धर्मांतरण के मुद्दे पर पटेल का रुख़

सरदार पटेल इमेज कॉपीरइट PHOTODIVISION

"मौजूदा क़ानूनों के तहत भी जबरन धर्मांतरण कराना एक अपराध है."

ये बात सरदार वल्लभ भाई पटेल ने 22 अप्रैल 1947 को संविधान सभा में मौलिक अधिकारों और अल्पसंख्यकों के मुद्दों से जुड़ी सलाहकार समिति के चेयरमैन की हैसियत से कही थी.

वे एंग्लो इंडियन समुदाय के प्रतिनिधि फ्रैंक एंथनी की चिंताओं का जवाब दे रहे थे.

(मनोज मिट्टा के लेख का दूसरा भाग)

दरअसल फ्रैंक एंथनी ने सवाल उठाया था कि आने वाले कल में क़ानून बनाने वाले लोग धर्मांतरण के मुद्दे को किस तरह से देखेंगे.

उन्होंने कहा, "आप इसे विधायिका पर छोड़ रहे हैं. कल क़ानून बनाने वाले लोग ये कह सकते हैं कि तुम्हारे पास कोई अधिकार नहीं है."

मोदी सरकार

इमेज कॉपीरइट Reuters

सलाहकार समिति की उस बैठक में की गई बहस की अहमियत आज पहले से कहीं ज़्यादा बढ़ गई है.

क्योंकि अब सरदार पटेल के नाम की क़सम खाने वाली मोदी सरकार सत्ता में है.

और सरकार ने आगरा में चले 'घर वापसी अभियान' के बाद संसद में फूटे विपक्ष के ग़ुस्से के बावजूद सभी राज्यों और केंद्र में धर्मांतरण निरोधी क़ानून लाने की बात कही है.

जबरन धर्मांतरण के ख़िलाफ़ किसी एहतियाती उपाय बरतने की बजाय पटेल ने ये नज़रिया अपनाया था कि मौजूदा क़ानून ही इस तरह के अपराधों से निपटने के लिए पूरी तरह से सक्षम हैं.

धर्म परिवर्तन

इमेज कॉपीरइट Jaiprakash Baghel

अल्पसंख्यकों के मुद्दों पर विचार करने वाली सलाहकार समिति की तरफ़ से गठित की गई उपसमिति ने एहतियाती प्रावधान शामिल किए जाने की सिफ़ारिश की थी जिसके लिए पटेल रज़ामंद नहीं हुए.

इस प्रावधान में कहा गया था कि "ज़बरदस्ती या ग़ैरज़रूरी प्रभाव के इस्तेमाल से एक धर्म से दूसरे धर्म में कराए गए परिवर्तन को क़ानून की मंज़ूरी नहीं होगी."

अल्पसंख्यकों से जुड़े मुद्दों पर विचार करने के लिए बनाई गई इस उपसमिति में बहुमत इस प्रावधान के पक्ष में था जबकि बैठकों के ब्यौरे से ये साफ़ था कि चक्रवर्ती राजगोपालाचारी ने "इस प्रावधान की ज़रूरत पर ही सवाल खड़े कर दिए थे."

उनका कहना था कि ये बात पहले से ही भारतीय दंड संहिता (आईपीसी) में शामिल है.

संविधान सभा

इमेज कॉपीरइट PHOTODIVISION
Image caption चक्रवर्ती राजगोपालाचारी के साथ संविधान सभा के अध्यक्ष राजेंद्र प्रसाद.

हालांकि इस प्रावधान का मसौदा वास्तव में केएम मुंशी ने मौलिक अधिकारों से संबंधित उपसमिति के सामने तैयार किया था और यह सब-कमेटी भी पटेल की अध्यक्षता वाली सलाहकार समिति ने ही गठित की थी.

22 अप्रैल 1947 को पटेल ने कहा कि यह प्रावधान 'कोई मौलिक अधिकार नहीं है' और दोनों उपसमितियों की ये सिफ़ारिश 'ग़ैरज़रूरी है और इसे हटाया जा सकता है.'

फ्रैंक एंथनी ने तब कहा था कि यह प्रावधान 'ईसाई समुदाय के लिए बेहद महत्वपूर्ण' है. श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने भी कहा कि वे नहीं चाहते कि इस प्रावधान को हटाया जाए.

सलाहकार समिति में बहुमत इस प्रावधान के पक्ष में था लेकिन पटेल ने अगले दिन संविधान सभा के अध्यक्ष राजेंद्र प्रसाद को भेजी गई रिपोर्ट में इसे बरक़रार रखने में मदद नहीं की.

संशोधन प्रस्ताव

इमेज कॉपीरइट THINKSTOCK

एक मई, 1947 को संविधान सभा की बैठक में ये मुद्दा फिर से उठा. केएम मुंशी ने 'धोखे' और 'कम उम्र' के आधार पर धर्मांतरण को अमान्य क़रार देने के लिए संशोधन प्रस्ताव पेश किया.

बाहरी दबाव के प्रभाव में किए जाने वाले धर्मांतरण की रोकथाम के लिए संविधान सभा के सदस्यों में मुंशी के प्रस्ताव के बाद बहस शुरू हो गई.

भीम राव अम्बेडकर, मुंशी के संशोधन प्रस्ताव से असहमत थे और उन्होंने कहा कि सलाहकार समिति इस मुद्दे के सभी पहलुओं पर विचार करने के बाद ही इस नतीजे पर पहुंची है कि वे उन प्रावधानों पर क़ायम रहेंगे जिनका ज़िक्र उनकी सिफ़ारिशों में है.

पटेल इस सुझाव के पक्ष में थे कि मुंशी के संशोधन प्रस्ताव को फिर से सलाहकार समिति के पास विचार के लिए भेज दिया जाए.

आज़ादी के बाद

इमेज कॉपीरइट photodivision.gov.in

राजेंद्र प्रसाद ने उनके सुझाव को स्वीकार कर लिया. सलाहकार समिति में इस बार पटेल के पास अपने रास्ते थे.

आज़ादी के दस दिन बाद पटेल ने राजेंद्र प्रसाद को लिखा, "इस मुद्दे पर आगे सोच विचार करने के बाद हमें ये लगता है कि ये प्रावधान इतने आमफ़हम हैं कि इसे संविधान में शामिल करना ग़ैरज़रूरी है और हमारी सिफ़ारिश है कि इसे पूरी तरह से हटाया जाए."

हालांकि धर्मांतरण को अमान्य क़रार देने वाला ये प्रावधान इसके बाद हटा लिया गया लेकिन छह दिसंबर, 1947 को संविधान सभा में धर्मांतरण पर एक बार फिर से बहस छिड़ी.

बहस के केंद्र में ये सवाल था कि क्या धार्मिक स्वतंत्रता के अधिकार का विस्तार धर्म के प्रचार प्रसार के अधिकार की हद तक होना चाहिए.

मत का प्रचार

इमेज कॉपीरइट AFP

मौलिक अधिकारों की उपसमिति के सामने मुंशी ने जो पहला मसौदा पेश किया था, ये शब्द दरअसल उस प्रस्ताव में शामिल नहीं किए गए थे.

अल्पसंख्यकों की उपसमिति की सिफ़ारिश के बाद ये शब्द बाद में शामिल किए गए थे.

17 अप्रैल, 1947 को हुए बैठक के ब्योरे में कहा गया है, "एम रुथ्नास्वामी ने ईसाई और इस्लाम जैसे धर्मों के हवाले से ये ज़िक्र किया कि ये अनिवार्य रूप से प्रचार प्रसार करने वाले धर्म हैं और इनके लिए ऐसे प्रावधान बनाए जाने चाहिए ताकि ये अपने नियमों के मुताबिक़ अपने मत का प्रचार प्रसार कर सकें."

केएम मुंशी ने 'अल्पसंख्यकों को दी गई इस रियायत' को फिर से दोहराते हुए संविधान सभा में कहा कि "'प्रचार' शब्द इस अनुच्छेद में बरक़रार रखा जाना चाहिए ताकि अल्पसंख्यकों के मुद्दों पर विचार करने वाली कमेटी ने जो कुछ भी उनके लिए हासिल किया है, उस पर आंच न आए."

धार्मिक समुदाय

इमेज कॉपीरइट Reuters

संविधान सभा में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के अधिकार को मिली मंज़ूरी के तर्ज़ पर मुंशी ने कहा कि यह अधिकार किसी भी धार्मिक समुदाय के लिए उपलब्ध होगा कि वे अन्य लोगों को अपने धर्म में शामिल होने के लिए प्रेरित कर सकें.

संविधान सभा में मुंशी की दख़लंदाज़ी के बाद एक बहुलतावादी राष्ट्र के विचार को मज़बूत करने के लिए 'प्रचार' शब्द को हटाने से संबंधित संशोधन प्रस्ताव ख़ारिज कर दिए गए.

(मनोज मिट्टा के इस लेख का दूसरा और अंतिम भाग अगली कड़ी में पढ़ें.)

(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक और ट्विटर पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)

संबंधित समाचार