'मुस्लिम समाज में आत्मविश्लेषण का अभाव है'

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क्या हमें इस्लामिक स्टेट(आईएस) का शुक्रगुज़ार नहीं होना चाहिए? उन्होंने इस्लाम की मान्यताओं को इस कट्टरता से लागू किया है कि बहुत से कट्टरवादी वहाबी तक इस्लाम की ऐसी व्याख्या के लिए उनकी आलोचना कर रहे हैं.

इसमें शायद हम जैसे मुसलमानों के लिए भी आख़िरकार एक उम्मीद बाक़ी है!

लेकिन क्या यह उम्मीद सचमुच है? इस बारे में मैं दावे से कह नहीं सकता.

बात करने से बचते हैं

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मुझे पता है कि मुसलमानों की एक बहुत बड़ी तादाद कट्टरवादी नहीं है. वहीं कई कट्टरपंथी ऐसे भी हैं जिनका 'दूसरों का सिर धड़ से अलग करने' के काम से कोई वास्ता नहीं है.

इसके बावजूद, मुस्लिम सोच में एक ऐसी दिक़्क़त है जिसके बारे में बात करने से ज़्यादातर मुस्लिम बचते हैं. ऐसा नहीं है कि ये सोच केवल मुसलमानों के भीतर ही है, लेकिन आजकल यह उनके बीच ख़ासतौर पर प्रचलित है.

इस दिक़्क़त की एक पहचान यह है कि कई मुसलमान, यहाँ तक कि कुछ धर्मनिरपेक्ष मुस्लिम भी, मुस्लिम संस्कृति और समाज से जुड़ी हर चीज़ का बचाव करते हैं.

इसके लिए आम तौर पर अपने गौरवशाली अतीत की दुहाई दी जाती है, साथ ही वर्तमान समय की परेशानियों के लिए किसी बड़े खलनायक को ज़िम्मेदार ठहराया जाता है.

किसी खलनायक की साज़िश

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कहा जाता है कि आईएस को सीआईए (या मोसाद या किसी ने भी) ने जॉर्डन में बढ़ावा दिया और प्रशिक्षण दिया, तालिबान को अमरीकियों ने सोवियत गणराज्य के ख़िलाफ़ अपनी लड़ाई की वजह से प्रोत्साहित किया, आदि-इत्यादि. इसमें कोई शक नहीं कि इन तर्कों में कुछ सच्चाई भी है.

जैसे, इराक़ और सीरिया में जिस तरह की हिंसा आज हम देख रहे हैं वो इन देशों में पहले ऐसी नहीं थी. अमरीका, इसराइल और सऊदी अरब की कुछ शक्तियों ने शिया ईरान के ख़िलाफ़ सुन्नी चरमपंथियों को बढ़ावा दिया.

इसी तरह, हमें पता है की ऑटोमन टर्क (उस्मान शासन) में 19वीं सदी की शुरुआत में वहाबी विचारधारा को दबा दिया गया था.

वहाबी विचारधारा(और वर्तमान सऊदी अरब) को 20वीं सदी के शुरुआती दशक में ब्रितानियों ने तुर्की और जर्मनी के ख़िलाफ़ शक्ति संतुलन बनाने के लिए 'पुनर्स्थापित' किया था.

लेकिन इन कारणों को अपनी दिक़्क़तों के लिए पर्याप्त वजह नहीं माना जा सकता.

देशों का काम है राजनीति

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देशों का काम राजनीति करना है. अंतरराष्ट्रीय शक्तियाँ वैश्विक स्तर पर राजनीति करती हैं.

उनको कुछ हद तक ही दोष दिया जा सकता है. असली दोष तो अपने घर के अंदर होता है.

सच तो यह है कि असल समस्या सीआईए या मोसाद या कोई और नहीं है. समस्या यह है कि मुस्लिम समाज में आत्मविश्लेषण का अभाव है.

जैसे, बहुत ही फ़ैशनेबल कपड़े पहने एक फ़लस्तीनी लेखिका ने कुछ साल पहले कुछ 'पश्चिमी' देशों में बुर्क़ा पहनने के विरोध या उसपर प्रतिबंध की कोशिशों की आलोचना की थी.

उन्होंने ख़ुद बुर्क़ा नहीं पहन रखा था लेकिन अपने कई अन्य बुर्क़ा न पहनने वाले साथियों की तरह उन्हें भी लगा कि अपने 'भाइयों' के पक्ष में बोलना उनकी ज़िम्मेदारी है.

उन्होंने तर्क दिया कि पश्चिमी देश बिकनी पर क्यों नहीं प्रतिबंध लगाते, क्योंकि यह कहा जा सकता है कि बिकनी से भी महिलाओं की उसी तरह एक ख़ास छवि बनती है जैसी कि बुर्क़े से.

'भली नीयत, तर्क बुरा'

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उस लेखिका की नीयत भली थी, लेकिन तर्क बुरा. कोई भी पश्चिमी देश महिलाओं को बिकनी पहनने के लिए ज़ोर नहीं डालता.

आप किसी भी पश्चिम में किसी भी समुद्र तट पर पूरे कपड़े पहनकर घूम सकते हैं! लेकिन कई इस्लामी देश, जैसे कि सऊदी अरब, बुर्का पहनने के लिए बाध्य करते हैं और इसे ज़बरदस्ती लागू करते हैं.

इस संदर्भ में, इस्लाम की अपने तरह की समझ के कारण बुर्क़ा पहनने पर ज़ोर देने वाले कट्टर मुस्लिम, उन 'उदार' या 'आधुनिक' मुसलमानों से ज़्यादा साफ़ राय रखते हैं, जो इसके लिए कुछ अलग ही तर्क देते हैं.

मुझे लगता है कि मुसलमानों को अपने तर्कों और बहानों की पूरी ईमानदारी से जाँच करनी चाहिए.

'सच्चा चेहरा नहीं है'

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हम यह कहकर भी नहीं बच सकते कि आईएस इस्लाम का सच्चा चेहरा नहीं है और वो अमानवीय हैं. आईएस या बोको हराम केवल (अ)मानवीय नहीं हैं बल्कि वो मुसलमान भी हैं.

कुछ उसी तरह जैसे कि इसराइल के कुछ हत्यारे यहूदी और गुजरात दंगों में शामिल हत्यारे हिन्दू केवल (अ)मानवीय नहीं हैं बल्कि वे यहूदी और हिन्दू भी हैं.

ऐसे उदाहरणों की सूची कभी ख़त्म नहीं होगी.

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मूल बात यह है कि अगर आप मानवता की सीमा का उल्लंघन कर जाते हैं तो इस बात से ज़्यादा फ़र्क़ नहीं पड़ता कि आपका कृत्य न्यायोचित था या नहीं.

यह वक़्त है, जब हम सबको राष्ट्रीयता, नस्ल, जेंडर या धर्म के नाम पर किए गए हर छोटे-बड़े अन्याय की ज़िम्मेदारी लेनी चाहिए.

इसकी शुरुआत के लिए, मुसलमानों को सबसे पहले उनकी समाज में होने वाले सभी ग़लत बातों के लिए पश्चिम को ज़िम्मेदार ठहराना बंद करना होगा.

(ये लेखक के निजी विचार हैं.)

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