क्षमता है 6242, रखे हैं 16,885 क़ैदी

भारत की विभिन्न जेलों में विचाराधीन क़ैदियों के हाल और हालात पर बीबीसी हिन्दी की विशेष सिरीज़ में बात छत्तीसगढ़ की उन जेलों की जहां क्षमता से कई गुना ज्यादा क़ैदियों को रखा जा रहा है.

इनमें बड़ी संख्या में विचाराधीन कैदी शामिल हैं, जिन्हें दूर-दूर तक राहत की कोई संभावना नजर नहीं आ रही है.

इन क़ैदियों की क्या हैं मुश्किलें और छत्तीसगढ़ की जेलों का क्या है हाल?

पढ़ें ख़ास सिरीज़ की आठवीं कड़ी

छत्तीसगढ़ के सबसे संवेदनशील दंतेवाड़ा में वकील अमित जैन मुझे अपनी मेज़ पर रखे उन पोस्टकार्डों को दिखाते हैं जो ज़िले की जेल में बंद विचाराधीन क़ैदियों ने उन्हें भेजे हैं. इनमें से एक ख़त है बस्तर के बीजापुर के रहने वाले दिलीप का.

Image caption दंतेवाड़ा के वकील अमित जैन जेल में बंद विचाराधीन क़ैदियों के खत दिखाते हुए.

दिलीप ने लिखा है कि उनके ख़िलाफ़ दर्ज मामलों की सुनवाई समय पर नहीं हो रही है. अभियोजन पक्ष के गवाह सुनवाई के दौरान हाज़िर नहीं हो रहे हैं, जिसकी वजह से मामले लंबे खिंचते जा रहे हैं.

दिलीप अकेले ऐसे विचाराधीन क़ैदी नहीं हैं. छत्तीसगढ़ के नक्सल प्रभावित बस्तर संभाग में तीन जेलों को बंद कर दिया गया है. ये जेलें नारायणपुर, सुकमा और बीजापुर ज़िले की हैं.

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इन जेलों को सुरक्षा कारणों से बंद किया गया है, नतीजतन दंतेवाड़ा और कांकेर की ज़िला जेल के साथ जगदलपुर केंद्रीय कारागार में क़ैदियों की संख्या क्षमता से बहुत ज़्यादा हो गई है.

क्षमता से ज़्यादा क़ैदी

नेशनल क्राइम रिकार्ड्स ब्यूरो के आंकड़े बताते हैं कि जेलों में क्षमता से अधिक क़ैदी रखने के मामले में छत्तीसगढ़ सबसे ऊपर है. राज्य की जेलों में क्षमता से 261 प्रतिशत अधिक क़ैदियों को रखा गया है.

राज्य सरकार के सितम्बर 2014 तक के आंकड़ों के अनुसार छत्तीसगढ़ की जेलों में 6,242 क़ैदियों को रखने की क्षमता है, जबकि इन जेलों में 16,885 क़ैदी है.

सिर्फ़ केंद्रीय कारागारों की बात की जाए तो जगदलपुर केंद्रीय कारागार में 1519 क़ैदी हैं, जबकि इसकी क्षमता सिर्फ़ 639 क़ैदियों की है. उत्तरी बस्तर के कांकेर की ज़िला जेल की क्षमता 65 क़ैदियों की है, लेकिन यहाँ 390 क़ैदियों को रखा गया है.

दंतेवाड़ा का भी यही हाल है जहाँ 150 क़ैदियों की क्षमता वाली ज़िला जेल में 560 क़ैदियों को रखा गया है.

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बस्तर बार एसोसिएशन के पूर्व अध्यक्ष विक्रमादित्य झा के अनुसार राज्य के दक्षिणी इलाक़े में नक्सलियों के ख़िलाफ़ चल रहे अभियान के कारण भी बस्तर की जेलों में क़ैदियों की संख्या बहुत अधिक है.

सुरक्षा का हवाला

कुछ महीने पहले दंतेवाड़ा और जगदलपुर में वकीलों ने विचाराधीन क़ैदियों को अदालतों में उनकी तारीख़ पर पेश नहीं किए जाने का आरोप लगाते हुए प्रदर्शन किया था.

वकील अरविन्द चौधरी कहते हैं कि अक्सर सुरक्षा का हवाला देकर क़ैदियों को समय पर अदालत के सामने पेश नहीं किया जाता है.

चौधरी कहते हैं, "बस्तर की जेलों में ज़्यादातर क़ैदियों के ख़िलाफ़ नक्सली हिंसा के मामले दर्ज हैं. अमूमन हमलों और विस्फोट के मामलों में अर्ध सैनिक बलों के अधिकारियों या जवानों को गवाह बनाया जाता है. कुछ महीनों में इन अधिकारियों का स्थानांतरण हो जाता है. अदालतों के समन के बावजूद फिर ये लोग गवाही देने नहीं पहुँचते. इसकी वजह से मामले लटके रहते हैं."

जगदलपुर केंद्रीय कारागार के अधीक्षक राजेंद्र कुमार गायकवाड़ का कहना है कि सुकमा और नारायणपुर की जेलों को बंद किया गया है, जबकि बीजापुर की जेल को सुरक्षाबलों ने अपना ठिकाना बनाया है.

Image caption जगदलपुर केंद्रीय कारागार के अधीक्षक राजेंद्र कुमार गायकवाड़.

इस कारण इन ज़िलों के बहुत सारे क़ैदी जगदलपुर के केंद्रीय कारागार में हैं.

सीधी सुनवार्ई की व्यवस्था

उन्होंने बताया कि दंतेवाड़ा या कोंडागांव के ज़िला कोर्ट में क़ैदियों को कड़े सुरक्षा घेरे में ले जाया जाता है. कई बार स्थानीय पुलिस प्रशासन सुरक्षाबल उपलब्ध नहीं करा पाता है.

इस वजह से विचाराधीन क़ैदी समय पर अदालत में पेश नहीं हो पाते हैं. समय-समय पर जेल प्रशासन इस मुद्दे को ज़िले के अधिकारियों के समक्ष उठाता रहता है.

बस्तर के वरिष्ठ वकीलों का कहना है कि जगदलपुर जेल में 'वीडियो-कॉन्फ़्रेंसिंग' की सुविधा है, लेकिन पिछले एक साल से जगदलपुर जेल में वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग नहीं हो पाई है.

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हालाँकि सुप्रीम कोर्ट के निर्देश के बाद अब स्थानीय न्यायाधीशों ने जेल का दौरा करना शुरू किया है. ऐसे विचाराधीन क़ैदियों की सूची तैयार की जा रही है, जिनके मामले या तो न्यायिक मदद के लिए लंबित हैं या फिर सुरक्षा कारणों से उन्हें पेश नहीं किया जाता है.

राहत की उम्मीद

बस्तर के विधिक सहायता प्रकोष्ठ के सचिव जीतेन्द्र सिंह ने बीबीसी को बताया कि सुप्रीम कोर्ट के निर्देश के बाद सभी विचाराधीन क़ैदियों की फ़ाइलों का पुनरावलोकन किया जा रहा है.

प्रकोष्ठ ने अधिवक्ताओं का एक पैनल बनाया है जो आर्थिक रूप से कमज़ोर क़ैदियों के मामले लड़ेंगे.

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सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों के बावजूद बस्तर की जेलों के विचाराधीन क़ैदियों को ज़्यादा राहत की उम्मीद नहीं है. अधिवक्ता अशोक जैन के अनुसार इस आदेश से छोटे मामलों में बंद क़ैदियों को ही मदद मिलेगी.

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