'हमें उन सब को मारना ही था'

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Image caption शेख मुजीबुर रहमान 1972 में लंदन में.

हाल ही में मशहूर लेखक सलील त्रिपाठी की पुस्तक प्रकाशित हुई है 'द कर्नल हू वुड नॉट रिपेंट' जिसमें उन्होंने बांग्लादेश के इतिहास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाले कुछ किरदारों और प्रत्यक्षदर्शियों से बात कर उसका सूक्ष्म विश्लेषण किया है.

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'द कर्नल हू वुड नॉट रिपेंट' की शुरुआत होती है बंगबंधु शेख़ मुजीबुर रहमान के हत्यारों की फाँसी से और फिर उस धरती के 100 साल पुराने इतिहास को छूते हुए भारत विभाजन, भाषाई दंगों, बांग्लादेश की आज़ादी की लड़ाई, वहाँ पाकिस्तानी सेना के अत्याचार, सैनिक विद्रोहों को छूती हुई वर्तमान बांग्लादेश की राजनीति में दो महिलाओं के बीच चल रही होड़ पर समाप्त होती है.

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15 अगस्त 1975 की सुबह थी. अभी भोर नहीं हुई थी. ढाका में धनमंडी की 32 नंबर सड़क के 677 नंबर घर में हर कोई गहरी नींद में था.

बांग्लादेश के राष्ट्रपति शेख़ मुजीबुर रहमान के निजी सचिव एएफएस मोहितुल इस्लाम रात की ड्यूटी पर थे. सारा काम निपटा कर वो रात एक बजे सोने गए थे.

अचानक फ़ोन की घंटी बजी. दूसरे छोर पर स्वयं राष्ट्रपति शेख़ मुजीब थे. वो बोले, 'पुलिस कंट्रोल रूम को फ़ोन लगाओ.' उन्हें सूचना मिली थी कि उनके साले अब्दुरब सर्नियाबत के घर पर हमला हुआ है.

मोहितुल ने पुलिस कंट्रोल रूम को फ़ोन लगाया. लेकिन लाइन नहीं मिली. उन्होंने गनोभोवन एक्सचेंज से संपर्क करने की कोशिश की. वहाँ पर किसी ने फ़ोन उठाया भी लेकिन कुछ बोला नहीं.

सारे फ़ोन कटे

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मुजीब का धैर्य समाप्त होता जा रहा था. उन्होंने मोहितुल का डांटा, "तुम पुलिस कंट्रोल रूम का नंबर क्यों नहीं मिला पा रहे हो?"

मोहितुल ने उन्हें कांपती आवाज़ में ख़राब ख़बर सुनाई, "मेरा किसी से भी संपर्क नहीं हो पा रहा है."

तभी मुजीब ने उनके हाथ से फ़ोन ले लिया और रिसीवर पर गरजे, "मैं राष्ट्रपति शेख़ मुजीब बोल रहा हूँ."

उसी वक़्त गोलियों की बौछार शुरू हो गई और मोहितुल के कमरे की सभी खिड़कियों के सारे शीशे टूट गए.

जनरल शफ़ीउल्ला को गोलियों की आवाज़ सुनाई दी

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शेख़़ मुजीब को अंदाज़ा ही नहीं था कि उनकी हत्या का मिशन शुरू हो चुका था. मेजर फ़ारूक रहमान, मेजर अब्दुर रशीद कुछ अन्य अफ़सरों के साथ अपने अभियान पर निकल चुके थे.

दूसरी तरफ जब बांग्लादेश के सेनाध्यक्ष जनरल शफ़ीउल्ला को ख़बर मिली कि सेना की दो बटालियन बिना किसी आदेश के शहर के बीचोंबीच शेख़ मुजीब के घर की तरफ़ बढ़ रही हैं, तो उन्होंने शेख़़ मुजीब को फ़ोन मिलाया.

फ़ोन लाइन व्यस्त थी. बहुत कोशिशों के बाद उनका शेख़ मुजीब से संपर्क हुआ.

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Image caption 10 जनवरी, 1972 में बांग्लादेश के ढाका में शेख़ मुजीब की वापसी का दृश्य.

जनरल शफ़ीउल्ला ने बीबीसी को बताया, "जब मेरा फ़ोन लगा तो शेख़ मुजीब बहुत गुस्से में थे. मुझसे बोले, तुम्हारी फ़ोर्स ने मेरे घर पर हमला किया है...'शफ़ीउल्ला तोमार फ़ोर्स आमार बाड़ी अटैक करोछे. तुमि जल्दी फ़ोर्स पठाओ.' जब मैंने उनसे कहा मैं कुछ करता हूँ. क्या आप अपने घर से बाहर आ सकते हैं ? जब वो बिल्कुल चुप हो गए. मैं हलो-हलो-हलो करता रहा. क़रीब तीस सैकेंड के बाद मुझे नेपथ्य में फ़ायरिंग की आवाज़ सुनाई दी.''

शेख़ मुजीब को देखते ही हत्यारे नर्वस हुए

Image caption शेख मुजीबुर रहमान और ज़ुल्फीकार अली भुट्टो

मोहितुल ने देखा कि शेख़ के बेटे कमाल नीचे दौड़ते हुए चले आ रहे हैं. तभी सैनिकों ने घर के अंदर प्रवेश किया. मेजर बज़लुल हुदा ने कमाल के पैरों पर गोली चलाई.

कमाल ने अपने को बचाने की कोशिश करते हुए कहा, ''मैं शेख़ कमाल हूँ. शेख़़ मुजीब का बेटा.''

इतना सुनना था कि सैनिकों ने कमाल पर गोलियों की बौछार शुरू कर दी. फिर मेजर हुदा, नूर और मोहिउद्दीन ने हर कमरे में शेख़ मुजीब को ढूंढना शुरू कर दिया.

मोहिउद्दीन सीढ़ी चढ़ रहे थे कि उन्हें ऊपरी सीढ़ी पर शेख़ मुजीब दिखाई दिए. वो सफ़ेद कुर्ता और सिलेटी रंग की चारख़ाने की लुंगी पहने हुए थे और उनके हाथ में पाइप था.

एंटनी मेसक्रनहस अपनी किताब 'बांग्लादेश ए लिगेसी ऑफ़ ब्लड' में लिखते हैं, "हालांकि मोहिउद्दीन शेख़़ मुजीब को मारने निकले थे लेकिन उनको देखते ही वो नर्वस हो गए. उनके मुंह से सिर्फ़ इतना ही निकला, सर आपनी आशुन...सर आप आइए. मुजीब ने चिल्ला कर कहा, क्या चाहते हो? क्या तुम मुझे मारने आए हो? भूल जाओ. पाकिस्तान की सेना ऐसा नहीं कर पाई. तुम किस खेत की मूली हो?''

मुजीब के व्यक्तित्व का ऐसा असर था कि मोहिउद्दीन हकलाने लगे थे...और बार-बार यही दोहरा रहे थे... सर आपनी आशुन. तभी स्टेन गन लिए मेजर नूर ने प्रवेश किया. उन्हें लगा कि मुजीब, मोहिउद्दीन को बातों में लगा कर समय बचा रहे हैं.

नूर ने मोहिउद्दीन को धक्का देते हुए अपने पीछे लिया और मुजीब पर अपनी पूरी स्टेन गन खाली कर दी.

'मुझे यहीं गोली मारो'

Image caption शेख़ मुजीबुर रहमान का शव

मुजीब मुंह के बल गिरे और नीचे गिरते चले गए. उनका फ़ेवरेट पाइप अभी भी उनके हाथ में था.

सलील त्रिपाठी अपनी किताब 'द कर्नल हू वुड नॉट रिपेंट' में लिखते हैं कि शेख़ का नौकर रामा दौड़ता हुआ मुजीब की पत्नी फ़ज़ीलातुन्निसा के पास गया और उन्हें बताया कि शेख़ मुजीब को गोली मार दी गई है. इस बीच सैनिक भी उस कमरे में आ पहुंचे. उन्होंने दरवाज़े पर गोली चलानी शुरू कर दी.

फ़ज़ीलातुन्निसा ने ख़ुद दरवाज़ा खोला और कहा, ''अगर हमें मरना है तो हम सब साथ मरेंगें.'' सैनिकों ने कमरे में मौजूद सब लोगों को इकट्ठा कर सीढ़ी से नीचे उतरने के लिए कहा.

जब फ़ज़ीलातुन्निसा ने शेख़़ के मृत शरीर को देखा तो उन्होंने आगे जाने से इनकार कर दिया और कहा, ''मैं आगे नहीं जाउंगी. मुझे यहीं गोली मारो.''

सैनिक उन्हें वापस उनके कमरे में ले गए और रिसालदार मुस्लेमुद्दीन तथा मेजर अज़ीज़ पाशा ने उन पर गोली चलानी शुरू कर दी. देखते-देखते कमरे में मौजूद सब लोग मारे गए.

दस साल के बेटे रसेल को भी नहीं बख़्शा

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Image caption शेख मुजीबुर रहमान अपने परिवार के साथ.

कुछ सैनिक शेख़ मुजीब के 10 साल के बेटे रसेल मुजीब को नीचे ले आए.

सलील त्रिपाठी लिखते हैं कि रसेल ने मोहितुल से पूछा, ''भय्या क्या ये लोग मुझे भी मार देंगे?''

रसेल ने एक सिपाही से कहा वो अपनी माँ के पास जाना चाहते हैं. मेजर पाशा ने उस सैनिक से कहा, ''इसे इसकी माँ के पास पहुंचा दो.''

वो सैनिक मुस्कराया, रसेल को पहली मंज़िल पर ले गया, जहाँ उनकी माँ का शव पड़ा हुआ था. स्टेन गन का एक और बर्स्ट सुनाई दिया और रसेल का शव भी अपना माँ के पास जा गिरा. तभी एक जीप शेख़ मुजीब के घर के सामने आकर रुकी और उसमें से मेजर फ़ारूक रहमान बाहर आए.

मेजर हुदा ने उनके कान में फुसफुसाया, 'सब ख़त्म हो गए.'

'हमने ही शेख़ मुजीब को मारा था'

Image caption सलील त्रिपाठी(बाएँ) बीबीसी स्टूडियो में रेहान फ़ज़ल के साथ.

इस घटना के 11 वर्ष बाद सलील त्रिपाठी ने तब लेफ़्टिनेंट कर्नल बन चुके फ़ारूक रहमान का इंटरव्यू लिया.

सलील ने बीबीसी को बताया, "उस दिन फ़ारूक रहमान पठानी सूट पहने हुए थे. उनकी पतली मूँछे थीं और वो सुनहरे रिम का चश्मा पहने हुए थे. वो अपनी गर्दन उठाकर पढ़ने की कोशिश कर रहे थे कि मैं अपनी नोट बुक में क्या लिख रहा हूँ? वो कई साल लीबिया में रहने के बाद हाल ही में बांग्लादेश वापस लौटे थे."

Image caption शेख मुजीबुर रहमान, इंदिरा गांधी के साथ.

सलील त्रिपाठी कहते हैं कि मैं अभी इसी पसोपेश में था कि उनसे कैसे सवाल करूं कि शेख़़ मुजीब की हत्या में क्या उनका हाथ था.

मैंने घुमाकर पूछना शुरू किया कि लोग कहते हैं कि बांग्लादेश में वर्ष 1975 में हुई घटनाओं में आपका...फ़ारूक रहमान ने मुझे अपना वाक्य पूरा करने ही नहीं दिया. वो छूटते ही बोले, ''जी हाँ हमने ही उनको मारा था. उनको जाना ही था.''

बाद में मेजर अब्दुर रशीद ने मशहूर पत्रकार एंटनी मेसक्रनहस को इंटरव्यू दिया जिसमें उन्होंने स्वीकार किया कि उन्होंने ही शेख़ मुजीब की हत्या की थी.

Image caption बांग्लादेश की वर्तमान प्रधानमंत्री शेख़ हसीना, शेख़ मुजीबुर रहमान की बेटी हैं.

सलील त्रिपाठी ने फ़ारूक रहमान से पूछा कि दस साल के रसेल मुजीब को मारने की क्या ज़रूरत थी?

फ़ारूक का जवाब था, ''ये मर्सी किलिंग का काम था. मुजीब वंशवाद को बढ़ावा दे रहे थे. हमें उन सब को मारना ही था.''

पाँचों को फांसी

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Image caption बांग्लादेश की प्रधानमंत्री शेख़ हसीना और उनकी बहन शेख़ रेहाना अपने पिता शेख़ मुजीब की कब्र पर.

1997 में शेख़ हसीना सत्ता में आईं तो फ़ारूक रहमान और उनके पांच साथियों को शेख़ मुजीब की हत्या के आरोप में गिरफ़्तार किया गया.

कई साल मुक़दमा चलने के बाद उन्हें 27 जनवरी 2010 को फाँसी दे दी गई.

सबसे पहले बज़लुल हुदा को फाँसी के फंदे पर ले जाया गया. जेल के एक अधिकारी ने लाल रुमाल गिराया और जल्लाद ने फाँसी का फंदा खींच दिया.

इसके बाद मोहिउद्दीन, फ़ारूक, शहरयार और एकेएम मोहिउद्दीन की बारी आई. शेख़़ मुजीब की बेटी हसीना वाजेद को इन फांसियों की सूचना दी गई.

उन्होंने कहा कि उन्हें अकेला छोड़ दिया जाए. कुछ समय बाद उन्होंने शुकराने की नमाज़ पढ़ी.

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