विधानसभा चुनाव नतीजों से मिले ये तीन सबक़

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जम्मू-कश्मीर के चुनाव परिणाम पर नज़र डालने से साफ़ हो जाता है कि भाजपा का मिशन 44+ नाकाम हो गया है लेकिन पार्टी राज्य की राजनीति पर अपना प्रभाव छोड़ने में कामयाब रही है.

हालांकि भाजपा की बहुप्रचारित उम्मीदवार हिना शफ़ी भट्ट चुनाव हार गईं. हज़रतबल और शोपियां जैसी विधानसभा क्षेत्रों में भाजपा उम्मीदवार ज़मानत तक नहीं बचा पाए हैं लेकिन कांग्रेस से आगे रहे हैं.

इतना ही नहीं, घाटी में पहली बार पार्टी कुछ जगह बनाने में कामयाब रही.

लेकिन जम्मू में पार्टी का उल्लेखनीय प्रदर्शन उसे पीडीपी या एनसी के साथ गठबंधन के ज़रिए सत्ता का दावेदार तो बनाता ही है.

'सीट बंटवारे की ग़लती'

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चुनाव पूर्व सर्वेक्षणों को धता बताते हुए उमर अब्दुल्ला और नेशनल कांफ्रेंस मैदान में बने हुए हैं. भाजपा के साथ सरकार में शामिल होने की बात नेशनल कांफ्रेस को लुभावनी लग सकती है- और पीडीपी को भी.

आंकड़ों के हिसाब से पीडीपी और कांग्रेस मिलकर सरकार बना सकते हैं बशर्ते वे अपने साथ कुछ छोटे दलों और निर्दलीयों को भी मिला सकें.

तो झारखंड और जम्मू-कश्मीर के परिणामों का देश पर क्या असर पड़ेगा?

1. अगर झारखंड में राष्ट्रीय जनता दल और जनता दल (यू) के साथ कांग्रेस का गठबंधन विफल रहा तो झारखंड मुक्ति मोर्चा का पुनरुत्थान तय है, जिसके साथ कांग्रस ने गठबंधन सरकार चलाई है,.

इसका अर्थ यह भी है कि भाजपा अक्लमंदी से सीटों का बंटवारा नहीं कर पाई.

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कश्मीर में भी छह साल तक गठबंधन सरकार में भागीदार रहे कांग्रेस और नेशनल कांफ्रेंस के बीच समझौता चुनावी तस्वीर को बदल सकता था.

2. परिणाम चाहे जो भी रहें, जम्मू-कश्मीर और ख़ासकर घाटी में की राजनीति में आम लोगों की तगड़ी भागीदारी ने चुनाव के ज़रिए राजनीतिक भागीदारी के बारे में नए सिरे से सोचने का मौक़ा दिया है.

पूर्व अलगाववादी नेता सज्जाद लोन की पीपल्स कांफ्रेंस इस बार दो सीट जीत चुकी है. आने वाले महीने और सालों में शायद राज्य में नई पार्टियां और नेता भी उभरें.

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3. भाजपा को यह बुनियादी चयन करना होगा कि वह कैसी पार्टी बनना चाहती है, और ये नरेंद्र मोदी को ही तय करना होगा.

जम्मू में पार्टी की साफ़ जीत से कट्टर हिंदुवादियों को लग सकता है कि ध्रुवीकरण अच्छी चीज़ है.

लेकिन घाटी- जहां के लोग 'विकास', 'सुशासन' और उन सभी चीज़ों के लिए तरस रहे हैं, जिनका वादा मोदी करते हैं- वहां जगह बना पाने में इसकी नाकामी उग्र राष्ट्रवादी राजनीति के नुक़सान को दर्शाती है.

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