मरता, लुटता ‘धरती का स्वर्ग’

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जम्मू-कश्मीर विधानसभा चुनाव के दौरान इस बार पानी के तरह पैसा बहाया जा रहा है.

एक ओर पिछले दिनों आई बाढ़ की तबाही के निशान बाक़ी है तो दूसरी ओर राजनीतिक पार्टियां विकास का ढोल पीट रही हैं.

जम्मू-कश्मीर को विकास की पटरी पर लाने के वादों के बीच पर्यावरण पर बढ़ते संकट की ओर किसी का ध्यान नहीं है.

पढ़िए विस्तार से ग्राउंड रिपोर्ट

‘धरती के स्वर्ग’ कश्मीर की ग्रीष्मकालीन राजधानी श्रीनगर में अगर कोई लंबे समय बाद आए तो ज़्यादातर इलाकों में एक फलता-फूलता ‘नर्क’ देखकर वह निराश होगा.

बाढ़ के बाद हालात और ख़राब हुए हैं. शहर का बड़ा हिस्सा धूल, गंदगी, अतिक्रमण और प्रदूषण के बवंडर में घिरा है.

शाम को बिजली गुल होने पर बाज़ार और रिहाइशी इलाकों में एक साथ सैकड़ों जनरेटरों के चल पड़ने से धूल-गंदगी के बीच डीज़ल की दमघोंटू बदबू लोगों की बेचैनी बढ़ा देती है.

क्या धरती का स्वर्ग यही है? पर सरहदी सूबे के प्रमुख सियासदानों या सियासी दलों में इसे लेकर किसी तरह की बेचैनी नहीं दिखाई देती.

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यह सिर्फ़ श्रीनगर की समस्या नहीं है, पूरे सूबे पर पर्यावरण विनाश, जल, ज़मीन और जंगल की लूट के नए ख़तरे मंडरा रहे हैं.

लेकिन किसी राजनीतिक दल के लिए यह बड़ा एजेंडा नहीं है. उनके घोषणापत्र या विज़न-दस्तावेज में न तो इन ख़तरों और न ही समस्या-समाधान के किसी ठोस फ़ॉर्मूले का ज़िक्र है.

निजी क्षेत्र को बढ़ावा

कश्मीर घाटी के अब तक के सबसे ख़र्चीले चुनाव में कई प्रमुख दल परोक्ष-अपरोक्ष रूप से जल और जंगल जैसे प्राकृतिक संसाधनों के निजीकरण की प्रक्रिया तेज़ करने का ऐलान करते नजर आ रहे हैं.

पनबिजली उत्पादन की क्षमता बढ़ाने के लिए निजी क्षेत्र को कश्मीर में पहले ही उतारा जा चुका है. निजी क्षेत्र की भागीदारी को लेकर सूबे में ज़्यादा विवाद नहीं हैं.

लेकिन उसकी सीमा क्या हो, जल और जंगल का किस तरह उपयोग किया जाय कि घाटी का पर्यावरण न बिगड़े, इस तरह के सवालों पर सिविल सोसायटी और आम-समाज में तीख़े मतभेद हैं.

जम्मू कश्मीर की जल और जंगल पर सबसे पैनी नज़र देश की बड़ी निजी कंपनियों की है. पनबिजली परियोजनाओं के लिहाज़ से झेलम से ज़्यादा चिनाब पर ज़ोर है, जो जम्मू और कश्मीर घाटी के बीच बहती है.

कुछेक कंपनियां पहले से ही यहां पनबिजली परियोजना में दाखिल हो चुकी हैं. आंध्र के एक बड़े औद्योगिक घराने के नियंत्रण वाली एक बड़ी कंपनी सैकड़ों करोड़ के निवेश के साथ यहां अपनी मौजूदगी बनाए हुए है.

पीडीपी की महबूबा मुफ़्ती हों, मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्लाह या भाजपा की तरफ से स्वयं प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, अपने भाषणों में सभी प्रमुख नेता सरहदी सूबे के प्राकृतिक संसाधनों के ‘प्रचुर उपयोग’ पर ज़ोर दे रहे हैं.

विकास पर फ़ोकस

पीडीपी नेता महबूबा मुफ़्ती ने 9 दिसंबर को श्रीनगर स्थित अपनी रैली में इस बात पर ज़ोर दिया कि सूबे के विकास में निजी क्षेत्र की भूमिका बढ़ाई जाएगी.

इस बार ज़्यादातर नेता मिलिटेंसी या शांति की नहीं, विकास की बात कर रहे हैं पर वे विकास के जिस ‘नए माडल’ की वकालत करते नजर आ रहे हैं, उसमें जल, ज़मीन और जंगल पर निजी कंपनियों का दबदबा तेज़ी से बढ़ेगा.

Image caption कांग्रेस के तीन प्रमुख वादों में पर्यावरण की बात नहीं शामिल.

यह बात सही है कि जम्मू कश्मीर को विकास की नई डगर चाहिए, जिससे रोज़गार के अवसर पैदा किए जा सकें और ऊर्जा-ज़रूरतों को भी पूरा किया जा सके. इसमें निजी क्षेत्र की हिस्सेदारी भी हो सकती है.

पर असल सवाल है-विकास का मॉडल कैसा हो? पर्यावरण, नदियों, झीलों और अन्य वॉटर-बॉडीज़ की बदहाली के नतीजे श्रीनगर और आसपास के इलाकों में आई भीषण बाढ़ में देखे जा चुके हैं. क्या ऐसे ही विकास मॉडल की पुनरावृत्ति होगी?

घाटी के युवा वकील और सामाजिक कार्यकर्ता अल्ताफ़ मेहराज ने बातचीत में कहा, "राजनीतिक दलों को बड़ी-बड़ी कंपनियों का समर्थन मिल रहा है. इसीलिए इस बार चुनाव में आपको इतना ख़र्चा दिखाई दे रहा है. घाटी में बहुत पैसा फेंका जा रहा है, इस चुनाव में. इसके पीछे बड़े कॉरपोरेट और राजनीतिक हित हैं. इसके जरिए अनुच्छेद 370 को और रौंदा जा सकता है. चुनाव में विकास की बात हो रही है, किसका विकास और कैसा विकास? कश्मीर के असल राजनीतिक मसले पर ख़ामोशी क्यों है, राजनीतिक दलों में?"

जल स्रोतों पर संकट

विकास भी भरमाने वाला सवाल साबित हो रहा है. क्या बाढ़ नियंत्रण विकास का मुद्दा नहीं है? क्या सिर्फ़ नदियों को बांधना, वॉटर बॉडीज़़ को ख़त्म कर उनके ऊपर इमारत खड़ा करना ही विकास है?

श्रीनगर की वॉटर बॉडीज़़ पर एक शोध रपट जम्मू कश्मीर स्थित जीआईएस लेबोरेटरी रिमोट सेंसिंग सेंटर ने तैयार किया था, जिसे केंद्रीय पर्यावरण मंत्रालय को सौंपा गया था.

रपट के मुताबिक बीते 100 सालों में श्रीनगर की 50 फ़ीसदी से ज़्यादा वॉटर बॉडीज़ विलुप्त हो चुकी हैं. दो भू-वैज्ञानिकों (हुमायूं रशीद और गौहर नसीम) ने डल, नागिन, वूलर, आंचर जैसी झीलों की हालत पर गंभीर अध्ययन किया.

सन 2010 की बाढ़ नियंत्रण विभाग की रपट में कहा गया था कि कभी भी विनाशकारी बाढ़ जम्मू-कश्मीर राज मार्ग को ख़त्म कर सकती है और घाटी देश से कट सकती है. श्रीनगर भी तबाह हो सकता है.

किसका विकास, किसका मुनाफ़ा?

विभाग ने अपनी चेतावनी के साथ 2200 करोड़ रुपए की एक कार्ययोजना का प्रारूप भी केंद्र और राज्य को सौंपा. केंद्र की तत्कालीन मनमोहन सिंह सरकार ने उसे सही बताया और फ़ंड देने का फ़ैसला हुआ. चार साल में काम हो जाना था, पर ज़्यादा कुछ नहीं हुआ.

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Image caption भारतीय जनता पार्टी की नज़र भी मिशन 44 प्लस पर.

ठीक चार साल बाद कश्मीर घाटी के कुछ हिस्सों में तबाही का आलम देखा गया. कश्मीर विश्वविद्यालय में समाजशास्त्र के प्रो. बशीर अहमद कहते हैं, "ज़्यादातर पार्टियां अवाम के विकास की नहीं, सिर्फ़ अपने फ़ायदे की बात सोच रही हैं."

इस तरह के आरोपों को सिरे से ख़ारिज नहीं किया जा सकता. कई बड़े सवालों और सरहदी सूबे में विकास के वृहतर परिप्रेक्ष्य पर चुनाव में उतरी ज़्यादातर पार्टियां ख़ामोश हैं. लेकिन चारों तरफ ‘विकास’ का शोर मचा हुआ है. कैसा विकास, किसका विकास, किसकी पूंजी, किसका मुनाफ़ा और किसकी बदहाली, इस पर कोई चर्चा नहीं है.

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