झारखंड को मिलेगा ग़ैर आदिवासी सीएम?

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भारतीय जनता पार्टी झारखंड में लंबे समय तक गठबंधन सरकारों में शासन कर चुकी है.

भाजपा और दूसरी पार्टियां भी चुनाव प्रचार के दौरान कह रही थीं कि झारखंड का विकास नहीं हुआ है.

झारखंड जब से नया राज्य बना, तब से तहस-नहस हो गया. इसमें भाजपा की भागीदारी वाली सरकारों का भी योगदान रहा है.

नए राज्य में सबसे अधिक मुख्यमंत्री उन्हीं के रहे. झारखंड में सबसे अधिक दिनों तक भाजपा ने ही राज किया है.

मोदी की चाहत

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ऐसे में बहुत प्रामाणिक चेहरे भाजपा के पास नहीं हैं. इनमें सर्वाधिक विवादास्पद चेहरा था पूर्व मुख्यमंत्री अर्जुन मुंडा का.

वे मुख्यमंत्री पद के प्रबल उम्मीदवारों में थे, पर उन्हें जनता ने हरा दिया.

अब जिन उम्मीदवारों के नाम सामने आ रहे हैं वह हैं - रवींद्र राय, रघुवर दास, सरयू राय, सीपी सिंह.

यहां बड़ा सवाल यह है कि नरेंद्र मोदी किसे चाहते हैं.

नया मुख्यमंत्री

मुझे लगता है कि इन नेताओं ने झारखंड में भाजपा को नहीं जिताया बल्कि मोदी के नाम पर बने माहौल के आधार पर चुनाव जीता गया है.

हालांकि इस पर भी कई सवाल उठ रहे हैं धीरे-धीरे.

नरेंद्र मोदी हरियाणा की तरह झारखंड में किस खट्टर साहब को खोजते हैं, यह देखना दिलचस्प होगा.

झारखंड के नवनिर्वाचित विधायक नहीं बल्कि सिर्फ़ और सिर्फ़ नरेंद्र मोदी तय करेंगे कि नया मुख्यमंत्री कौन बनेगा.

गैर आदिवासी चेहरा

कई लोग कयास लगा रहे हैं कि झारखंड में कोई गैर आदिवासी चेहरा भी सामने आ सकता है.

साथ ही सवाल यह भी है कि ऐसे व्यक्ति की राजनीतिक स्वीकार्यता क्या होगी और राज्य की राजनीति पर उसकी पकड़ किस हद तक होगी.

तस्वीर का दूसरा पहलू यह है कि झारखंड एक समय आदिवासी बहुल राज्य था. तब वह बिहार का हिस्सा था.

आदिवासियों को बहुत पहले ही हाशिये पर डाला जा चुका है और यह काम मुख्यधारा की राजनीतिक पार्टियों ने किया है.

झारखंड मुक्ति मोर्चा

आज स्थिति यह है कि आदिवासियों की तरफ से ऐसी कोई दावेदारी भी नहीं है.

क्योंकि आदिवासी समाज का प्रमुख राजनीतिक संगठन झारखंड मुक्ति मोर्चा हताश, निराश और पराजित है.

ऐसे में भाजपा पर कोई नैतिक दबाव नहीं कि वह किसी आदिवासी को मुख्यमंत्री बनाए.

जादुई ज़मीन

वैसे भी भाजपा झारखंड की अगड़ी जातियों और कारोबारी तबक़े की नुमाइंदा पार्टी रही है.

उसे भारत के बड़े कारोबारी घरानों का समर्थन हासिल है, जिनकी दिलचस्पी झारखंड के प्राकृतिक संसाधनों में है.

फिलहाल कह सकते हैं कि झारखंड एक जादुई ज़मीन है, जहां अंधेरा छाया हुआ है.

इस जादुई ज़मीन का कितना दोहन किया जाए, यह निर्धारित करने वाले तय करेंगे कि कैसा मुख्यमंत्री हो.

चमक फीकी!

यहां यह भी देखना चाहिए कि राज्य में जीत भाजपा की भले हुई हो पर झामुमो ने अपना जनाधार नहीं गंवाया है.

उसके कई लोग चुनाव जीतकर आए हैं. पिछले चुनाव से उन्होंने बेहतर किया है.

चुनाव सर्वेक्षणों ने झामुमो को लगभग खारिज कर दिया था. कभी अपने गढ़ संथाल परगना में उनकी चमक फीकी हुई है.

मगर छोटा नागपुर के दक्षिणी इलाक़ों और अन्य कई क्षेत्रों में उन्होंने हासिल किया है.

महागठबंधन

मतलब यह कि अगर झामुमो, राजद, जेडीयू और कांग्रेस साथ मिलकर चुनाव लड़े होते और बाबूलाल मरांडी की झारखंड विकास मोर्चा भी साथ होती तो शायद चुनाव का नतीजा कुछ और होता.

लेकिन ऐसे किसी महागठबंधन की परिकल्पना पर पानी फेरने का काम कांग्रेस ने किया है.

इसका नतीजा खुद कांग्रेस को भुगतना पड़ रहा है.

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