाई होनी है.

बताया जाता है कि आशुतोष महाराज की मौत 29 जनवरी 2013 को हुई थी.

सबसे पहले संस्थान के डॉक्टरों ने और बाद में लुधियाना के अपोलो हस्पताल के डॉक्टरों ने उन्हें मेडिकल तौर पर मृत करार दिया था.

लेकिन उनके अनुयायी इसे नहीं मानते हैं और शव का अंतिम संस्कार करने से मना कर दिया है.

'बेटे' का दावा!

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संस्थान के मासिक पत्र 'अखण्ड ज्ञान' में फ्रीज़र में शव रखने की ये दलील दी गई है कि 'ऋषि-मुनि हिमालय की बर्फ़ीली गुफाओं में समाधियां लगाते' थे. और यही आशुतोष महाराज कर रह रहे हैं.

संस्थान ने शव के 'नीले होने', 'काले पड़ने' और 'सिकुड़ जाने' की हर दलील को रद्द किया है.

इस बीच, ख़ुद को आशुतोष महाराज का बेटा बताने वाले दिलीप झा ने पंजाब हरियाणा हाई कोर्ट के उस आदेश को चुनौती दी है जिसमें उनकी अंत्येष्टि सुनिश्चित करने की बात है.

उनका दावा है कि वे आशुतोष महाराज के बेटे हैं और इसकी पुष्टि के लिए उनका डीएनए टेस्ट होना चाहिए.

संपत्ति का मसला

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दिव्य ज्योति संस्थान पर आधिकारिक रूप से कोई बात नहीं करना चाहता.

लेकिन इस विषय पर नज़र रखने वालों का मानना है कि इस वक़्त देश-विदेश में इनके तकरीबन 350 डेरे हैं और कुल चल-अचल सम्पति 1500 करोड़ रुपए से ज़्यादा की मानी जाती है.

वहीं 1983 में नूरमहल में बने पहले आश्रम की सम्पति ही तकरीबन एक हज़ार करोड़ की है.

तीन करोड़ श्रद्धालुओं का दावा करने वाले संस्थान के लिए इस वक़्त सम्पति और विरासत पर दावेदारी के सवाल अहम हैं.

वैज्ञानिक सोच

उनके अहम शिष्य अरविंदानन्द नूरमहल का प्रबंध देखते हैं और विशालानंद दिल्ली में रहते हुए संस्थान के प्रवक्ता हैं.

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इनके इलावा नरिंदेरानन्द, अदित्यानन्द, सर्वदानंद, जय भारती और डॉक्टर हरपाल सिंह भी दावेदार हैं.

इनमें से कोई भी बात करने की लिए तैयार नहीं हैं. संस्थान के दरवाज़े पर खड़े लोग 'सब ठीक है' की बात करते हुए अपना नाम बताने से कतराते हैं.

लेकिन पत्रकारों की चाय-पानी की सेवा के लिए वे आतुर दिखते हैं.

हाई कोर्ट के फैसले में दर्ज है कि संस्थान के 'पैरोकारों का बुनियादी काम वैज्ञानिक सोच पैदा करना और मानवता को मज़बूत करना है.'

स्थानीय लोगों को डर है कि अगर आशुतोष महाराज का जबरन अंतिम संस्कार करने की कोशिश की जाएगी, तो नूरमहल पर उसी तरह तनावपूर्ण और हिंसक हालात पैदा हो सकते हैं जैसे रामपाल के आश्रम के बाहर हुए थे.

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