'इसे छूने के बाद रोटी नहीं खाई जाती'

भारत में लाखों महिलाएं महावारी के दौरान सैनिट्री पैड्स का इस्तेमाल करती हैं. कूड़ेदान में फेंके गए सैनिट्री पैड्स प्राकृतिक रूप से गलते नहीं है. तो इनका क्या होता है?

इस विशेष पड़ताल ने हमने पाया कि दिल्ली में इन पैड्स का कूड़ा सालों से खुले आसमान के नीचे सड़ रहा है.

पढ़िए विशेष रिपोर्ट

दिल्ली के बाहरी क्षेत्र भलस्वा डेयरी की ओर जाते हुए दूर से एक पहाड़ी नज़र आती है. आंखों को ये नज़ारा बुरा नहीं लगता.

लेकिन जैसे ही आप उस पहाड़ी के नज़दीक पहुंचते हैं, तो असलीयत सामने आती है.

दरअसल ये कूड़े का विशालकाय ढेर है जिसे स्थानीय निवासी ‘कूड़े की पहाड़ी’ कहते हैं. अंग्रेज़ी में इसे लैंडफ़िल कहा जाता है, जहां शहर के पूरे कूड़े-कचरे को उडेल दिया जाता है.

शहारत ऐसे लोगों में से हैं जो रोज़ इस ‘पहाड़ी’ पर चढ़ते हैं और यहां से वो कूड़ा बीनते हैं जिसका फिर से इस्तेमाल किया जा सके, या रीसाइकिल किया जा सके.

‘पहाड़ी’ पर हमारे साथ चलते हुए वे कहते हैं, ‘इस्तेमाल कर फेंके गए बोतल, डब्बे, महिलाओं के सैनिट्री पैड, पन्नियां और सड़े हुए खाने से लेकर मरा हुआ कुत्ता भी यहीं फेंका जाता है.’

जी हां, महिलाओं के इस्तेमाल किए सैनिट्री पैड भी...पर वो कूड़ा उठाने वालों के किसी काम के नहीं. बल्कि उन्हें छूने से इन्हें कई प्रकार की बीमारियों का ख़तरा होता है.

लैंडफ़िल में काम करने वाली सायरा बानो नाक चढ़ाते हुए कहती हैं, ‘बहुत घिन्न आती है जब कचरे में से सैनिट्री पैड निकाल कर अलग करने पड़ते हैं. अपने आत्मसम्मान को भूल हम ये कूड़ा उठा तो लेते हैं, लेकिन इन्हें छूने के बाद रोटी को हाथ लगाने का मन नहीं करता. महिलाएं अपने पैड्स को अलग तरह के पैकिटों में क्यों डाल कर फेंकती?’

पर्यावरण को ख़तरा

बाज़ार में मिलने वाले ब्रैंडेड सैनिट्री पैड में दरअसल क्रूड ऑयल प्लास्टिक होता है जो कि जैविक रुप से नष्ट नहीं होता. साथ ही उनमें डॉयोक्सिन जैसे हानिकारक रसायन भी होते हैं जो पर्यावरण के लिए बेहद हानिकारक हैं.

वॉशरूम हाईजीन कॉन्सेप्ट नाम की संस्था से जुड़ी सुधा चक्रपानी का कहना है, “सैनिट्री पैड वाला कूड़ा उठाने से न केवल कर्मचारियों को ख़तरा होता है, बल्कि पर्यावरण पर भी बुरा असर होता है. क्योंकि इन्हें नष्ट करने की कोई तरीका बना ही नहीं है, इसलिए इन्हें लाकर लैंडफ़िल में डाल दिया जाता है.”

2011 में एसी नीलसन मार्केट रिसर्च ग्रुप के एक सर्वेक्षण के मुताबिक भारत में केवल 12 प्रतिशत महिलाएं सैनिट्री पैड का इस्तेमाल करती हैं.

लेकिन जानकारों का मानना है कि ये तादाद तेज़ी से बढ़ रही है, और सैनिट्री कचरे को नष्ट करने के तरीकों पर ध्यान देने की ज़रूरत है.

एक रिसर्च के मुताबिक भारत में लाखों महिलाएं अपने 30 से 40 साल के प्रजनन चक्र में करीब आठ से दस हज़ार सैनिट्री पैड का इस्तेमाल करती है. हर घंटे एक करोड़ सैनिट्री पैड लैंडफ़िल में डंप किए जा रहे हैं.

सैनिट्री पैड में इस्तेमाल हुए प्लास्टिक को प्राकृतिक रूप से नष्ट होने में करीब 500 साल लगते हैं.

तो फिर पर्यावरण को सैनिट्री पैड के प्रकोप से बचाने के लिए क्या किया जाना चाहिए?

ज़िम्मेदारी किसकी?

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साल 2011 के प्लास्टिक वेस्ट (मेनेजमेंट एंड हैंडलिंग) नियमों में लिखा गया है कि प्लास्टिक के इस्तेमाल से माल बनाने वाली कंपनियों की ज़िम्मेदारी बनती है कि वे इस्तेमाल के बाद अपने प्रॉडक्ट को नष्ट करने की ज़िम्मेदारी ले.

लेकिन कुछ ग़ैर-सरकारी संस्थाओं के मुताबिक जॉनसन एंड जॉनसन, हिंदुस्तान लीवर और प्रॉक्टर एंड गैंबल जैसी सैनिट्री पैड बनाने वाली कंपनियां इस ज़िम्मेदारी को निभा नहीं रही हैं.

कचरा प्रबंधन के मुद्दों पर काम करने वाली ग़ैर-सरकारी संस्था से जुड़ी चित्रा मुखर्जी का कहना है, ‘बाहरी देशों में कंपनियां अपने प्रॉडक्ट के कचरे की ज़िम्मेदारी लेती हैं. लेकिन भारत में कंपनियां नियमों का पालन नहीं करती. सरकार को चाहिए कि कंपनियों पर भारी जुर्माना लगाया जाए. क्योंकि कोई जुर्माना नहीं है, तो कोई इन नियमों को गंभीरता से नहीं लेता, जो कि एक दुर्भाग्य है.’

बीबीसी ने इन कंपनियों से इस मुद्दे पर संपर्क साधने की कोशिश की, लेकिन कोई जवाब नहीं मिला.

चित्रा मुखर्जी बीबीसी को बताया कि फिलहाल नगर निकाय इस कचरे को जला कर नष्ट करने के लिए वेस्ट मैनेजमेंट प्लांट में भेज देती है, लेकिन ऐसे कचरे को जलाने से भी पर्यावरण में हानिकारक गैस जा मिलती हैं, जिससे कैंसर जैसी बीमारियां हो सकती हैं.

यानि सैनिट्री पैड को राख कर देना भी समस्या का समाधान नहीं है.

इस बहस के बीच एक सुझाव ये है कि सैनिट्री पैड्स का इस्तेमाल ही बंद कर दिया जाए.

'भारतीय रिवाज़ में छिपे समाधान'

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कचरा प्रबंधन के मुद्दों पर काम करने वाली हमसा अय्यर का कहना है कि समाधान भारतीय रीति-रिवाज़ों में ही मौजूद है.

बीबीसी से बातचीत में हमसा अय्यर ने कहा, ‘भारतीय महिलाएं सालों से घर पर कपड़े से बने पैड का इस्तेमाल करती आई हैं. पैड्स को अगर अच्छे से साफ़ किया जाए तो इन्हें दोबारा भी इस्तेमाल किया जा सकता है."

उनका कहना है, "टीवी पर दिखाई जाने वाले सैनिट्री पैड्स के विज्ञापनों में कपड़े के पैड को नीचा दिखाया जाता है. इनकी मार्किटिंग इस तरीके से की जाती है कि ज़्यादा से ज़्यादा महिलाएं इन्हें आरामदायक मान कर खरीदें.’

भारत में कई छोटी कंपनियां और ग़ैर-सरकारी संस्थान हैं जो ऐसे सामान से पैड्स बनाती हैं जो जैविक रूप से नष्ट हो जाते हैं और एक से ज़्यादा बार इस्तेमाल किए जा सकते हैं.

इन पैड्स की अधिकतर महिलाओं को ज़्यादा जानकारी नहीं है, इसलिए इनकी बिक्री इतनी ज़्यादा नहीं है.

हमसा का कहना है, ‘न सिर्फ़ सरकार को सैनिट्री कचरे को निष्क्रिय करने के नए तरीकों पर ग़ौर करना चाहिए बल्कि महिलाओं को भी पर्यावरण के प्रति अपनी ज़िम्मेदारी को समझते हुए दूसरे विकल्पों के बारे में सोचना चाहिए. कई ऐसे विकल्प हैं जो पर्यावरण को नुकसान नहीं पहुंचाते औऱ जिनका इस्तेमाल बार-बार किया जा सकता है, जैसे कि ईको-फ़ेम पैड्स, मेन्स्ट्रुअल कप्स, आनंदी पैड्स आदि.’

यानि जितनी ज़िम्मेदारी सरकार की बनती है पर्यावरण के प्रति अपनी ज़िम्मेदारी को निभाने की उतनी ही महिलाओं की भी.

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